1969 अहमदाबाद दंगे: RSS की साजिश और “गुजरात सांप्रदायिक हिंसा”।
गुजरात सांप्रदायिक हिंसा के इतिहास में 1969 के अहमदाबाद दंगे एक ऐसा काला पन्ना है, जिसकी भयावहता आज भी समाज को चेतावनी देती है। इन दंगों ने गुजरात की शांति को रक्तरंजित कर दिया था। इस पूरे घटनाक्रम की जाँच के लिए गुजरात सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति जगमोहन रेड्डी आयोग की 1971 की रिपोर्ट ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), जनसंघ और हिंदू महासभा जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों की साज़िशों को स्पष्ट रूप से बेनकाब किया।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा कि इन संगठनों ने अहमदाबाद में हिंसा को न सिर्फ उकसाया, बल्कि व्यवस्थित रूप से अंजाम भी दिया। यह कोई सहज विद्रोह नहीं, बल्कि एक ठंडे दिमाग वाली साजिश थी, जिसके तहत दंगों से पहले ही मतदाता सूचियों का दुरुपयोग करके मुस्लिम घरों और संपत्तियों की पहचान की गई थी, और फिर उन पर सुनियोजित हमले किए गए।
रेड्डी आयोग ने इस पूर्वनियोजित हिंसा का बीज बोने का मुख्य दोष सीधे तौर पर आरएसएस पर डाला, साथ ही पुलिस की निष्क्रियता पर भी उंगली उठाई। रिपोर्ट के अनुसार, इन दंगों में 660 मौतें हुईं, जिनमें 430 मुस्लिम थे। इसके अलावा, 1074 लोग घायल हुए (जिनमें 592 मुस्लिम), 48,000 लोग बेघर हुए, और 42 मिलियन रुपये की संपत्ति नष्ट हुई, जिसमें ज्यादातर मुस्लिमों की संपत्तियां थी।
यह दस्तावेज़ आज भी चेतावनी देता है कि सांप्रदायिक विचारधारा कैसे समाज को विषैला बना सकती है, और न केवल गुजरात बल्कि पूरे भारत के ताने-बाने को चीर सकती है। आयोग ने यह भी नोट किया कि 1960-69 के बीच गुजरात में 2938 सांप्रदायिक घटनाएं हुईं, लेकिन 1969 की हिंसा सबसे भयावह थी, जो पूर्वनियोजित संगठनों की देन थी।
गोलवलकर की रैली और आरएसएस की पूर्वनियोजित भूमिका
आरएसएस की भूमिका को नकारना इतिहास से धोखा है। आयोग ने पाया कि दंगों से पहले दिसंबर 1968 में आरएसएस प्रमुख एम.एस. गोलवलकर की तीन दिवसीय रैली मणिनगर में हुई थी। इस रैली में उन्मादी भाषणों ने हिंदू-मुस्लिम विभाजन की आग भड़काई।
गोलवलकर ने ‘हिंदू राष्ट्र’ की मांग की और कहा कि अल्पसंख्यकों के लिए विशेष कानून हैं लेकिन हिंदुओं के लिए नहीं, जिसके लिए उन्होंने विभाजन के दौरान पाकिस्तान में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों का जिक्र करते हुए जहर बोया। आयोग के अनुसार, यह रैली दंगों का प्रत्यक्ष बीज साबित हुई, क्योंकि गोलवलकर के ‘राम को अपना हीरो मानो’ जैसे बयानों ने हिंदू एकता के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाने की भावना जगाई।
आरएसएस और जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने जुलूस निकालकर मस्जिदों पर गुलाल फेंकना, ‘विरोध करने वाले को चूरन करने’ जैसे नारे लगाना और उकसावे भरे भाषणों से हिंसा को पूर्वनियोजित रूप दिया। आयोग के सबूत बताते हैं कि आरएसएस सदस्य सक्रिय रूप से भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे, और जनसंघ नेता बालराज मधोक ने 14-15 सितंबर को जहरीले भाषण दिए थे।
