विभाजन हिंसा: RSS-महासभा की भूमिका और 1947 का हिन्दू नरसंहार
1947 का हिन्दू नरसंहार: विभाजन कालीन हिंसा में आरएसएस और हिन्दू महासभा की भूमिका (आर्काइव) विभाजन की आग में झुलसते भारत को आज भी वह दर्द सताता है, जब पड़ोसी ही पड़ोसी को काटने लगे। लेकिन इस नरसंहार की जड़ें सिर्फ ब्रिटिशों के ‘डिवाइड एंड रूल’ में नहीं, बल्कि हिन्दू राष्ट्रवाद के उन संगठनों में भी हैं, जिन्होंने सांप्रदायिकता को हथियार बनाया। आरएसएस और हिन्दू महासभा ने उत्तर भारत के दंगों में न सिर्फ सक्रिय भूमिका निभाई, बल्कि हिंसा को अधिक से अधिक भड़काने का काम किया।
विकिपीडिया और इतिहासकार क्रिस्टोफ जाफरलॉट जैसे विद्वानों के अनुसार, आरएसएस के कार्यकर्ता पंजाब से भागते हिन्दू शरणार्थियों की मदद तो करते थे, लेकिन उसी दौरान हिन्दू-मुस्लिम दंगों में ‘हिन्दू स्व-रक्षा’ के नाम पर मुसलमानों पर जानलेवा हमले करते थे। यह केवल ‘हिन्दू रक्षा’ का नाटक था, जो बदले की आग को हवा देता था।
हिन्दू महासभा के नेता वी.डी. सावरकर ने 1937 में ही ‘द्वय-राष्ट्र सिद्धांत’ को समर्थन दिया, कहते हुए कि हिन्दू और मुसलमान कभी एक साथ नहीं रह सकते। यह विचारधारा विभाजन को अपरिहार्य बनाती थी, न कि रोकती थी। आज जब ये संगठन ‘राष्ट्रभक्ति’ का ढोंग रचते हैं, तो याद रखिए: उनकी ‘एकता’ ने लाखों जानें लीं हैं।
आरएसएस की विचारधारा: ‘आंतरिक खतरा’ और जातीय सफ़ाई की साज़िश
आरएसएस की विचारधारा मुसलमानों को ‘आक्रमणकारी’ और ‘धोखेबाज’ बताती थी, जो विभाजन को ‘गांधी-नेहरू की नरमी’ का फल मानती थी। एम.एस. गोलवलकर जैसे सरसंघचालक ने अपनी किताब ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ में मुसलमानों को ‘आंतरिक खतरा’ कहा, जो हिन्दू राष्ट्र को कमजोर करते हैं।
1947 में यह जहर दंगों में उतर आया। द डेली टाइम्स और द वायर जैसे स्रोतों के मुताबिक, आरएसएस ने पंजाब के पूर्वी हिस्से में सशस्त्र दलों के साथ मिलकर मुसलमानों को भयानक रूप से निशाना बनाया, ताकि वह इलाक़ा ‘शुद्ध हिन्दू क्षेत्र’ बने।
सबसे वीभत्स घटना जम्मू नरसंहार थी, जहाँ आरएसएस कार्यकर्ताओं ने महाराजा हरि सिंह की सेना के साथ मिलकर 70,000 से ज्यादा मुसलमानों की हत्या की, जैसा कि 1948 के आधिकारिक रिपोर्ट्स बताते हैं। यह ‘स्व-रक्षा’ नहीं, बल्कि जातीय Genocide या सफाई थी।
हिन्दू महासभा ने भी कम नहीं किया: सावरकर ने मुसलमानों को ‘भारत से बाहर’ धकेलने की वकालत की, जो नोआखाली दंगों में हिंसा को भड़काने का कारण बनी। ये संगठन ‘राष्ट्र’ के नाम पर नफरत बेचते थे, और आज भी वही जहर घोलते हैं।
विभाजन की हिंसा में मौतों का आंकड़ा 10 लाख से 20 लाख तक माना जाता है, लेकिन आरएसएस-हिन्दू महासभा की भूमिका ने 1947 का हिन्दू नरसंहार को और भयावह बनाया।
लाखों विस्थापन और ‘शहीदी दल’: हिंसा को स्थायी बनाने का षड्यंत्र
ब्रिटैनिका और हार्वर्ड के अध्ययनों के अनुसार, 15 मिलियन लोग विस्थापित हुए, जिनमें से लाखों की संख्या में ट्रेनों में ही काट दिए गए। रावलपिंडी नरसंहार में मुस्लिम लीग के हमलों का जवाब पूर्वी पंजाब में आरएसएस ने दिया, जहां वे हथियारों से लैस होकर गांवों पर धावा बोलते थे।
द वायर की रिपोर्ट्स बताती हैं कि आरएसएस और अकाली दल ने मिलकर मुसलमानों को भगाने के लिए ‘शहीदी दल’ बनाए, जो ‘मुस्लिम सफाई’ का काम करते थे।
हिन्दू महासभा ने बंगाल विभाजन की मांग की, जो 1947 में हिंसा का कारण बनी। यह ‘रक्षा’ का बहाना था, लेकिन हकीकत में यह सांप्रदायिक दुश्मनी को स्थायी बनाने का षड्यंत्र था।
आज जब ये संगठन ‘शरणार्थी बचाव’ का श्रेय लेते हैं, तो भूल जाते हैं कि उनकी हिंसा ने ही लाखों शरणार्थी पैदा किए। 1947 का हिन्दू नरसंहार केवल एक आकस्मिक त्रासदी नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी जातीय सफाई थी।
गांधी की हत्या और सरदार पटेल का कड़ा रुख
