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पशुपालकों का आजीविका संकट: अडानी पोर्ट्स को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत

पशुपालकों का आजीविका संकट

पशुपालकों का आजीविका संकट आज गुजरात के कच्छ जिले के नविनाल गांव में एक क्रूर वास्तविकता बन चुका है, जहां 231 हेक्टेयर (करीब 570 एकड़) गौचर भूमि मुंद्रा पोर्ट (अब अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड लिमिटेड) को आवंटित कर दी गई।

यह विवाद साल 2005 का है, जब गुजरात सरकार ने, जिसके मुख्यमंत्री तब नरेंद्र मोदी थे, चरागाह के लिए आरक्षित इस भूमि को औद्योगिक उपयोग के लिए अडानी समूह को सौंप दिया था।

यह आवंटन बिना किसी वैकल्पिक चरागाह या पर्याप्त मुआवजे के ठोस इंतजाम के किया गया, जिससे स्थानीय पशुपालकों के सामने अपने पशुओं को चराने की गंभीर समस्या पैदा हो गई। विकास के नाम पर ग्रामीणों की आजीविका और स्थानीय पारिस्थितिकी को जिस तरह कुर्बान किया गया, वह क्रोनी कैपिटलिज्म का एक जीता-जागता प्रमाण पेश करता है।

2005 का सरकारी फैसला और ग्रामीणों का 19 साल लंबा कानूनी संघर्ष

ग्रामीणों ने इस अन्याय के खिलाफ 2010-11 में तब आवाज उठाई जब कंपनी ने भूमि की फेंसिंग शुरू की। इसके बाद 2011 में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई, जिसमें दावा किया गया कि यह भूमि उनकी पारंपरिक अर्थव्यवस्था और आजीविका का आधार है।

सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया कि उन्होंने 37.39 लाख रुपये और 30% प्रीमियम के रूप में मुआवजा दिया है, लेकिन ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यह राशि उनके नुकसान के मुकाबले बेहद अपर्याप्त थी।

अडानी समूह द्वारा दी जाने वाली CSR गतिविधियां भी उन पशुपालकों के लिए कोई असली राहत नहीं ला सकीं, जिनकी गाय-भैंसें बिना चारे के भूखी मर रही हैं। पिछले 19 सालों से गरीब किसान और पशुपालक न्याय की उम्मीद में अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।

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सुप्रीम कोर्ट का झटका: हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई रोक

जनवरी-फरवरी 2026 में जस्टिस जेके महेश्वरी और अतुल चंदुरकर की बेंच द्वारा दिया गया सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला ग्रामीणों के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ है। शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के जुलाई 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें 108 हेक्टेयर (करीब 266 एकड़) भूमि वापस लेकर गांववालों को लौटाने का निर्देश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का यह फैसला “प्राकृतिक न्याय” के सिद्धांत का उल्लंघन है, क्योंकि अडानी पोर्ट्स को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया। कोर्ट ने फिलहाल ‘स्टेटस क्वो’ (यथास्थिति) बनाए रखने का आदेश दिया है, जिसका सीधा अर्थ है कि विवादित भूमि अभी भी अडानी के कब्जे में ही रहेगी।

कॉर्पोरेट हितों के सामने दबती ग्रामीणों की जायज मांगें

ग्रामीणों का दावा है कि मुंद्रा पोर्ट के विस्तार ने न केवल उनका चरागाह छीना, बल्कि स्थानीय मछुआरों और किसानों की आजीविका को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। इस औद्योगिक विस्तार से तटीय पारिस्थितिकी तंत्र (Coastal Ecosystem) बर्बाद हो गया है, मैंग्रोव्स काटे गए हैं और प्रदूषण के कारण पारिस्थितिकी असंतुलन पैदा हुआ है।

2005 में कुल 276 एकड़ गौचर भूमि आवंटित की गई थी, जिसमें नविनाल का हिस्सा सबसे बड़ा था। ग्रामीणों ने तर्क दिया कि वैकल्पिक गौचर की कमी से उनका पशुधन खत्म हो रहा है, जिससे पशुपालकों का आजीविका संकट और भी भयावह हो गया है। हाईकोर्ट ने भी अप्रैल 2024 में नोट किया था कि गौचर की कमी की भरपाई कैसे होगी, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है।

