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लद्दाख में ऐतिहासिक ऑरोरा: 20 साल का सबसे शक्तिशाली सौर तूफान

लद्दाख में ऐतिहासिक ऑरोरा

लद्दाख में ऐतिहासिक ऑरोरा का एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला जिसने वैज्ञानिकों और आम जनता दोनों को हैरत में डाल दिया है। एक ऐतिहासिक S4-गंभीर सौर विकिरण तूफान ने लद्दाख के ऊंचाई वाले रेगिस्तान में दुर्लभ ऑरोरल डिस्प्ले शुरू किए।

इस रिकॉर्ड तोड़ने वाली घटना ने 2003 के कुख्यात “हैलोवीन” तूफानों को भी पीछे छोड़ दिया है और भारतीय शोधकर्ताओं के लिए एक दुर्लभ वैज्ञानिक वरदान साबित हुई है। दो दशकों में धरती के सबसे तेज़ सौर विकिरण तूफान ने लद्दाख के ऊपर रात के आसमान को रोशन कर दिया, जिससे भारत की सबसे ऊंची ऑब्जर्वेटरी में से एक से ऑरोरा साफ दिखाई देने लगे।

माउंट सरस्वती पर हानले ऑब्जर्वेटरी का ऐतिहासिक कैप्चर

पश्चिमी हिमालय में 4,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित माउंट सरस्वती के ऊपर हानले में इंडियन एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी (IAO) ने अपने ऑल-स्काई कैमरे से इस अद्भुत नज़ारे को कैद किया।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA) द्वारा संचालित इस ऑब्जर्वेटरी के कैमरों ने हिमालय के उत्तर में लद्दाख के पठार पर लहराते हुए प्रकाश के पर्दों को डॉक्यूमेंट किया।

सौर साइकिल 25 की तेज़ होती गतिविधियों के कारण, पिछले दो वर्षों के भीतर भारत में यह तीसरा ऑरोरल दृश्य था। यह न केवल एक प्राकृतिक घटना है, बल्कि हानले डार्क स्काई रिज़र्व में रात के आसमान के अंधेरे को बनाए रखने की अहमियत को भी रेखांकित करता है।

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X-क्लास सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन का तांडव

इस पूरी घटना की शुरुआत 18 जनवरी को हुई, जब सूरज से एक शक्तिशाली X-क्लास सोलर फ्लेयर निकला। इससे एक विशाल कोरोनल मास इजेक्शन (CME) पैदा हुआ, जो लगभग 1,700 किमी प्रति सेकंड की रफ़्तार से धरती की ओर बढ़ा।

NOAA के स्पेस वेदर प्रेडिक्शन सेंटर के अनुसार, लद्दाख में ऐतिहासिक ऑरोरा पैदा करने वाली यह घटना केवल 25 घंटों में धरती तक पहुँच गई। वैज्ञानिकों ने इसे S4-सीवियर घटना के रूप में वर्गीकृत किया है।

ऑब्जर्वेटरी के इंचार्ज इंजीनियर दोरजे एंगचुक के अनुसार, 2023 से 2025 के बीच हानले में छह बार ऑरोरा की तस्वीरें ली गई हैं, जो इस सोलर साइकिल की मजबूती को दर्शाता है।

वैज्ञानिक विश्लेषण और धरती की मैग्नेटिक शील्ड पर प्रभाव

जब सूरज से निकले हाई-एनर्जी प्रोटॉन पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर से टकराए, तो उन्होंने मैग्नेटिक फील्ड लाइनों को दबा दिया। इसके परिणामस्वरूप पार्टिकल्स पोलर एटमॉस्फियर में चले गए, जहाँ वे गैसों से टकराकर चमकीले हरे, बैंगनी और लाल रंग में बदल गए।

आमतौर पर ऑरोरा ऊंचे अक्षांशों (High Latitudes) पर देखे जाते हैं, लेकिन 32°N जैसे निचले अक्षांश पर लद्दाख में ऐतिहासिक ऑरोरा देखने के लिए G4-लेवल के जियोमैग्नेटिक डिस्टर्बेंस की जरूरत होती है, जो इस तूफान ने प्रदान किया। इससे पहले मई 2024 में उत्तराखंड और अक्टूबर 2024 में लद्दाख में ऐसी हलचल देखी गई थी।

