केरल गरीबी मॉडल: चरम गरीबी उन्मूलन, मोदी सरकार को आईना।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की ‘गरीबी उन्मूलन’ की कहानी आलोचकों की नजर में एक महंगा प्रचार अभियान मात्र है, जहाँ आंकड़ों की बाजीगरी से वास्तविकता को छिपाया जाता है। इसी पृष्ठभूमि में, केरल गरीबी मॉडल की चरम गरीबी से पूर्ण मुक्ति की घोषणा केंद्रीय ‘गरीबी प्रबंधन’ की नीतियों पर एक कठोर सवाल खड़ा करती है।
एनआईटीआई आयोग का बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) बेशक यह दावा करता है कि 2013-14 से 2022-23 तक 24.82 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले, लेकिन यह आंकड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5, 2019-21) पर आधारित हैं, जो महामारी के दौरान अपर्याप्त थे और 2022-23 के घरेलू खपत व्यय सर्वेक्षण (HCES) से भी कम अनुमानित हैं।
वास्तविकता यह है कि 2025 तक भी 81.35 करोड़ लोग पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) पर निर्भर हैं, जिन्हें मासिक 5 किलो मुफ्त राशन मिलता है। यह 81.35 करोड़ लोगों को ‘जीवित रखने का न्यूनतम सहारा’ है, न कि सम्मानजनक जीवन।
मोदी सरकार ने गरीबी मापन की आधिकारिक प्रक्रिया ही रोक दी है, क्योंकि 2022-23 HCES डेटा से ग्रामीण क्षेत्रों में 2.8% और शहरी असमानता में 1.1% चरम गरीबी जैसे असुविधाजनक आंकड़े उजागर होते।
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केरल की ऐतिहासिक घोषणा और सफल मॉडल की कहानी
केरल, जहाँ केंद्रीय ‘संघीय’ शासन का दबाव कम है, ने 1 नवंबर 2025 से चरम गरीबी से पूर्ण मुक्ति की घोषणा कर दी है। यह घोषणा करने वाला केरल भारत का पहला राज्य और दुनिया में चीन के बाद दूसरा है। 2021 में शुरू किए गए एक्सट्रीम पॉवर्टी एराडिकेशन प्रोजेक्ट (ईपीईपी) ने 64,006 परिवारों (1.03 लाख व्यक्तियों) की पहचान की और उन्हें भोजन, स्वास्थ्य, आवास और आजीविका सुनिश्चित की।
इस परियोजना के तहत 7,083 नए घर बनाए गए, 4,395 परिवारों को आय-सृजन सहायता दी गई, और ₹60 करोड़ का बजट आवंटित किया गया। सितंबर 2025 तक, 96.13% (55,861 परिवार) गरीबी रेखा से ऊपर उठ चुके थे, जबकि केवल 261 खानाबदोश परिवारों को ढूँढना बाकी है।
कोटायम जिला जून 2025 में शून्य गरीबी वाला पहला जिला बना, और धर्मदम विधानसभा क्षेत्र अप्रैल 2025 में ऐसा करने वाला पहला विधानसभा क्षेत्र बना। यह सफलता दिखाती है कि जब नीतियाँ ‘लोगों’ के लिए हों, न कि पूंजीपति और वोटबैंक के लिए, तो चमत्कार संभव हैं।
डेटा की बाजीगरी बनाम केरल का जमीनी काम
विश्व बैंक की स्प्रिंग 2025 पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रिफ रिपोर्ट के अनुसार, भारत में $2.15/दिन की चरम गरीबी 2011-12 के 16.2% से घटकर 2022-23 में 2.3% हो गई, जिससे 17.1 करोड़ लोग ऊपर उठे। हालांकि, $3.65/दिन की लाइन पर 28.1% (लगभग 40 करोड़) लोग अभी भी फँसे हैं, जो भूखमरी से ऊपर उठने मात्र का संकेत है।
आलोचक (कांग्रेस और ऑक्सफैम की 2025 रिपोर्ट) बताते हैं कि चरम गरीबी $3/दिन की रेखा पर 5.3% है, जो गरिमापूर्ण अस्तित्व के लिए अपर्याप्त है। ‘अमृत काल’ में करोड़ों लोग अभी भी भूखे सोते हैं, और पीएमजीकेएवाई योजना की 28% लीकेज (20 मिलियन टन अनाज, ₹69,000 करोड़ मूल्य) कालाबाजारी को बढ़ावा दे रही है।
इसके विपरीत, एनआईटीआई आयोग के 2023 एमपीआई में केरल का बहुआयामी गरीबी दर मात्र 0.55% है, जबकि बिहार में 33.76%, झारखंड में 28.81%, और उत्तर प्रदेश में 22.93% है। यह स्पष्ट करता है कि केरल गरीबी मॉडल कितना प्रभावी रहा है।
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सामाजिक निवेश की शक्ति और ‘केरल मॉडल’ की नींव
केरल गरीबी मॉडल की सफलता दशकों के सामाजिक क्षेत्र पर निवेश का परिणाम है। राज्य अपने बजट का 30%+ शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जिसने जीवन प्रत्याशा (77 वर्ष) और शिशु मृत्यु दर (6/1000) को विकसित देशों के स्तर पर पहुँचा दिया है।
