अमेरिकी रिपोर्ट: भारत में मानवाधिकार सुरक्षा चिंताजनक!
मानवाधिकार पर अमेरिकी विदेश विभाग की नई रिपोर्ट आई है। 2024 की यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है। भारत ने मानवाधिकार हनन के मामलों में न्यूनतम कार्रवाई की है। अधिकारियों को सजा देने के प्रयास अपर्याप्त रहे। यह बात रिपोर्ट में स्पष्ट कही गई है।
रिपोर्ट में खालिस्तानी अलगाववादियों को लेकर भी आरोप हैं। अमेरिका और कनाडा ने गंभीर आरोप लगाए हैं। भारतीय अधिकारियों पर दोषारोपण किया गया है। यह भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
मानवाधिकार रिपोर्ट में बड़े बदलाव
पिछले साल की तुलना में यह रिपोर्ट काफी छोटी है। 2023 की रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल थे। लैंगिक हिंसा पर विस्तृत चर्चा थी। जातिगत भेदभाव के मामले गहराई से उठाए गए थे। एनजीओ पर होने वाले उत्पीड़न का भी जिक्र था। LGBTQI अधिकारों पर भी पूरा अनुभाग था।
परन्तु 2024 की रिपोर्ट में ये सब गायब हैं। इनकी जगह नसबंदी के मामलों को जगह मिली है। जनसंख्या नियंत्रण से जुड़े दबाव की बात की गई है। यह बदलाव ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। भारत में मानवाधिकार स्थिति पर यह नज़रिया बदलाव महत्वपूर्ण है।
मणिपुर हिंसा और गंभीर आरोप
कार्यकारी सारांश की शुरुआत मणिपुर हिंसा से होती है। इसके बाद कई गंभीर मानवाधिकार चिंताओं का उल्लेख है। मनमाने ढंग से हत्याओं का जिक्र किया गया है। अंतरराष्ट्रीय दमन (Transnational Repression) पर विस्तार से बात हुई है। जबरन गायब होने के मामलों की ओर ध्यान दिलाया गया है। पत्रकारों के खिलाफ हिंसा और सेंसरशिप की भी चर्चा है।
रिपोर्ट का मुख्य बिंदु स्पष्ट है। दोषी अधिकारियों को सजा दिलाने के प्रयास नाकाफी हैं। सरकार की कार्रवाई न्यूनतम और अविश्वसनीय बताई गई है। यह आरोप पिछले साल की रिपोर्ट जैसा ही है। भारत में मानवाधिकार संरक्षण की यह स्थिति गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
ट्रांसनेशनल रिप्रेशन पर जोर
2023 और 2024 दोनों रिपोर्टों में यह अनुभाग मौजूद है। अन्य देशों में प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के आरोप गंभीर हैं। सरकारों, प्रवासियों और मानवाधिकार समूहों ने आरोप लगाए। भारत सरकार पर हिंसा और धमकी देने का आरोप है। यह मानवाधिकार का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है।
2023 की रिपोर्ट में सिर्फ निज्जर हत्याकांड का उल्लेख था। कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो ने भारत पर गंभीर आरोप लगाए थे। इससे भारत-कनाडा संबंध बिगड़ गए थे। 2024 की रिपोर्ट इस मामले को और आगे ले जाती है।
निज्जर हत्याकांड में तीन भारतीयों की गिरफ्तारी शामिल है। ट्रूडो के अक्टूबर 2024 के बयान का भी हवाला है। उन्होंने भारतीय एजेंटों को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया। यह आरोप भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाते हैं।
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अमेरिकी आरोपों का पहली बार उल्लेख
पहली बार, अमेरिकी सरकार के आरोप भी रिपोर्ट में शामिल हैं। अक्टूबर 2024 में अमेरिकी न्याय विभाग ने अभियोग पत्र दायर किया। भारतीय सरकारी कर्मचारी विकास यादव पर आरोप लगे। गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश का आरोप है। हत्या के लिए किराए पर लेने और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले हैं।
भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता पहले से हिरासत में हैं। उन पर मुकदमा चलना बाकी है। दिलचस्प बात यह है कि नवंबर 2023 का अभियोग पत्र पिछली रिपोर्ट में नहीं था। इस बार इसे शामिल करना महत्वपूर्ण है। यह भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर गंभीर प्रभाव डालता है।
महिलाओं के अधिकारों पर कम फोकस
2023 की रिपोर्ट महिला अधिकारों पर विस्तृत थी। यौन हिंसा, तस्करी जैसे मुद्दे शामिल थे। दहेज हत्या और रोजगार में भेदभाव पर भी चर्चा थी। परन्तु 2024 की रिपोर्ट में यह सब नदारद है। लैंगिक मुद्दों पर संक्षिप्त चर्चा हुई है। जनसंख्या नियंत्रण में जबरदस्ती पर ज्यादा ध्यान दिया गया है।
रिपोर्ट में जबरन गर्भपात के आरोप उठाए गए हैं। अनैच्छिक नसबंदी की घटनाओं का भी उल्लेख है। गरीब और दलित महिलाएं ज्यादा प्रभावित हुईं। पति, परिवार और अधिकारियों ने दबाव डाला। ट्यूबल लाइगेशन या हिस्टेरेक्टॉमी कराने को मजबूर किया गया।
कई राज्यों में नसबंदी कोटा अब भी लागू हैं। मौद्रिक प्रोत्साहन भी दिए जाते हैं। इसके गंभीर परिणाम हुए हैं। महिलाओं को जोखिम भरी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा। गैर-स्थायी तरीकों तक उनकी पहुंच सीमित रही। यह भारत में मानवाधिकार की स्थिति पर एक काला धब्बा है।
