पान मसाला अब महंगा: लोकसभा ने हेल्थ और सिक्योरिटी सेस बिल पास किया
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान एक महत्वपूर्ण विधायी कदम उठाते हुए लोकसभा ने शुक्रवार को ‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस बिल, 2025’ (स्वास्थ्य सुरक्षा से राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर विधेयक) को पारित कर दिया है। इस नए कानून के लागू होने से पान मसाला अब महंगा हो जाएगा, क्योंकि केंद्र सरकार को पान मसाला विनिर्माण इकाइयों पर एक विशेष उपकर (Cess) लगाने का अधिकार मिल गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सदन में स्पष्ट किया कि इस सेस से प्राप्त राजस्व का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जाएगा।
यह विधेयक केंद्र सरकार को न केवल पान मसाला बल्कि भविष्य में अधिसूचित किसी भी अन्य ‘अवगुण वस्तु’ (Demerit Goods) पर भी उपकर लगाने का अधिकार देता है। सीतारमण ने बताया कि चूंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए एकत्रित राजस्व को राज्यों के साथ साझा किया जाएगा, जबकि रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा केंद्र की जिम्मेदारी रहेगी।
मशीनों की क्षमता के आधार पर लगेगा नया सेस
इस नए कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सेस उत्पादन की मात्रा पर नहीं, बल्कि मशीनों की उत्पादन क्षमता पर लगाया जाएगा। वित्त मंत्री ने समझाया कि जीएसटी (GST) व्यवस्था के तहत कर खपत (Consumption) पर आधारित होता है, लेकिन पान मसाला जैसे उत्पादों पर चोरी रोकने के लिए उत्पादन क्षमता के आधार पर सेस लगाना जरूरी था।
उदाहरण के लिए, एक मशीन जो प्रति मिनट 500 पाउच तक पैक करती है और प्रत्येक पाउच का वजन 2.5 ग्राम तक है, उस पर हर महीने 1.01 करोड़ रुपये का सेस लगेगा। वहीं, जो मशीनें प्रति मिनट 1,001 से 1,500 पाउच पैक करती हैं और पाउच का वजन 10 ग्राम से अधिक है, उन पर 25.47 करोड़ रुपये प्रति माह का भारी-भरकम सेस लगाया जाएगा। जो फैक्ट्रियां पूरी तरह से हाथ से (मैनुअल) उत्पादन करती हैं, उन्हें हर महीने 11 लाख रुपये का फिक्स्ड सेस देना होगा।
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मैन्युफैक्चरर्स के लिए सख्त नियम और पेनल्टी
नया कानून पान मसाला निर्माताओं के लिए काफी सख्त प्रावधान लेकर आया है। मैन्युफैक्चरर्स को अब सेस की रकम खुद कैलकुलेट करनी होगी और हर महीने का रिटर्न फाइल करना होगा। अगर पेमेंट में देरी होती है, तो उन्हें ब्याज देना होगा। विधेयक में सख्त ऑडिट सिस्टम और नियमों का पालन न करने पर पेनल्टी का भी प्रावधान है। गंभीर अपराधों के मामलों में जेल की सजा भी हो सकती है।
यह बिल सरकार को यह अधिकार भी देता है कि अगर जनहित में जरूरी समझा जाए, तो वह तय रकम से दोगुना तक सेस रेट बढ़ा सकती है। हालांकि, ऐसी कोई भी बढ़ोतरी सिर्फ एक निश्चित समय के लिए ही लागू होगी। इस सख्ती का सीधा असर बाजार पर दिखेगा और उपभोक्ताओं के लिए पान मसाला अब महंगा साबित होगा।
जीएसटी और एक्साइज ड्यूटी से अलग होगा यह सेस
निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि मौजूदा जीएसटी व्यवस्था के तहत पान मसाला पर अधिकतम 40% टैक्स (28% जीएसटी + कंपनसेशन सेस) लगता रहेगा। नया सेस एक अतिरिक्त शुल्क होगा और इससे मौजूदा जीएसटी राजस्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने बताया कि चूंकि जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर (Compensation Cess) खत्म होने वाला है, इसलिए वह हिस्सा अब 40% सेस में बदल जाएगा।
वित्त मंत्री ने कहा कि सिगरेट पर पहले से ही एक्साइज ड्यूटी लगती है, लेकिन पान मसाला एक्साइज श्रेणी में नहीं आता था। इसलिए, इस नए कानून के जरिए सरकार उत्पादन-आधारित कर (Production-Based Tax) लगा रही है। इसका उद्देश्य ‘अवगुण वस्तुओं’ (Sin Goods) के इस्तेमाल को हतोत्साहित करना और महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए धन जुटाना है।
