मोदी-अडानी भूटान कनेक्शन: 4,000 करोड़ ऋण से वांगचू परियोजना तक
मोदी-अडानी भूटान कनेक्शन हालिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूटान यात्रा के बाद प्रमुखता से उभर रहा है, जिसने दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों को एक नई दिशा दी है। इस यात्रा के दौरान, भारत सरकार ने भूटान को ऊर्जा परियोजनाओं का वित्तपोषण करने के लिए 4,000 करोड़ रुपये की रियायती ऋण सुविधा प्रदान करने की घोषणा की है।
यह आर्थिक सहयोग भारत की ‘पड़ोसी पहले’ नीति को दर्शाता है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक फायदा गौतम अडानी के व्यापारिक समूह तक पहुँच गया है, जिससे यह ‘कनेक्शन’ चर्चा का विषय बन गया है। इस रियायती ऋण ने हिमालयी राष्ट्र में भारतीय निजी क्षेत्र के लिए बड़े अवसर खोले हैं, विशेषकर ऊर्जा और बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में।
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ऊर्जा क्षेत्र में अडानी समूह की महत्वाकांक्षी योजनाएँ
गौतम अडानी के भूटान में शुरू होने वाले तीन महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स इस व्यापारिक सहयोग के केंद्र में हैं। इन परियोजनाओं में सबसे प्रमुख 570 मेगावाट का वांगचू जलविद्युत प्रोजेक्ट है, जिसकी अनुमानित लागत ₹6,000 करोड़ है।
इस महत्वपूर्ण परियोजना के लिए अडानी पावर और भूटान की ड्रुक ग्रीन पावर (DGPC) के बीच एक समझौता (Shareholders’ Agreement) हुआ है। यह समझौता ‘बिल्ड, ओन, ऑपरेट, ट्रांसफर’ (BOOT) मॉडल पर आधारित है, और इसका निर्माण कार्य 2026 में शुरू होने वाली है, जिसका लक्ष्य पाँच वर्षों के भीतर इसे चालू करना है।
वांगचू परियोजना भूटान की सर्दियों की चरम ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जबकि गर्मियों के महीनों में उत्पादित अतिरिक्त बिजली भारत को निर्यात की जाएगी।
5000 मेगावाट हाइड्रोपावर विकास का समझौता ज्ञापन
अडानी समूह की दूसरी बड़ी परियोजना 5000 मेगावाट हाइड्रोपावर विकास के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) है। यह समझौता वांगचू प्रोजेक्ट को इस व्यापक पहल का पहला कदम मानता है, और भविष्य की जलविद्युत और पंप स्टोरेज परियोजनाओं के लिए आगे की चर्चा का हिस्सा है।
इस पहल के माध्यम से, अडानी समूह भूटान की अपार जलविद्युत क्षमता का दोहन करने और भारत को विश्वसनीय हरित ऊर्जा निर्यात करने में डीजीपीसी के साथ मिलकर काम करेगा, जो क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देगा।
गेलेपी माइंडफुलनेस सिटी: एक और संभावित परियोजना
तीसरा प्रोजेक्ट गेलेपी माइंडफुलनेस सिटी के निर्माण का है। हालाँकि, आपके द्वारा दिए गए दावे से इसकी प्रकृति या अडानी द्वारा हासिल किए जाने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं होती है, पर इसे भी अडानी समूह द्वारा हासिल किए जाने की चर्चा है।
यह परियोजना, अगर अडानी को मिलती है, तो यह बुनियादी ढाँचे और शहरी विकास के क्षेत्र में कंपनी के पदचिह्न को भूटान में और मजबूत करेगी। ये सभी परियोजनाएँ स्पष्ट रूप से एक मजबूत मोदी-अडानी भूटान कनेक्शन की ओर इशारा करती हैं, जहाँ सरकारी नीति और निजी निवेश एक साथ चलते दिखाई देते हैं।
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व्यापारिक सौदे में रियायती ऋण की भूमिका
भारत सरकार द्वारा घोषित 4,000 करोड़ रुपये की रियायती ऋण सुविधा का व्यापारिक लाभ सीधे तौर पर अडानी समूह के प्रोजेक्ट्स तक पहुँचने का दावा किया जा रहा है। रियायती ऋण का अर्थ है कम ब्याज दर पर दिया गया कर्ज, जो भूटान के लिए ऊर्जा परियोजनाओं को वित्तपोषित करना आसान बनाता है।
इस फंडिंग से जलविद्युत जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए पूंजी जुटाने में आसानी होती है, और जब इन परियोजनाओं को अडानी समूह जैसी भारतीय निजी कंपनी क्रियान्वित करती है, तो आर्थिक लाभ स्वाभाविक रूप से उस कंपनी की ओर मुड़ जाता है।
द्विपक्षीय संबंध और आर्थिक अनिवार्यता
यह यात्रा भारत और भूटान के बीच जलविद्युत साझेदारी को नई गति देने वाली है, जिसे दोनों देशों के मैत्रीपूर्ण संबंधों की आधारशिला माना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और भूटान की प्रगति और समृद्धि एक दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। भारत पहले भी भूटान की पंचवर्षीय योजनाओं के लिए सहायता पैकेज की घोषणा कर चुका है।
भूटान 2040 तक अपनी जलविद्युत और सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता में बड़े पैमाने पर वृद्धि करने की योजना बना रहा है, जिसके लिए अडानी समूह की तकनीकी और वित्तीय क्षमता को एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखा जा रहा है। यह साझेदारी दोनों देशों के लिए ऊर्जा और आर्थिक लाभ सुनिश्चित करती है।
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मोदी-अडानी भूटान कनेक्शन और जनता के खर्च का सवाल
आपके द्वारा दिए गए अंश में एक गंभीर और व्यंग्यात्मक टिप्पणी भी शामिल है: “और हां इस यात्रा का खर्च भारत की जनता वहन करेगी वर्ना हिन्दू खतरे में पड़ जायेगा, मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ भाई।
” यह टिप्पणी परोक्ष रूप से इन व्यापारिक डीलों और आधिकारिक यात्राओं पर होने वाले सरकारी खर्च पर सवाल उठाती है, साथ ही राजनीतिक विमर्श पर भी कटाक्ष करती है।
एक तरफ द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध मजबूत हो रहे हैं और अडानी समूह जैसे भारतीय कॉर्पोरेट्स को बड़े प्रोजेक्ट्स मिल रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ इन सभी गतिविधियों का खर्च अंततः भारतीय करदाताओं पर पड़ता है। यह परिदृश्य मोदी-अडानी भूटान कनेक्शन के आर्थिक पहलू को एक राजनीतिक और सामाजिक आयाम भी देता है।
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एक जटिल साझेदारी की दास्तान
प्रधानमंत्री मोदी की भूटान यात्रा भारत-भूटान संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई है, जिसमें भारत सरकार के वित्तीय सहयोग और अडानी समूह के महत्वाकांक्षी निवेश का संगम देखने को मिला है।
मोदी-अडानी भूटान कनेक्शन अब केवल एक व्यापारिक साझेदारी नहीं, बल्कि एक जटिल आर्थिक-राजनीतिक गठजोड़ का उदाहरण बन चुका है, जहाँ रियायती ऋण जैसी सरकारी पहल निजी क्षेत्र के लिए बड़े व्यापारिक दरवाजे खोलती है। यह देखना बाकी है कि यह साझेदारी हिमालयी राष्ट्र के विकास और भारत की ऊर्जा सुरक्षा में किस प्रकार योगदान देती है।



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