आरएसएस का दावा है कि वे ‘सेवा’ करते थे, लेकिन इतिहास झूठ नहीं बोलता। क्वोरा और द प्रिंट जैसे स्रोतों से पता चलता है कि 1947 में आरएसएस ने हिन्दू-सिख महिलाओं को बचाया, लेकिन उसी दौरान जम्मू में मुस्लिम महिलाओं पर बलात्कार और हत्याएं हुई, जहां आरएसएस सक्रिय था।
वी.पी. मेनन की किताब ‘ट्रांसफर ऑफ पावर‘ में लिखा है कि आरएसएस ने ‘हिन्दू रक्षा’ के नाम पर भयानक रूप से नफरत फैलाई, जो गांधी की हत्या का माहौल बनाती थी।
सरदार पटेल ने 1948 में आरएसएस पर प्रतिबंध लगाते हुए कहा कि उनकी यानि आरएसएस की ‘सांप्रदायिक जहर’ ने देश को बांटा। हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर गठबंधन की सरकारें चलाईं, जैसे सिंध और बंगाल में, जो क्विट इंडिया आंदोलन के समय ब्रिटिश समर्थक बनी रहीं।
यह ‘राष्ट्रवाद’ नहीं, बल्कि सत्ता का खेल था। आज जब वे ‘गांधीवादी’ बनने का ढोंग करते हैं, तो पटेल का पत्र याद आता है: “आरएसएस की गतिविधियां सरकार के लिए गम्भीर खतरा हैं।”
विभाजन के बाद की काली छाया: नाज़ी-जैसा संगठन और 2002 के दंगे
विभाजन के बाद भी आरएसएस-महासभा की काली छाया नहीं हटी। 1948 में गांधी हत्या के बाद पटेल ने आरएसएस को ‘नाजी-जैसा’ संगठन बताया, जो ‘सांप्रदायिक’ और ‘कुलीनतांत्रिक’ है। द वायर के अनुसार, आरएसएस ने कभी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया, बल्कि ब्रिटिशों के साथ मिलकर स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने में सहयोग किया। हिन्दू महासभा के सावरकर ने तो वायसराय को पत्र लिखकर ‘वफादारी’ की मिसाल कायम की।
आजादी के बाद इनकी विचारधारा ने 1984 के सिख दंगों और 2002 के गुजरात दंगों को जन्म दिया। द हिंदू टाइम्स और ईपीडब्ल्यू के विश्लेषण बताते हैं कि इन संगठनों ने ‘हिन्दू राष्ट्र’ के नाम पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया। यह ‘एकता’ का मंत्र नहीं, बल्कि विभाजन का जहर है।
अगर ये ‘सेवा’ करते, तो पिछड़ी जातियों पर हमला भी करते हैं, मुसलमानों तो खैर इनके निशाने पर हैं ही। 1947 का हिन्दू नरसंहार एक ऐसा घाव है, जिसे ये विचारधाराएँ लगातार कुरेदती रही हैं।
आज का भारत और 1947 की पुनरावृत्ति का ख़तरा
आज के भारत में आरएसएस-बीजेपी का वर्चस्व देखकर लगता है कि 1947 का सबक भुला दिया गया। द न्यू यॉर्कर और द डिप्लोमैट जैसे अंतरराष्ट्रीय स्रोतों के मुताबिक, विभाजन की हिंसा ने दक्षिण एशिया को स्थायी और गहरा घाव दिया है, और आरएसएस जैसी विचारधाराओं ने इसे और भी गहरा किया।
मुसलमानों को ‘आतंकवादी’ बताकर, लव जिहाद जैसे झूठे नैरेटिव फैलाकर, वे वही 1947 के नफरत को दोहरा रहे हैं।
तत्कालीन हिन्दू महासभा की ‘हिन्दू राष्ट्र’ की मांग आज भी आरएसएस के माध्यम से जीवित है, जो भारत के संविधान को चुनौती देती है। अगर गांधी ने ‘अहिंसा’ का पाठ पढ़ाया, तो इनकी ‘वीरता’ ने गांधी सहित लाखों भारतीयों का खून बहाया।
इतिहासकार सुमित सरकार कहते हैं कि आरएसएस ने कभी ‘सामाजिक सुधार’ नहीं किया, सिर्फ सांप्रदायिकता की आग को भड़काया। यह ‘राष्ट्रभक्ति’ का मुखौटा है, जो लोकतंत्र को खोखला कर रहा है।
अंत में, 1947 का विभाजन एक त्रासदी था, लेकिन आरएसएस-महासभा ने इसे महानरसंहार में बदल दिया था। द वॉशिंगटन पोस्ट और हार्वर्ड गजट के अनुसार, लाखों मौतें ‘पड़ोसी बनाम पड़ोसी’ की लड़ाई में हुईं, जहां ये संगठन भारतीय समाजों में नफरत का ईंधन डालते रहे। आज जब वे ‘विकास’ और ‘एकता’ की बात करते हैं, तो सवाल उठता है: क्या वे माफी मांगेंगे?
क्या वे अपनी विचारधारा से पश्चाताप करेंगे? नहीं, क्योंकि नफरत ही उनका ईंधन है। भारत को बचाने के लिए हमें गांधी-अंबेडकर की विरासत को अपनाना होगा, न कि इनके सांप्रदायिक जहर को। अन्यथा, 1947 का खून फिर बहने लगेगा। आज तो सत्ता भी इन्हीं के हांथ में सौंप दिया गया है। यह समय है जागने का, वरना इतिहास खुद को दोहराएगा।



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