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विपक्ष की चिंताएं और तीखी बहस
लोकसभा में इस बिल पर तीखी बहस हुई। कांग्रेस सांसद शशिकांत सेंथिल ने इसे केंद्र सरकार के लिए एक “ब्लैंक चेक” बताया और कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि किन स्वास्थ्य या सुरक्षा योजनाओं को फंड किया जाएगा। उन्होंने सख्त सजा के प्रावधानों की तुलना मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) से की। डीएमके सांसद टी. सुमति ने बिल के नाम में “से” शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाया और इसे भाषाई रूप से तटस्थ बनाने की मांग की।
तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय ने वित्त मंत्री के हिंदी में बोलने पर आपत्ति जताई। कांग्रेस सांसद प्रभा मल्लिकार्जुन ने फेडरलिज्म (संघवाद) का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सेस डिविजिबल पूल से बाहर होता है, इसलिए राज्यों को उनका पूरा हिस्सा नहीं मिलेगा। एनसीपी-एसपी सांसद सुप्रिया सुले ने पूछा कि इसे टैक्स के बजाय सेस के रूप में क्यों पेश किया गया। निर्दलीय सांसद उमेशभाई पटेल और आरएलपी के हनुमान बेनीवाल ने कहा कि प्रतिबंध के बजाय इन उत्पादों का विनियमन (Regulation) होना चाहिए क्योंकि प्रतिबंध बेअसर साबित हुए हैं।
सरकार का तर्क: स्वास्थ्य और सुरक्षा सर्वोपरि
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि सरकार का इरादा खराब चीजों को महंगा करना और राष्ट्रीय जरूरतों के लिए संसाधन जुटाना है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ के तहत देश के प्रमुख स्थानों और औद्योगिक केंद्रों के चारों ओर अभेद्य सुरक्षा कवच बनाने की बात कही है। इसके लिए रक्षा बलों के आधुनिकीकरण की आवश्यकता है, जिसके लिए अतिरिक्त राजस्व चाहिए।
उन्होंने यह भी बताया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने आधुनिक युद्ध की वास्तविकता को दिखाया है जो टेक्नोलॉजी और सटीक प्रणालियों पर निर्भर है। सीतारमण ने कहा कि सरकार ने इनकम टैक्स कम करके और जीएसटी में बदलाव करके लोगों को राहत दी है, इसलिए अब राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए यह कदम जरूरी है। इसका मतलब साफ है कि पान मसाला अब महंगा होकर देश की सुरक्षा और स्वास्थ्य में योगदान देगा।
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2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य
बहस में हिस्सा लेते हुए बीजेपी सांसद धवल पटेल ने कहा कि 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों ही बहुत जरूरी हैं। उन्होंने बताया कि पिछले 11 सालों में जीडीपी में सरकारी स्वास्थ्य खर्च का हिस्सा तेजी से बढ़ा है। सरकार का अनुमान है कि प्रस्तावित सेस मौजूदा वित्तीय वर्ष के सकल कुल राजस्व का लगभग 6.1% होगा।
यह विधेयक 1 दिसंबर, 2025 को पेश किया गया था और अब लोकसभा से पास होने के बाद यह कानून बनने की दिशा में आगे बढ़ गया है। सरकार के पास अब नई लेवी लागू करने का साफ रास्ता है, जिससे पान मसाला उद्योग पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा।
आगे की राह और प्रभाव
लोकसभा की मंजूरी के बाद अब यह तय है कि पान मसाला अब महंगा होगा और इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। सरकार का मानना है कि इससे न केवल राजस्व बढ़ेगा बल्कि तंबाकू उत्पादों के सेवन में भी कमी आएगी, जो हर साल लाखों मौतों का कारण बनते हैं।
यह सेस भविष्य में अन्य अधिसूचित उत्पादों पर भी लागू किया जा सकता है, जिससे सरकार को एक लचीला वित्तीय साधन मिल गया है। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकारें और उद्योग जगत इस नए कानून पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं और इसका जमीनी स्तर पर क्या असर होता है।
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