1950-60 के भूमि सुधारों से शुरू होकर, 1990 के विकेंद्रीकरण (पीपुल्स प्लानिंग कैंपेन) ने ग्रामीणों को सशक्त किया। कुदुम्बश्री ने 48 लाख महिलाओं को संगठित कर माइक्रो-एंटरप्राइजेज, कृषि और अपशिष्ट प्रबंधन में जोड़ा। एलडीएफ सरकार ने स्थानीय स्वशासन को मजबूत कर हर परिवार के लिए माइक्रो-प्लान बनाए, जो केंद्रीय योजनाओं की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावी साबित हुए।
केंद्रीय योजनाओं की सीमाएं: प्रबंधन बनाम उन्मूलन
पीएमजीकेएवाई जैसी केंद्रीय योजनाएँ गरीबी को केवल ‘प्रबंधित’ करती हैं, उन्मूलित नहीं। यह योजना 2025 तक 81 करोड़ लाभार्थियों को कवर करती है (75% ग्रामीण + 50% शहरी), लेकिन इसमें 28% राशन की कालाबाजारी और 40% गरीबों का बहिष्कार आम है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2022-23 में 20 मिलियन टन राशन, जिसका मूल्य ₹69,000 करोड़ था, ब्लैकहोल में समा गया।
योजना को 2028 तक बढ़ाने का फैसला सब्सिडी बोझ (₹2.03 लाख करोड़ FY26 में) बढ़ा रहा है, बिना दीर्घकालिक रोजगार सृजन के।
यह ‘ट्रिकल-डाउन’ अर्थव्यवस्था का फेल्योर है, जहाँ कॉर्पोरेट टैक्स कट्स (₹1.5 लाख करोड़+) अमीरों को फायदा देते हैं। ऑक्सफैम 2025 के अनुसार, 1% अमीरों के पास 40.1% संपत्ति है। केरल ने दिखाया कि लक्षित हस्तक्षेप ही काम करते हैं, न कि सामान्यीकृत दान।
संघवाद पर सवाल और केरल की स्वायत्तता की लड़ाई
मोदी सरकार का ‘सहकारी संघवाद’ एक दिखावा मात्र है, जो राज्यों को वित्तीय रूप से बाँधता है। जीएसटी से राज्यों का राजस्व 50%+ घट गया, और केंद्र ने राज्यों को उनके हिस्से का कर सौंपे बिना टैक्स कलेक्शन अपनी जेब में डाला। केरल को 2025 में नई स्लैब रेटिंग से ₹8,000-10,000 करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है, जबकि 14% वार्षिक वृद्धि का वादा टूटा।
सुप्रीम कोर्ट में केरल ने NBC (नेट बोर्रोइंग सीलिंग) को चुनौती दी है, जो राज्यों की स्वायत्तता छीनता है। एफसीआरए एक्ट (2020) ने एनजीओ फंडिंग रोककर सामाजिक कार्यों को कमजोर किया है। केरल ने बावजूद केंद्र के दबाव (जैसे एनआरसी-सीएए विरोध पर एफआईआर) से अपने मॉडल को बचाया, जो साबित करता है कि सच्चा संघवाद राज्यों को स्वायत्तता देता है।
चुनौतियाँ और आगे का रास्ता
यह मानना होगा कि केरल गरीबी मॉडल अपूर्ण है। राज्य शिक्षित बेरोजगारी (खासकर महिलाओं में 20%+) और वित्तीय घाटा (2025 में 3.5% जीएसडीपी) जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। बेरोजगारी दर 2022-23 में 7-9.6% रही, जो राष्ट्रीय औसत (4.1%) से दोगुनी है, क्योंकि औद्योगिक विकास (केवल 23% GSDP योगदान) ठप है और रेमिटेंस पर निर्भरता (जीएसपी का 20-30%) आर्थिक अस्थिरता लाती है।
फिर भी, 2025 बजट में के-फॉन (फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क) पर ₹100 करोड़ निवेश डिजिटल समावेश को बढ़ावा दे रहा है। एलडीएफ सरकार ने नई पीढ़ी स्कूलों में नामांकन 20% बढ़ाया है। ये चुनौतियाँ हल करने योग्य हैं, जबकि केंद्र का कॉर्पोरेट प्रेम राज्यों को कमजोर करता है।
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प्रचार से पेट नहीं भरता, नीतियों से भरता है
केरल का चरम गरीबी उन्मूलन नरेंद्र मोदी सरकार के लिए एक आईना है। ऑक्सफैम की 2025 रिपोर्ट कहती है कि 1% अमीरों के पास 40.1% संपत्ति है, जो देश में बढ़ती असमानता को भयानक रूप से दर्शाती है। केरल गरीबी मॉडल ने दिखाया कि विकेंद्रीकरण, सामाजिक सुरक्षा पेंशन (65 लाख को कवर), और नागरिक भागीदारी से गरीबी हार मान लेती है, जबकि केंद्र का ‘जीरो पॉवर्टी’ का दावा डेटा फिक्सिंग पर टिका है।
सबक साफ है: संघीयता को मजबूत करें, राज्यों को फंड दें, और सामाजिक निवेश को बढ़ावा दें। यदि मोदी सरकार केरल से सीखे, तो 2047 तक विकसित भारत संभव है; अन्यथा, 80 करोड़ ‘राशन-जीवी’ ही रहेंगे। केरल की सफलता साबित करती है कि स्थानीय मॉडल राष्ट्रीय नीति से काफी बेहतर है।



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