ममता का असंवेदनशील बयान: दुर्गापुर गैंगरेप पर ‘दीदी की ममता गायब’
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का दुर्गापुर दीदी की ममता गायब सामूहिक दुष्कर्म मामले पर दिया गया बयान न केवल संवेदनहीनता की इंतहा दर्शाता है, बल्कि एक महिला नेता के रूप में उनकी विश्वसनीयता पर गहरा सवाल खड़ा करता है। यह बयान ममता बनर्जी की लंबे समय से चली आ रही प्रवृत्ति का हिस्सा लगता है, जहां वे हमेशा पीड़िता को ही निशाने पर ले लेती हैं।
10 अक्टूबर 2025 की रात को हुई इस भयावह घटना में, आईक्यू सिटी मेडिकल कॉलेज की दूसरी वर्ष की 23 वर्षीय एमबीबीएस छात्रा, जो ओडिशा के बलासोर जिले के जलेश्वर की निवासी थीं, अपने पुरुष मित्र के साथ डिनर के लिए कॉलेज कैंपस से बाहर निकलीं।
शोभापुर क्षेत्र में कॉलेज के पीछे एक जंगल इलाके में चार आरोपी, शेख नसीमुद्दीन (25 वर्ष), शेख रियाजुद्दीन (22 वर्ष), शेख फिरदौस (20 वर्ष) और शेख सैफिकुल (19 वर्ष) ने उन्हें घेर लिया, उनके साथ क्रूरता से दुष्कर्म किया और बाद में फरार हो गए।
पीड़िता ने करीब 12:30 बजे घटना की सूचना दी, जिसके बाद न्यू टाउनशिप पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज हुई। फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य एकत्र किए, जबकि सीसीटीवी फुटेज की जांच जारी है। लेकिन न्याय की अपेक्षा के बजाय, ममता का पहला बयान आया: “वह रात 12:30 बजे बाहर कैसे गई?”
यह बयान पीड़िता की स्वतंत्रता को ही अपराध का कारण ठहराने जैसा है, जो आधुनिक समाज के प्रगतिशील मूल्यों पर थूकने के बराबर है। एक राज्य की प्रमुख से अपेक्षा की जाती है कि वे अपराधियों पर निशाना साधें, न कि पीड़िता की जिंदगी को जज करें, लेकिन यह घटना दर्शाती है कि दीदी की ममता गायब हो चुकी है।
विवादों का पुराना सिलसिला: पार्क स्ट्रीट से दुर्गापुर तक ‘पीड़िता पर दोषारोपण’
यह पहली बार नहीं है जब मुख्यमंत्री ने महिला सुरक्षा के मामलों में इस तरह का विवादास्पद रुख अपनाया है। 2012 के पार्क स्ट्रीट रेप केस में उन्होंने पीड़िता को “वेश्या” करार दिया था, जबकि 2024 के आरजी कर मेडिकल कॉलेज हत्याकांड में उन्होंने सिस्टम की कमियों को नजरअंदाज कर प्रदर्शनकारियों को ही दोषी ठहराया।
दुर्गापुर में भी उन्होंने संवेदनहीनता की सारी हदें पार करते हुए कहा, “यह निजी कॉलेज है, सरकार की जिम्मेदारी नहीं। लड़कियों को रात में बाहर जाने की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए।” यह न केवल पीड़िता पर दोषारोपण है, बल्कि अपराधियों को अप्रत्यक्ष संरक्षण भी प्रदान करता है।
उनकी इस ‘तालिबानी मानसिकता’ पर सोशल मीडिया पर भारी गुस्सा फूटा है। सोशल मीडिया पर #VictimBlamingMamata ट्रेंड कर रहा है, जहां यूजर्स जैसे @Shehzad_Ind ने इसे “बेटी को दोषी ठहराना और बलात्कारी को बचाना” करार दिया।
भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इसे “नारीत्व पर काला धब्बा” कहा, जबकि बंगाली बुद्धिजीवी वर्ग ने इसे “ममता की ममता की कमी” बताते हुए सवाल उठाया कि एक महिला मुख्यमंत्री महिलाओं की आजादी को ही खतरे में डाल रही हैं। यह राजनीतिक चालबाजी का नंगा रूप है, जहां वोट बैंक की रक्षा के लिए न्याय की बलि चढ़ाई जा रही है, और यह सिद्ध करता है कि बंगाल की मुखिया के दिल से दीदी की ममता गायब है।
राष्ट्रीय आक्रोश और विपक्ष की कड़ी प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री के इस बयान की गंभीरता को रेखांकित करते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने इसे “असंवेदनशील और पीड़िता को अपमानित करने वाला” घोषित किया। भाजपा ने इसे “तालिबानी मानसिकता” बताते हुए ममता से इस्तीफे की मांग की, जबकि विपक्षी नेता सुवेंदु अधिकारी ने पीड़िता के पिता से संपर्क कर न्याय का भरोसा दिलाया।
केंद्रीय मंत्री सुकांता मजुमदार ने कहा कि आरजी कर के एक साल बाद भी कानून-व्यवस्था सुधारने में विफलता बंगाल को असुरक्षित बना रही है।
सोशल मीडिया पर #DurgapurHorror हैशटैग के तहत हजारों पोस्ट्स में लोग चीख रहे हैं कि “ममता ने महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद करने का फतवा जारी कर दिया।” विडंबना यह है कि कांग्रेस की “आउटरेज लॉबी” जैसे सुप्रिया श्रीनेत और प्रियंका गांधी चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि वे अन्य राज्यों में इसी मुद्दे पर शोर मचाती रहीं।