स्पेस टेक्नोलॉजी और सैटेलाइट्स के लिए गंभीर चेतावनी

जहाँ एक ओर स्काईवॉचर्स इस दृश्य से हैरान थे, वहीं अंतरिक्ष में स्थिति काफी तनावपूर्ण थी। सैटेलाइट्स को भारी प्रोटॉन फ्लक्स का सामना करना पड़ा और पोलर फ्लाइट्स में रेडिएशन स्पाइक्स दर्ज किए गए। स्थिति इतनी गंभीर थी कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) के क्रू को सुरक्षा के लिए शेल्टर में जाना पड़ा।

हालांकि सटीक पूर्वानुमान की वजह से कोई बड़ा ब्लैकआउट नहीं हुआ, लेकिन इस घटना ने GPS, पावर ग्रिड और स्टारलिंक जैसे बड़े सैटेलाइट समूहों की कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है। भारतीय शोधकर्ताओं के लिए यह बढ़ते स्पेस वेदर रिस्क के बीच लो-लैटिट्यूड ऑरोरा के अध्ययन का एक सुनहरा मौका है।

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हानले में लाल आसमान का भौतिक तंत्र और चमक

19 और 20 जनवरी की रात को हानले में ऑल-स्काई कैमरे ने जो ऑरोरल गतिविधि कैप्चर की, वह मुख्य रूप से गहरे लाल रंग की थी। IIA के अनुसार, यह तूफान 20 जनवरी को सुबह 3:30 बजे शुरू हुआ और रात 8:30 बजे अपनी चरम तीव्रता पर पहुँच गया, जिसमें चुंबकीय विक्षोभ -218 नैनो टेस्ला रिकॉर्ड किया गया।

यह विशेष लाल रंग 300 किलोमीटर से अधिक की ऊंचाई पर ऑक्सीजन परमाणुओं के सौर प्लाज्मा के साथ प्रतिक्रिया करने से पैदा होता है। लद्दाख में ऐतिहासिक ऑरोरा के रूप में हम इन प्रकाश के पर्दों का केवल ऊपरी हिस्सा देख पाते हैं, इसलिए हमें यह ध्रुवीय क्षेत्रों की तरह हरा न दिखकर लाल दिखाई देता है।

आदित्य-L1 की भूमिका और भविष्य की सुरक्षा

इस सौर संकट के दौरान भारत का आदित्य-L1 मिशन एक संतरी की तरह काम कर रहा है। हालिया डेटा से पता चला है कि ऐसे तूफान पृथ्वी की मैग्नेटिक बाउंड्री को सतह के इतना करीब धकेल सकते हैं कि जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स सीधे सौर हवाओं के संपर्क में आ सकते हैं।

भारत अब आदित्य-L1 के जरिए अपने स्पेस वेदर फोरकास्टिंग को मजबूत कर रहा है। कोरोनल मास इजेक्शन का समय पर पता लगाकर वैज्ञानिक 24 से 48 घंटे पहले चेतावनी दे सकते हैं, जिससे पावर ग्रिड और सैटेलाइट्स को सेफ मोड में डाला जा सके। इंजीनियर अब जियोमैग्नेटिकली-इंड्यूस्ड करंट सेंसर लगाकर नेशनल ग्रिड को सुरक्षित बनाने में जुटे हैं।

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डार्क स्काई रिज़र्व को बचाने की मुहिम और निष्कर्ष

लद्दाख का हानले ब्रह्मांड की एक अनोखी खिड़की है, लेकिन बढ़ता पर्यटन और लाइट पॉल्यूशन (प्रकाश प्रदूषण) इन सूक्ष्म वैज्ञानिक संकेतों को खत्म करने का खतरा पैदा कर रहे हैं। अगर हानले का अंधेरा खत्म होता है, तो हम भविष्य में ऐसी महत्वपूर्ण खगोलीय घटनाओं की निगरानी करने की क्षमता खो देंगे।

यह लाल आसमान एक चेतावनी है कि हमारा सूरज अब और अधिक सक्रिय हो रहा है और हमारी डिजिटल दुनिया सौर तूफानों के प्रति अत्यंत नाजुक है। हानले का साफ और काला आसमान भारत को इन कॉस्मिक घटनाओं पर नजर रखने के लिए एक विशेष स्थान प्रदान करता है, जहाँ विज्ञान और सौंदर्य का मिलन होता है।

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