अनियंत्रित पलायन: चंडीगढ़ में बढ़ते अपराधों का कारण?
चंडीगढ़ में अनियंत्रित पलायन और अपराधिक चिंता
चंडीगढ़ क्षेत्र में हाल की घटनाएँ गंभीर चिंता पैदा कर रही हैं। तीन दिनों में पाँच हत्याएँ हुईं। इनमें से तीन सोमवार और मंगलवार की रात को हुईं। यह चिंताजनक स्थिति है। चंडीगढ़ को सुरक्षा के लिहाज से अग्रणी माना जाता है। यहाँ पुलिसकर्मियों का घनत्व पंजाब-हरियाणा से अधिक है।
दिन-रात गश्त और निगरानी के पुख्ता इंतज़ाम हैं। हर सेक्टर में रात को पीसीआर वैन तैनात रहती हैं। अनियंत्रित पलायन के कारण यह सुरक्षा चक्रव्यूह टूटता दिख रहा है।
एक ही रात में दो हत्याएँ होना विचलित करने वाला है। चंडीगढ़ की राम दरबार और मलोया में हत्याएँ हुईं। पंचकूला के सेक्टर 26 में तीसरी हत्या हुई। तीनों घटनाओं के पीड़ित और आरोपी युवा थे। ये हत्याएँ मामूली कारणों से हुईं।
इससे एक चौंकाने वाला तथ्य उजागर होता है। युवाओं के मन से कानून का डर गायब हो रहा है। अनियंत्रित पलायन से आए युवक अक्सर ऐसे अपराधों में शामिल पाए जाते हैं।
अनियंत्रित पलायन युवा पीढ़ी पर अपराधिक मानसिकता का असर
राम दरबार में मृतक रमन चड्ढा मात्र 22 वर्ष का था। हमलावर भी लगभग इसी उम्र के थे। मलोया में शिकार हुआ दया सिर्फ 18 वर्ष का किशोर था। हमलावर गिरोह भी कम उम्र के युवाओं का था। इनसे 18 घंटे पहले भी हत्या हुई थी। चंडीगढ़ के इंदिरा कॉलोनी के पास 19 वर्षीय संजीव की चाकू से हत्या हुई। इस मामले में भी आरोपी युवा ही है।
पंचकूला में मारे गए 21 वर्षीय रोशन के आरोपी की उम्र 19 वर्ष है। यह स्पष्ट संकेत है। नई पीढ़ी तेजी से अपराधिक प्रवृत्ति की ओर बढ़ रही है। अनियंत्रित पलायन से आबादी घनत्व बढ़ा है। इससे सामाजिक नियंत्रण भी कमजोर हुआ है।
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इस साल अब तक चंडीगढ़ में 15 हत्याएँ
इस साल अब तक चंडीगढ़ में 15 हत्याएँ दर्ज हुई हैं। इनमें से 12 हत्याएँ चाकूघोंपने से हुईं। दो मौतें मारपीट से और एक गोली लगने से हुई। इसी तरह, ज़ीरकपुर में भी चाकू से हुई 8 हत्याएँ दर्ज की गईं। मोहाली और पंचकूला में बंदूकों के इस्तेमाल में वृद्धि दिखी।
इन अपराधों में तेज़ी के लिए बेहतर रणनीति ज़रूरी है। पुलिस प्रशासन को अधिक जवाबदेह और सतर्क रहना होगा। अनियंत्रित पलायन से उपजी स्थितियाँ इन्हें बढ़ावा दे रही हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से पलायन
अनियंत्रित पलायन का गहरा प्रभाव दिख रहा है। आँकड़े एक स्पष्ट संबंध दर्शाते हैं। तेज़ शहरीकरण और अन्य राज्यों से युवाओं का पलायन हुआ है। विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से पलायन हुआ है। इससे गंभीर और जानलेवा अपराधों में भारी वृद्धि हुई है।
पहले प्रवासी मेहनती और साधारण जीवन जीते थे। वे परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने आते थे। अपनी कमाई से वे घर पर बच्चों का बेहतर पालन करते थे।
अब स्थिति बदल चुकी है। उन प्रवासियों की तीसरी-चौथी पीढ़ी यहाँ आ रही है। पंजाबी युवा विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। स्थानीय युवाओं में हाथ से काम करने की प्रवृत्ति घटी है। इस कारण प्रवासी युवाओं को आसानी से काम मिल रहा है।
परन्तु इसके साथ ही मूल्यों का ह्रास भी हो रहा है। विनम्रता और ज़िम्मेदारी की भावना कमजोर हुई है। अनियंत्रित पलायन ने सांस्कृतिक मूल्यों पर प्रहार किया है।
उत्तर प्रदेश और बिहार की तुलना में यहाँ दैनिक मज़दूरी दोगुनी है। काम भी आसानी से उपलब्ध होता है। साथ ही, अपराध के बाद वाहन से भागना आसान है। यह विशेषताएँ गैंगस्टर नेताओं को आकर्षित कर रही हैं। चंडीगढ़ में पिछले 15 दिनों की 9 हत्याओं पर गौर करें।
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अनियंत्रित पलायन से सामाजिक स्थिरता
अधिकांश आरोपी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले प्रवासी थे। यह प्रवृत्ति हमारे सामाजिक ताने-बाने के लिए ख़तरा है। अनियंत्रित पलायन सामाजिक स्थिरता को कमजोर करता है।
प्रवासन को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। न ही रोकना उचित होगा। लेकिन इसे नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है। संबंधित राज्यों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति देखनी होगी। स्थानीय स्तर पर रोज़गार की उपलब्धता भी जाँचनी होगी।
महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में प्रवासियों के विरुद्ध आवाजें
महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में आवाज़ें उठ रही हैं। वे अनियंत्रित पलायन के विरुद्ध हैं। कुछ नियम लागू होने लगे हैं। प्रत्येक प्रवासी को पुलिस रिकॉर्ड साथ लाना होगा।
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निष्कर्ष: प्रत्येक राज्य को रोज़गार के अवसर बढ़ाने होंगे
15 दिन से अधिक रुकने पर पंजीकरण अनिवार्य है। कुछ व्यवसायों में स्थानीय विशेषज्ञता को प्राथमिकता दी जा रही है। बाहरी लोगों पर प्रतिबंध की माँग उठ रही है। ये माँगें राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर ज़ोर पकड़ रही हैं। पंजाब और चंडीगढ़ को भी सक्रिय होना चाहिए। अनियंत्रित पलायन पर अंकुश लगाने के उपाय करने होंगे।
सामुदायिक निगरानी और समन्वय को बढ़ावा देना होगा। स्थानीय युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर बढ़ाने होंगे। प्रवासी समुदायों के साथ सामाजिक एकीकरण ज़रूरी है। इससे ही सुरक्षा और सद्भाव बहाल हो सकता है। अनियंत्रित पलायन की चुनौती बहुआयामी है। इसके लिए समग्र नीतिगत प्रयासों की आवश्यकता है।



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