अडानी समूह का दावा और जमीनी हकीकत के बीच की खाई

अडानी पोर्ट्स का दावा है कि इस भूमि विवाद से उनके कामकाज पर कोई ‘मटेरियल इम्पैक्ट’ नहीं पड़ेगा और उन्होंने CSR के माध्यम से काफी निवेश किया है। हालांकि, गांववालों के लिए CSR महज एक दिखावा है, क्योंकि उनके प्राकृतिक संसाधन और जमीन उनसे छीन लिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के स्टेटस क्वो आदेश से अडानी को सीधा फायदा हुआ है, क्योंकि सुनवाई की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू होगी और तब तक भूमि उनके पास ही रहेगी।

आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह महज एक संयोग है कि मोदी-अडानी नेक्सस से जुड़े हर विवाद में कॉर्पोरेट को अदालतों से तकनीकी आधार पर राहत मिल जाती है, जबकि आम जनता न्याय के लिए तरसती रहती है।

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पशुधन की मौत और तबाही की कगार पर गांव की अर्थव्यवस्था

यह मुद्दा केवल एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय अन्याय का प्रतीक है। कच्छ के कोस्टल बेल्ट में पशुपालन ही जीवन का आधार था, लेकिन अब पशुपालकों का आजीविका संकट इतना गहरा गया है कि गांव की पारंपरिक अर्थव्यवस्था तबाह हो रही है।

बिना चारे के पशुओं की मौत और संसाधनों के अभाव ने ग्रामीणों को हाशिए पर धकेल दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को नए सिरे से फैसला लेने को कहा है और अडानी को दो हफ्ते में अपनी आपत्तियां दाखिल करने का मौका दिया है, लेकिन ग्रामीणों को डर है कि उनके वकीलों की ताकत के सामने उनकी आवाज फिर से अनसुनी रह जाएगी।

मोदी-अडानी नेक्सस: सार्वजनिक संसाधनों का निजीकरण

विपक्ष इस पूरे प्रकरण को मोदी-अडानी क्रोनी कैपिटलिज्म का काला अध्याय कह रहा है। 2005 में जब यह भूमि आवंटित की गई, तब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे और आज केंद्र में भी उनका प्रभाव अटूट है। यह दिखाता है कि कैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के नाम पर सार्वजनिक संसाधनों को निजी हाथों में सौंप दिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा “निष्पक्ष सुनवाई” का हवाला देकर हाईकोर्ट के आदेश को पलटना समय बर्बाद करने की एक प्रक्रिया लगती है। इतिहास गवाह है कि ऐसे मामलों में कानूनी पेचीदगियों का फायदा हमेशा अमीरों को मिलता है, जबकि गरीबों के लिए कानून कठोर और थका देने वाला साबित होता है।

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लोकतंत्र के आधार पर प्रहार और न्याय का इंतजार

चुनावी मौसम में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को एक सुनहरा हथियार बना सकते हैं, यह पूछने के लिए कि सरकार हमेशा अडानी के साथ क्यों खड़ी होती है। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश कि नई सुनवाई हो, ग्रामीणों की उम्मीदों पर पानी फेरने जैसा है, क्योंकि सिस्टम उन्हें लगातार थका रहा है।

यह मामला चेतावनी देता है कि अगर भूमि, पानी और आजीविका जैसे जनता के संसाधनों का इसी तरह दोहन होता रहा, तो लोकतंत्र का आधार हिल जाएगा। पशुपालकों का आजीविका संकट एक गंभीर मानवीय त्रासदी है, जिसका समाधान केवल कागजी सुनवाइयों में नहीं, बल्कि जमीन वापस लौटाने में है। फिलहाल, नविनाल के ग्रामीणों की 19 साल पुरानी लड़ाई और लंबी खिंच गई है।

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