यह सब ‘हिंदू धर्म रक्षा समिति’ के बैनर तले अंजाम दिया गया, जो आरएसएस द्वारा ही गठित की गई थी। आयोग ने स्पष्ट कहा कि ये संगठन हिंसा में सीधे लिप्त थे, और उनकी रणनीति अल्पसंख्यकों को कमजोर करने की थी। गुजरात सांप्रदायिक हिंसा को भड़काने में इन संगठनों की भूमिका निर्णायक थी। जनवरी 1969 में अहमदाबाद में 2000 स्वयंसेवकों का आरएसएस कैंप भी तनाव बढ़ाने वाला था।
दंगों की भयावहता और घेटोकरण की शुरुआत
दंगों की भयावहता आंकड़ों और घटनाक्रम में छिपी है। 18 सितंबर 1969 को जगन्नाथ मंदिर के पास एक छोटी झड़प, जहां हिंदू साधुओं और मुस्लिमों के बीच बहस हुई, से शुरू हुई आग अहमदाबाद से फैलकर वडोदरा, मेहसाणा, नडियाद, आनंद और गोंडल तक पहुंची।
आयोग ने माना कि मिल वर्कर्स की बेरोजगारी (1960 के दशक में सात बड़ी मिलें बंद होने से 17,000 हिंदू श्रमिक बेरोजगार हुए थे) और स्लम्स का विस्तार पृष्ठभूमि थे, लेकिन मुख्य ट्रिगर आरएसएस का सांप्रदायिक उकसावा था।
मुस्लिम परिवारों पर व्यवस्थित हमले, लूटपाट, आगजनी और हत्याओं ने शहर को घेटो में बदल दिया। दंगों में 37 मस्जिदें, 50 दरगाहें और 6 कब्रिस्तान नष्ट किए गए। आयोग ने वडोदरा में पाया कि मुस्लिम दुकानों को पहले से चिह्नित किया गया था, जो पूर्वनियोजित हिंसा का प्रमाण था।
अनौपचारिक अनुमान 2000 मौतों तक बताते हैं, और 50,000 से अधिक बेघर हुए। मुस्लिम बहुल इलाकों जैसे जमालपुर में मतदाता सूचियों से घर पहचाने गए, और संगठित भीड़ ने उन्हें जिंदा जलाया। ये दंगे गुजरात में घेटोकरण की शुरुआत थे, जहां अल्पसंख्यक आज भी उस ट्रॉमा की छाया में जीते हैं, और शहर की सामाजिक संरचना हमेशा के लिए बदल गई।
पुलिस की मिलीभगत और आयोग के चौंकाने वाले खुलासे
पुलिस की मिलीभगत पर आयोग का खुलासा चौंकाने वाला है। छह मामलों में पुलिस स्टेशनों के पास मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। आयोग ने पाया कि आरएसएस के जुलूसों को रोकने की बजाय अनदेखा किया गया, जो सांप्रदायिक पूर्वाग्रह का स्पष्ट प्रमाण था।
पुलिस अधिकारियों ने आरएसएस के इशारे पर काम किया, जिससे निर्दोषों का खून बहा। 39 मुस्लिम पूजा स्थलों को जो पुलिस स्टेशनों के निकट थे नुकसान पहुंचा, जबकि हिंदू स्थलों को छुआ तक नहीं गया।
आयोग ने कहा कि यह निष्क्रियता संयोग नहीं, बल्कि राज्य तंत्र में घुसी नफरत की जड़ थी। पुलिस ने कर्फ्यू पासों का दुरुपयोग भी किया, कांग्रेस हाउस से अकेले 5000 पास वितरित हुए, जिससे कर्फ्यू नाममात्र का रहा। आयोग ने सुधार की सिफारिश की, जैसे सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से मुक्त पुलिस प्रशिक्षण, लेकिन उसकी ये सिफारिशें अनसुनी रहीं।
विशेष जांच दस्ते (SIS) पर आरोप लगा कि उन्होंने मुसलमानों को फंसाने और हिंदुओं को बचाने का काम किया, जो सांप्रदायिक भेदभाव का प्रमाण था। इस निष्क्रियता ने हिंसा को हवा दी, और आयोग ने इसे ‘खुफिया विफलता और सत्य को दबाने की साजिश’ कहा।
