नया डिजिटल गवर्नेंस मॉडल: डीपफेक पर सरकार की सख्त स्ट्राइक
मिनिस्ट्री ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (MeitY) द्वारा आईटी नियमों में किए गए हालिया संशोधनों ने देश में एक नया डिजिटल गवर्नेंस मॉडल पेश किया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि AI से बने कंटेंट के लिए लाए गए इन बदलावों से मेटा, X (पूर्व में ट्विटर) और गूगल जैसे बड़े टेक दिग्गजों के लिए कम्प्लायंस कॉस्ट और रिस्क काफी बढ़ जाएगा।
विशेष रूप से, टेकडाउन की टाइमलाइन को 36 घंटे से घटाकर केवल तीन घंटे कर दिया गया है, जिसने प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बढ़ा दिया है। यदि ये कंपनियां तय समय सीमा के भीतर गैर-कानूनी कंटेंट हटाने में विफल रहती हैं, तो उन्हें अपना ‘सेफ हार्बर’ प्रोटेक्शन खोने का खतरा झेलना पड़ सकता है।
नोटिस-एंड-टेकडाउन से एक्टिव गवर्नेंस की ओर बदलाव
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 में किए गए ये बदलाव असल में नोटिस-एंड-टेकडाउन मॉडल से एक नया डिजिटल गवर्नेंस मॉडल की ओर प्रस्थान हैं, जो पूरी तरह से एक्टिव और रूल्स-बेस्ड है।
हालांकि गैर-कानूनी कंटेंट हटाने की समय सीमा घटने से बोझ बढ़ा है, लेकिन सरकार ने ‘सिंथेटिक तरीके से बनी जानकारी’ (SGI) की लेबलिंग की कुछ शर्तों में ढील देकर संतुलन बनाने की कोशिश भी की है। कानूनी विशेषज्ञों ने इसे पहले के ड्राफ्ट की तुलना में अधिक प्रैक्टिकल बताया है, क्योंकि अब केवल भ्रामक कंटेंट पर ही मुख्य ध्यान केंद्रित किया गया है।
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3 घंटे की सख्त डेडलाइन और टेकडाउन के कड़े नियम
अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को सरकार या कोर्ट का आदेश मिलने के मात्र तीन घंटे के भीतर विवादित कंटेंट को हटाना होगा। यह समय सीमा पहले 36 घंटे हुआ करती थी। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई आदेश सुबह 11 बजे मिलता है, तो उसे दोपहर 2 बजे तक हटाना अनिवार्य होगा।
यह नियम AI-जनरेटेड और सामान्य कंटेंट, दोनों पर समान रूप से लागू होता है। इसके अलावा, बिना सहमति वाली निजी तस्वीरों (NCII) के मामलों में कंटेंट हटाने की समय सीमा को 24 घंटे से घटाकर केवल दो घंटे कर दिया गया है। नया डिजिटल गवर्नेंस मॉडल यह सुनिश्चित करता है कि डिजिटल स्पेस में किसी भी प्रकार की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
शिकायत निवारण और पुलिस अधिकारियों की नई भूमिका
यूजर शिकायतों को हल करने के लिए भी समय सीमा को काफी सख्त किया गया है। अब प्लेटफॉर्म्स को यूजर की शिकायतों को दो घंटे के भीतर स्वीकार करना होगा और उनका समाधान सात दिनों के भीतर करना होगा, जो पहले 15 दिन था।
धोखाधड़ी वाले कंटेंट या किसी की नकल (Impersonation) को फ्लैग किए जाने पर 36 घंटे के भीतर कार्रवाई करनी होगी। एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी है कि अब राज्य सरकारें डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (DIG) रैंक से ऊपर के अधिकारियों को टेकडाउन ऑर्डर जारी करने के लिए नियुक्त कर सकती हैं, जिससे पहले की ‘एक अधिकृत अधिकारी’ वाली पाबंदी खत्म हो गई है।
AI लेबलिंग और सिंथेटिक मीडिया की नई परिभाषा