महाराष्ट्र के बीड जिले का उदाहरण चौंकाने वाला है। न्यूयॉर्क टाइम्स की जांच मार्च 2025 में सामने आई। चीनी कटाई में लगी महिला मजदूर प्रभावित हुईं। आर्थिक और सामाजिक दबाव बहुत ज्यादा था। सरकारी जांच ने भयावह तस्वीर पेश की। लगभग 82,000 महिला मजदूरों में से 20% ने हिस्टेरेक्टॉमी करवाई। यह आंकड़ा भारत में मानवाधिकार हनन की पुष्टि करता है।
गायब हुए महत्वपूर्ण मुद्दे
2024 की रिपोर्ट से कई अहम मुद्दे पूरी तरह गायब हैं। LGBTQI व्यक्तियों के खिलाफ हिंसा का कोई जिक्र नहीं। भेदभाव के मामलों को भी हटा दिया गया है। जाति-आधारित हत्याओं और अत्याचारों का उल्लेख नहीं है। दलितों के प्रति होने वाली हिंसा भी अनदेखी हुई है।
धार्मिक स्वतंत्रता पर एक पंक्ति में निर्देश दिया गया है। पाठकों को अलग धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट पढ़ने को कहा गया। 2023 में इसका अपना विस्तृत अनुभाग था। सांप्रदायिक हिंसा और धर्मांतरण कानूनों पर चर्चा हुई थी।
राजनीतिक भागीदारी पर कोई बात नहीं हुई। सरकारी भ्रष्टाचार का जिक्र गायब है। घरेलू मानवाधिकार संगठनों के प्रति सरकारी रवैया भी अनछुआ रहा। यह चूक भारत में मानवाधिकार निगरानी को कमजोर करती है।
2023 में FCRA के तहत एनजीओ पर पाबंदियां विस्तार से बताई गई थीं। परन्तु इस बार एक बार भी इसका नाम नहीं लिया गया। प्रेस की आजादी और सभा के अधिकारों पर भी कम बात हुई। हालांकि दोनों रिपोर्टें पत्रकारों के खिलाफ हिंसा का उल्लेख करती हैं। 2024 में घरेलू मामलों के उदाहरण कम हैं। वैश्विक रैंकिंग और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के संदर्भ ज्यादा दिए गए हैं।
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भारत में मानवाधिकार: व्यापक संदर्भ
अमेरिकी रिपोर्ट के अलावा, भारत में मानवाधिकार हनन के कई पहलू हैं। हिरासत में मौतें एक गंभीर समस्या है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े चिंताजनक हैं। पुलिस कार्रवाई और न्यायिक हिरासत में मौतें होती रहती हैं। अक्सर इनकी जांच अपर्याप्त रहती है।
मानवाधिकार आयोग (NHRC) के पास सीमित शक्तियां हैं। उसके सिफारिशों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। राज्य मानवाधिकार आयोगों की स्थिति और भी खराब है। संसाधनों की कमी एक बड़ी बाधा है। यह संस्थागत कमजोरी मानवाधिकार संरक्षण को प्रभावित करती है।
माओवादी प्रभावित इलाकों में स्थिति जटिल है। सुरक्षा बलों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगते हैं। नागरिकों के विस्थापन की समस्या गंभीर है। बुनियादी सेवाओं तक उनकी पहुंच बाधित होती है। यहां मानवाधिकार का हनन व्यापक स्तर पर होता है।
यूएपीए (UAPA) और एनएसए (NSA) जैसे कानूनों का दुरुपयोग
यूएपीए (UAPA) और एनएसए (NSA) जैसे कानूनों का दुरुपयोग होता है। बिना मुकदमा चलाए लंबी हिरासत की अनुमति है। अक्सर विरोध की आवाजों को दबाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह नागरिक स्वतंत्रता पर गंभीर प्रहार है। भारत में मानवाधिकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है।
हाल के वर्षों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिकुड़ी है। पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों पर दबाव बढ़ा है। विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के आरोप लगते हैं। सोशल मीडिया पोस्ट के लिए गिरफ्तारियां हुई हैं। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है।
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निष्कर्ष: सुधार की तत्काल आवश्यकता
अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट एक चेतावनी है। भारत में मानवाधिकार संरक्षण प्रणाली कमजोर हुई है। अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। पारदर्शी जांच तंत्र की सख्त जरूरत है। पीड़ितों को न्याय मिलना अत्यंत आवश्यक है।
गायब हुए मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा। जातिगत भेदभाव और लैंगिक हिंसा गंभीर समस्याएं हैं। धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। नागरिक समाज की भूमिका को मजबूत करना होगा। यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए महत्वपूर्ण है।
अंतरराष्ट्रीय आरोपों को गंभीरता से लेना होगा। कूटनीतिक स्तर पर स्पष्टीकरण देना जरूरी है। आंतरिक सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी। मानवाधिकार का सम्मान ही भारत की वास्तविक शक्ति है। यही उसकी लोकतांत्रिक विरासत की सच्ची गारंटी है।



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