मनरेगा बनाम VB-G RAM G: क्या छिड़ गया रोजगार युद्ध?
मनरेगा बनाम VB-G RAM G आज 10 जनवरी 2026 की तारीख भारतीय राजनीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक बड़े मोड़ के रूप में दर्ज हो रही है। कांग्रेस पार्टी ने आज से 45 दिवसीय राष्ट्रव्यापी ‘एमजीएनआरईजीए बचाओ संग्राम’ का बिगुल फूंक दिया है। यह आंदोलन केंद्र सरकार द्वारा दिसंबर 2025 में पारित किए गए ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण’ एक्ट के खिलाफ है जहां एक वायरल एंथम गीत— “मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं, पर मैं भी तो एक राम हूँ… पूजा नहीं, काम चाहिए”—करोड़ों ग्रामीणों की उस पीड़ा को स्वर दे रहा है जो अब सड़कों पर उतर आई है। कांग्रेस जहां इसे संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला बता रही है, वहीं सरकार का तर्क है कि यह ‘विकसित भारत 2047’ के सपने को साकार करने की दिशा में एक बड़ा सुधार है।
मनरेगा का गौरवशाली इतिहास और अनुच्छेद 21 की सुरक्षा
साल 2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा शुरू किया गया महज एक योजना नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा अधिकार-आधारित रोजगार कार्यक्रम था। इसने हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन के ‘गारंटीड’ अकुशल काम का कानूनी हक दिया था। यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के ‘जीवन के अधिकार’ से जुड़ा हुआ था। सूखे, वैश्विक महामारी और आर्थिक संकट के दौर में इसने करोड़ों परिवारों को भुखमरी से बचाया। विभिन्न स्वतंत्र अध्ययनों की मानें तो मनरेगा ने न केवल ग्रामीण मजदूरी में वृद्धि की, बल्कि महिलाओं (जो कुल कार्यबल का लगभग 50% हैं) और अनुसूचित जाति/जनजाति समुदायों को सामाजिक-आर्थिक रूप से सशक्त किया। इसी कानून की बदौलत गांवों से शहरों की ओर होने वाले पलायन में भी भारी कमी देखी गई थी।
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नए कानून की कड़वी हकीकत: अधिकार से ‘अनुमति’ तक का सफर
नए एक्ट में 125 दिन के रोजगार का वादा तो किया गया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह महज एक ‘चुनावी लालच’ है। पुराने कानून के विपरीत, अब यह मांग-आधारित नहीं रह गया है, बल्कि एक ‘बजट-कैप्ड’ और केंद्र-नियंत्रित योजना बन चुकी है। अब तक केंद्र सरकार मजदूरी का पूरा खर्च उठाती थी, लेकिन अब राज्यों पर 40% का भारी वित्तीय बोझ डाल दिया गया है, जो पहले सामग्री पर केवल 25% था। सबसे डरावना प्रावधान ‘ब्लैकआउट पीरियड’ का है, जिसके तहत खेती के पीक सीजन में काम पूरी तरह बंद किया जा सकता है। इससे ग्रामीण मजदूरों की मोलभाव करने की शक्ति खत्म हो जाएगी। साथ ही, अब यह योजना केवल केंद्र द्वारा ‘सूचित’ की गई ग्राम पंचायतों में ही लागू होगी, जिससे पंचायतों की स्वायत्तता पर केंद्र का कब्जा हो जाएगा।
विशेषज्ञों की चिंता: क्या यह एक ‘कठपुतली योजना’ है?