यह दोहरा मापदंड सुविधा की राजनीति की कड़वी सच्चाई उजागर करता है, जहां महिला सुरक्षा सिर्फ चुनावी हथियार बनकर रह जाती है। इस चुप्पी ने भी साबित कर दिया है कि सत्ता के सामने दीदी की ममता गायब हो चुकी है।
सफाई, पिता का गुस्सा और ओडिशा के मुख्यमंत्री की अपील
बढ़ते बवाल के बीच, ममता ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि “मीडिया ने मेरे शब्दों को जानबूझकर तोड़-मरोड़ दिया,” लेकिन वीडियो फुटेज साफ दिखाता है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “लड़कियां रात में बाहर न निकलें, खुद को बचाना होगा।”
पीड़िता के पिता ने गुस्से में प्रतिक्रिया दी, “अगर सुरक्षा नहीं दे सकतीं तो फतवा जारी कर दें कि महिलाएं कभी बाहर न निकलें!” वे अपनी बेटी को ओडिशा ले जाना चाहते हैं, क्योंकि बंगाल में “उनकी जान को खतरा है।”
ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने ममता से “कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई” की अपील की और अपने अधिकारियों को पीड़िता के परिवार की मदद के निर्देश दिए। पीड़िता वर्तमान में दुर्गापुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं, जहां डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें गंभीर चोटें आई हैं और मनोवैज्ञानिक सहायता की जरूरत है।
यह सफाई न तो ममता की गलती मिटा सकती है और न ही बंगाल की महिलाओं के डर को कम कर सकती है, जो अब रात में सड़कों को जंगल से भी ज्यादा खतरनाक मानने लगी हैं।
सिस्टमिक फेलियर और भविष्य की राह
दुर्गापुर घटना ने बंगाल की कानून-व्यवस्था की पोल खोल दी है, जहां प्राइवेट कॉलेज के बाहर जंगल क्षेत्र होना, सीसीटीवी की कमी और पुलिस की देरी से कार्रवाई सब कुछ सरकार की लापरवाही को उजागर करता है। भाजपा विधायक अग्निमित्रा पॉल ने कहा, “कॉलेज के बाहर की सड़क पर एक भी स्ट्रीटलाइट नहीं है, नियमों के बावजूद छात्राएं 10 बजे के बाद बाहर नहीं जा सकतीं, लेकिन ममता इसे तालिबानी राज बता रही हैं।”
2024 के आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड के बाद भी कोई ठोस सुधार नहीं हुआ, न सख्त कानून, न तेज जांच प्रक्रिया। ममता का “नाइट कल्चर पर नियंत्रण” वाला बयान महिलाओं की स्वतंत्रता को बेड़ियों में जकड़ने जैसा है, जबकि राज्य में महिलाओं पर अपराधों की संख्या 2023-24 में 15% बढ़ी है, एनसीआरबी डेटा के अनुसार।
अगर प्राइवेट संस्थान जिम्मेदार हैं, तो राज्य सरकार क्यों चुप है? यह सिस्टमिक फेलियर है, जो वोट बैंक की राजनीति से जकड़ा हुआ लगता है, जहां आरोपी शेख समुदाय से जुड़े होने पर कार्रवाई धीमी पड़ जाती है।
इस घटना ने देशव्यापी बहस को जन्म दिया है कि महिला सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो, पीड़िता को सलाह देकर नहीं, बल्कि अपराधियों को कड़ी सजा देकर। ममता जैसी नेता “सावधान रहो” कहकर अपराधियों को छूट दे रही हैं, जबकि जरूरी है फास्ट-ट्रैक कोर्ट, जीरो टॉलरेंस पॉलिसी और जागरूकता अभियान।
सोशल मीडिया पर @BengalMafia जैसे यूजर्स ने इसे “12वीं पास मुख्यमंत्री का स्तर” बताते हुए बंगाली बुद्धिजीवियों की नाराजगी साझा की। एनसीडब्ल्यू चेयरपर्सन विजया रहतकर ने मांग की कि ममता सार्वजनिक रूप से माफी मांगें और राज्य में महिला सुरक्षा नीति को मजबूत करें।
यह बहस राजनीतिक संवेदनशीलता पर भी केंद्रित है—क्या एक महिला नेता महिलाओं के हक को कुर्बान कर देगी? बंगाल की बेटियां अब सड़कों पर उतर रही हैं, #ResignMamata के नारों के साथ, जो 2026 चुनावों की दिशा बदल सकती है।
अंततः, पुलिस ने चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया में देरी बंगाल की महिलाओं के विश्वास को और तोड़ रही है। अगर सत्ता में बने रहना है तो य़ह नहीं चलेगा, फिर तो इस्तीफा दें वर्ना सुधार करें, पश्चिम बंगाल को महिलाओं के कैदखाने में न बदलें, बिना किसी तरह की कोताही बरते फास्ट ट्रैक पर मुकद्दमा चलाकर अपराधियों को फांसी के फंदे पर चढ़ाएं।
रात हो या दिन बंगाल की सड़क पर महिलाओं का हक है आजादी से घूमने का। ममता का यह बयान नारी शक्ति पर कालिख पोतने जैसा है, इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।



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