पहली बार आईटी नियमों के तहत ‘सिंथेटिकली जेनरेटेड जानकारी’ को परिभाषित किया गया है। इसमें AI से बनाई गई इमेज, वीडियो और ऑडियो शामिल हैं जो असली लगते हैं। इन पर ‘AI-जनरेटेड’ का लेबल लगाना अनिवार्य होगा, जो स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
साथ ही, कंपनियों को मेटाडेटा एम्बेड करना होगा ताकि कंटेंट बनाने वाले कंप्यूटर रिसोर्स का पता लगाया जा सके। नया डिजिटल गवर्नेंस मॉडल के तहत कंपनियों को इन लेबल को हटाने या मॉडिफाई करने की अनुमति नहीं होगी। हालांकि, रूटीन एडिटिंग जैसे फिल्टर लगाना, वीडियो कंप्रेस करना या बैकग्राउंड नॉइज हटाने के लिए लेबलिंग की जरूरत नहीं होगी।
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बैन AI कंटेंट: क्या है गैर-कानूनी और वर्जित?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि कंपनियों को ऐसे AI कंटेंट को रोकना होगा जो भारतीय न्याय संहिता और POCSO एक्ट के तहत प्रतिबंधित हैं। इसमें बच्चों के यौन शोषण का मटीरियल (CSAM), अश्लील सामग्री, नकली सरकारी दस्तावेज, या विस्फोटक बनाने के निर्देश वाले वीडियो शामिल हैं।
विशेष रूप से राजनीतिक हस्तियों और सेलिब्रिटी के मामले में, चुनाव उम्मीदवारों के भड़काऊ डीपफेक, मनगढ़ंत एंडोर्समेंट और फर्जी न्यूज फुटेज पर पूरी तरह प्रतिबंध है। टेक इंटरमीडियरी को हर तीन महीने में यूजर्स को इन नियमों के बारे में सूचित करना होगा और उल्लंघन करने पर अकाउंट बंद करने की चेतावनी देनी होगी।
पुराने ड्राफ्ट और फाइनल रूल्स के बीच का अंतर
बुधवार, 11 फरवरी को अधिसूचित किए गए ये नियम 20 फरवरी, 2026 से प्रभावी होंगे। दिलचस्प बात यह है कि फाइनल रूल्स अक्टूबर 2025 के ड्राफ्ट से काफी अलग हैं। पहले के ड्राफ्ट में 10% विजुअल डिस्प्ले को कवर करने वाले सख्त वॉटरमार्क का प्रस्ताव था, जिसका इंडस्ट्री बॉडी IAMAI ने विरोध किया था।
फाइनल नियमों में इस ‘साइज-बेस्ड’ जरूरत को हटा दिया गया है और इसकी जगह ‘उचित प्रयासों’ (Reasonable efforts) और ‘इंटेंट-बेस्ड’ फोकस को शामिल किया गया है। नैसकॉम के अनुसार, यह एक सकारात्मक बदलाव है जो नेकनीयती से किए गए रूटीन एडिट्स को छूट देता है।
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डीपफेक की रिपोर्ट: नागरिकों के लिए स्टेप-बाय-स्टेप गाइड
यदि कोई नागरिक डीपफेक का शिकार होता है, तो वह ‘cybercrime.gov.in’ पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर सकता है। शिकायत दर्ज करने से पहले स्क्रीनशॉट, URL और मैसेज जैसे सबूत इकट्ठा करना जरूरी है। पोर्टल पर ‘दूसरे साइबर क्राइम की रिपोर्ट करें’ विकल्प चुनकर नाम और मोबाइल नंबर से रजिस्टर करें और OTP वेरिफिकेशन के बाद घटना की जानकारी भरें।
तत्काल सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर ‘1930’ पर भी कॉल किया जा सकता है। इसके अलावा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के इन-ऐप रिपोर्टिंग टूल का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। नियमों का पालन न करने पर प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ आपराधिक मामला भी चलाया जा सकता है।
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