प्रख्यात अर्थशास्त्री जीन ड्रेज ने इस बदलाव पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे एक “कठपुतली योजना” करार दिया है। उनके अनुसार, मनरेगा बनाम VB-G RAM G के इस बदलाव में केंद्र सरकार ने सारी डोर अपने हाथ में रख ली है, जबकि बिल भुगतान की जिम्मेदारी राज्यों पर थोप दी है। यह कानून अब ग्रामीण गरीबों को उनका ‘हक’ देने के बजाय उन्हें सरकार की ‘अनुमति’ पर निर्भर बनाता है। जब यह मांग-आधारित नहीं रहेगा, तो गरीबों की कानूनी सुरक्षा स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। ड्रेज जैसे विशेषज्ञों की यह चेतावनी डराने वाली है कि यह बदलाव दरअसल “रोजगार गारंटी को नष्ट” करने का एक सुनियोजित तरीका है। फंड की कमी का बहाना बनाकर कभी भी काम रोका जा सकता है, जो अंततः गरीबी को बढ़ाने और पलायन को फिर से तेज करने का कारण बनेगा।
‘एमजीएनआरईजीए बचाओ संग्राम’ और विपक्ष का कड़ा रुख
10 जनवरी से शुरू होकर 25 फरवरी 2026 तक चलने वाला कांग्रेस का यह संग्राम गांव-गांव तक पहुंचने के लिए तैयार है। पंजाब के गुरदासपुर से लेकर असम, कर्नाटक, झारखंड, बिहार और जम्मू-कश्मीर तक पार्टी कार्यकर्ताओं ने मोर्चा संभाल लिया है। इस आंदोलन के तहत धरना, सामूहिक उपवास, अदालती चुनौतियां और जन-जागरण अभियान चलाए जा रहे हैं। कर्नाटक सरकार ने तो इस नए एक्ट को लागू करने से साफ इनकार कर दिया है और मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने की तैयारी में है। विपक्ष के शासित कई अन्य राज्य भी इसे संघीय ढांचे और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन मान रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी इसे “गरीबों पर हमला” और गांधी की विरासत को मिटाने की साजिश करार दे रहे हैं, जबकि बीजेपी इसे भ्रष्टाचार मिटाने और ‘अधिक दक्षता’ लाने का माध्यम बता रही है।
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दलितों, आदिवासियों और महिलाओं पर मंडराता संकट
ग्रामीण भारत के सबसे कमजोर तबके—दलितों, आदिवासियों और महिलाओं—के लिए यह नया कानून एक गहरा झटका है। MGNREGA के कार्यबल में इनका हिस्सा 40 से 50 प्रतिशत तक रहा है। यह योजना न केवल उन्हें मजदूरी देती थी, बल्कि ग्रामीण इलाकों में व्याप्त बंधुआ मजदूरी की बेड़ियों को तोड़ने में भी सहायक थी। लेकिन अब केंद्र की मनमानी शर्तों के कारण काम मिलना अनिश्चित हो गया है। ऐप-आधारित उपस्थिति और डिजिटल भुगतान की गड़बड़ियों ने पहले ही अनपढ़ और दूरदराज के मजदूरों को व्यवस्था से बाहर कर दिया था, और अब नया एक्ट इसे और जटिल बना देगा। गांवों में विलंबित भुगतान के कारण मजदूरों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब संपत्ति निर्माण समुदाय की जरूरतों के बजाय केंद्र सरकार के राजनीतिक एजेंडे पर निर्भर करेगा।
राजनीतिक तपिश और 2026 के चुनावी समीकरण
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि ‘SaveMGNREGA’ आंदोलन 2026 के चुनावों में सत्ताधारी दल के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। ग्रामीण असंतोष अब एक राजनीतिक हथियार का रूप ले रहा है। हालांकि सरकार ‘विकसित भारत’ के नारे के साथ अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन हकीकत यह है कि 2025-26 का मनरेगा बजट जो ₹86,000 करोड़ था, वह पहले से ही अपर्याप्त था। अब नए एक्ट में राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ने से कई राज्य सरकारें इसे लागू करने की स्थिति में नहीं हैं। यदि यह आंदोलन किसान आंदोलन की तर्ज पर फैला, तो यह सत्ताधारी गठबंधन के ग्रामीण वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकता है। ग्रामीण मतदाता नाम बदलने या नई योजनाओं के शोर से प्रभावित नहीं होते, वे रोजगार के अधिकार के साथ हुए ‘विश्वासघात’ को याद रखते हैं।
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काम की गरिमा बनाम सत्ता का खेल
मनरेगा बनाम VB-G RAM G की यह पूरी पटकथा भारतीय नीति-निर्माताओं की उस विफलता को उजागर करती है, जहां ग्रामीण कल्याण को एक राजनीतिक शतरंज की बिसात बना दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा को वास्तव में सुधारने के लिए पारदर्शी ऑडिट, बढ़ा हुआ बजट, अधिक विकेंद्रीकरण और मजदूरों की आवाज को प्राथमिकता देना जरूरी था, न कि उसे खत्म कर देना। VB-G RAM G कागज पर 125 दिन का लुभावना वादा तो करता है, लेकिन व्यवहार में यह मजदूरों की गरिमा और उनके कानूनी अधिकारों को छीनने वाला कदम नजर आता है। जैसे-जैसे यह आंदोलन गांव की गलियों में फैल रहा है और “काम चाहिए” का एंथम गूंज रहा है, यह स्पष्ट है कि हक की इस लड़ाई में असली ‘राम’ यानी ग्रामीण भारत अब खामोश नहीं रहेगा।
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