मणिकर्णिका घाट विवाद: अहिल्यादेवी होल्कर की विरासत पर सियासी संग्राम
छत्रपति संभाजीनगर में मणिकर्णिका घाट विवाद को लेकर राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्माया हुआ है। मंगलवार को महा विकास अघाड़ी (MVA) के घटक दलों ने एकजुट होकर उत्तर प्रदेश के काशी में पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर द्वारा निर्मित ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट के कुछ हिस्सों को गिराने और उनकी मूर्ति के कथित अपमान के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया।
प्रदर्शनकारियों ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि यह सरकार हमारी गौरवशाली विरासत को खत्म करने की साजिश रच रही है।
कोकनवाड़ी स्थित अहिल्यादेवी होल्कर की प्रतिमा के समक्ष हुए इस आंदोलन में कार्यकर्ताओं ने भाजपा सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अहिल्यादेवी होल्कर को अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।
एकजुट हुआ विपक्ष: आंदोलन में शामिल हुए कई प्रमुख दल
इस विरोध प्रदर्शन की सबसे खास बात विपक्षी दलों की एकजुटता रही। छत्रपति संभाजीनगर की सड़कों पर उतरे इस आंदोलन में शिवसेना (UBT), कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार), वंचित बहुजन अघाड़ी, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, राष्ट्रीय समाज पक्ष, प्रहार संगठन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।
सभी दलों के नेताओं ने एक सुर में काशी में हुई कार्रवाई की निंदा की। नेताओं का कहना था कि यह केवल एक निर्माण को ढहाना नहीं है, बल्कि उस सांस्कृतिक धरोहर पर प्रहार है जिसे सदियों से सहेज कर रखा गया था।
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अंबादास दानवे का कड़ा प्रहार: ‘हिंदुत्व का झूठा चेहरा आया सामने’
आंदोलन के दौरान शिवसेना (UBT) के कद्दावर नेता और विधान परिषद में विपक्ष के नेता अंबादास दानवे ने सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि अहिल्यादेवी होल्कर देश की सबसे काबिल और कुशल प्रशासकों में से एक थीं।
उन्होंने ही काशी में ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट विवाद से जुड़े इस प्राचीन ढांचे का निर्माण कराया था, जिसे अब उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने ध्वस्त कर दिया है।
दानवे ने तंज कसते हुए कहा कि इस कृत्य से भाजपा के छद्म हिंदुत्व का असली और झूठा चेहरा जनता के सामने बेनकाब हो गया है। उनके अनुसार, अपनी विरासत को नष्ट करना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है।
कांग्रेस और NCP (SP) ने साधा निशाना: सामाजिक एकता पर चोट का आरोप
कांग्रेस के जिला अध्यक्ष किरण पाटिल डोंगाओंकर ने प्रदर्शन के दौरान कहा कि भाजपा के नेताओं ने समय-समय पर हमारे राष्ट्रीय नायकों को बदनाम करने का काम किया है और अब वे देश के ऐतिहासिक स्मारकों को मिटाने पर तुले हैं।
वहीं, NCP (SP) के नेता पांडुरंग तंगाड़े पाटिल ने अहिल्यादेवी होल्कर को सामाजिक कार्य और कुशल प्रशासन का प्रतीक बताते हुए कहा कि स्मारकों को तोड़ना देश की सामाजिक एकता और ताने-बाने के लिए एक बहुत बड़ा झटका है।
इस अवसर पर सुभाष पाटिल, चेतन कांबले, शेख यूनुस, योगेश बान, रामेश्वर तायडे, प्रकाश मुगड़िया समेत कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
काशी का इतिहास और नवीनीकरण का बदलता स्वरूप
काशी के बारे में कहा जाता है कि यह शहर जीवन और मृत्यु के शाश्वत चक्र का उत्सव मनाने वाला एक वैश्विक थिएटर है। दार्शनिक वाल्टर बेंजामिन के शब्दों को याद करें तो मृत्यु वह अंतिम सत्य है जो कहानी सुनाने वाले को पूर्णता प्रदान करती है। काशी के कहानीकार अलग-अलग घाटों पर बिखरे हुए हैं, जिनमें मणिकर्णिका सबसे प्राचीन और पवित्र माना जाता है।
यहाँ की गलियों, चाय की दुकानों और खोमचों पर आज भी मणिकर्णिका घाट विवाद और इसके नवीनीकरण की चर्चाएं गरम हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि घाटों का जीर्णोद्धार और नाम बदलने की प्रक्रिया सदियों पुरानी है, क्योंकि गंगा की लहरें अक्सर ढांचों के नीचे की मिट्टी बहा ले जाती हैं, जिससे दरारें आ जाती हैं।
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विरासत के संरक्षण का ऐतिहासिक सफर और चुनौतियां
मणिकर्णिका और अन्य घाटों के संरक्षण का इतिहास काफी समृद्ध रहा है। 18वीं सदी के व्यापारी वच्छराज और 16वीं सदी में अंबर के राजा मान सिंह जैसे दानवीरों ने इन घाटों के लिए धन दिया था। यहाँ तक कि 19वीं सदी में पुलिस प्रमुख मीर रुस्तम अली ने जरासंध घाट की मरम्मत कराकर उसका नाम मीर घाट कर दिया था।
हालांकि, वर्तमान में चल रहा नवीनीकरण विवादों के घेरे में आ गया है। जहाँ प्रशासन इसे विकास का हिस्सा बता रहा है, वहीं विपक्षी दल इसे प्राचीन संस्कृति से छेड़छाड़ मान रहे हैं। इसी खींचतान के बीच मणिकर्णिका घाट विवाद अब स्थानीय स्तर से उठकर राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बन चुका है।
वाराणसी में संग्राम: सपा सांसद वीरेंद्र सिंह को पुलिस ने रोका
रविवार को वाराणसी में उस समय स्थिति तनावपूर्ण हो गई जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता और पुलिस आपस में भिड़ गए। चंदौली के सपा सांसद वीरेंद्र सिंह अपने समर्थकों के साथ मणिकर्णिका घाट जाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें रास्ते में ही रोक दिया।
इसके विरोध में सांसद अपने अर्दल बाजार स्थित आवास के बाहर धरने पर बैठ गए। वीरेंद्र सिंह का कहना था कि वे अखिलेश यादव के निर्देश पर मूर्तियों के अपमान की सच्चाई जानने जा रहे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर प्रशासन कौन सा सच छिपाना चाहता है जो जनप्रतिनिधियों को घाट पर जाने से रोका जा रहा है?
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नजरबंद हुए नेता और प्रशासन की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था
वाराणसी प्रशासन ने स्थिति को देखते हुए सपा के 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को घाट पर पहुंचने से पहले ही नजरबंद कर दिया। सपा नेता लालू यादव को नक्कास इलाके में नजरबंद किया गया, जबकि अन्य नेताओं को सर्किट हाउस और उनके घरों में ही रोक लिया गया।
एडिशनल डिप्टी कमिश्नर नीतू कात्यायन के अनुसार, सुरक्षा कारणों और लहुराबीर पर प्रदर्शन के आह्वान को देखते हुए अनुमति रद्द की गई थी।
भारी पुलिस बल और PAC की तैनाती के बावजूद सपा कार्यकर्ता और पुलिस के बीच कई जगहों पर तीखी बहस और हाथापाई हुई। विपक्षी दलों का स्पष्ट कहना है कि वे राजमाता अहिल्याबाई की मूर्ति और विरासत के अपमान के विरुद्ध अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।
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