आरएसएस ने अपनी संलिप्तता छिपाने के हर हथकंडे अपनाए, लेकिन आयोग के मजबूत सबूतों, गवाहियों, दस्तावेज़ों और रिपोर्ट्स ने उन्हें बेनकाब कर दिया। जनसंघ के नेता भी इसमें लिप्त थे, जो आरएसएस की छत्रछाया में काम करते थे। रिपोर्ट में दर्ज गवाहियां बताती हैं कि मतदाता सूचियों का दुरुपयोग कैसे हुआ, यह एक संगठित ऑपरेशन था, जहां दंगाई मुस्लिम घरों तक पहुंचे और व्यवस्थित लूटपाट की।
आयोग ने कहा कि आरएसएस कार्यकर्ताओं ने भीड़ को संगठित किया, और उनके भाषणों ने ‘हिंदू एकता’ के नाम पर नफरत फैलाई। आज जब शताब्दी वर्ष मना रहा आरएसएस खुद को सांस्कृतिक संगठन बताता है, तो 1969 की यह रिपोर्ट उसकी इस झूठ पर एक करारा तमाचा है।
आयोग ने नोट किया कि आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठनों ने सत्य को दबाने की कोशिश की, लेकिन सबूत इतने मजबूत थे कि उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सका। गुजरात सांप्रदायिक हिंसा का यह अध्याय नफरत की राजनीति का एक स्पष्ट उदाहरण है।
विभाजनकारी राजनीति की विरासत और अनसुनी सिफारिशें
इस दंगे ने गुजरात की सामाजिक संरचना को स्थायी रूप से घायल और क्षतिग्रस्त कर दिया, तथाकथित कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद को मजबूत आधार दिया। आयोग ने चेताया कि ऐसी हिंसा सांप्रदायिक संगठनों की देन है, जो ‘राष्ट्र सेवा’ के नाम पर विभाजन का जहर बोते हैं।
1969 ने घेटोकरण की प्रक्रिया शुरू की, मुस्लिम परिवार पुराने शहरों से पलायन कर ‘सुरक्षित’ इलाकों में चले गए, जिससे अहमदाबाद की मिश्रित बस्तियां टूट गईं। आयोग ने पाया कि दंगों ने हिंदू-मुस्लिम सद्भावना को चूर-चूर कर दिया, और गांधीवादी सहमति का अंत कर दिया।
आरएसएस की विचारधारा ने दंगों को हथियार बनाया, जिसके परिणामस्वरूप हजारों परिवार उजड़ गए, और भारी आर्थिक नुकसान से मिल उद्योग और भी कमजोर हुए।
इतिहास की किताबों में यह अध्याय मिटाने की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन सच्चाई दब नहीं सकती। दंगों ने राजनीतिक ध्रुवीकरण को जन्म दिया, जहां कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद मजबूत हुआ, और गुजरात की सामाजिक एकता में जहर घुल गया। अंततः, रेड्डी आयोग की रिपोर्ट एक आईना है जो भारत के लोकतंत्र को दिखाती है कि नफरत की राजनीति कितनी घातक है।
1969 के अहमदाबाद के दंगे को भड़काने में आरएसएस की भूमिका निर्णायक थी, और रेड्डी आयोग की सिफारिशें—कि आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठनों पर प्रतिबंध लगे, पुलिस सुधार हों, सामाजिक सद्भाव के लिए सभी स्तर पर प्रयास हों—आज भी अनसुनी हैं।
आयोग ने कहा था कि इन दंगों ने गुजरात को सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील बना दिया है, और यदि सबक न लिए गए तो यह हिंसा दोहराई जाएगी। और 2002 के गुजरात दंगे रेड्डी आयोग की सिफारिशों की अनदेखी का एक कारण थे। अगर हम इन काले अध्याय से सबक नहीं लेंगे, तो दंगों की आग फिर सुलग सकती है।
समय है कि हम इस साजिश को उजागर कर नफरत की जड़ों को काटें, वरना पिछले दंगों में निर्दोषों का बलिदान व्यर्थ जाएगा, और गुजरात ही नहीं पूरे देश का समाज हमेशा विभाजित रहेगा।



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