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अरावली बचाओ आंदोलन: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बढ़ा खनन का खतरा

अरावली बचाओ आंदोलन

अरावली की पहाड़ियों को लेकर 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरे देश के पर्यावरणविदों को हिलाकर रख दिया। कोर्ट ने अरावली की परिभाषा को स्थानीय भू-भाग से मात्र 100 मीटर की ऊंचाई तक सीमित कर दिया। इस निर्णय के आते ही अरावली बचाओ आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं में भयंकर आक्रोश फैल गया। यह फैसला मूल रूप से पर्यावरण मंत्रालय की उस विवादास्पद समिति की सिफारिशों पर आधारित था, जिसने खुद स्वीकार किया था कि सख्त ऊंचाई या ढालू मानदंडों के आधार पर एकसमान परिभाषा तय करना संभव नहीं है। इसके बावजूद कोर्ट द्वारा इसे स्वीकार करना किसी अचंभे से कम नहीं था।

अरावली बचाओ आंदोलन: 100 मीटर की परिभाषा पर छिड़ा महासंग्राम

इस फैसले का धरातलीय नतीजा बेहद भयावह नजर आया। अकेले राजस्थान में मौजूद कुल 12,081 पहाड़ियों में से महज 1,048 (लगभग 9%) ही संरक्षण के दायरे में सुरक्षित बचीं। बाकी कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां, टीले और ढलान सीधे तौर पर खनन के लिए खुल गए। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यह निर्णय अरावली को उत्तर भारत की “हरी ढाल” के बजाय “खनिज खदान” बनाने की दिशा में पहला बड़ा कदम था। इसकी कड़ी आलोचना करते हुए कहा गया कि इससे थार मरुस्थल का पूर्व की ओर विस्तार तेज होगा, भूजल स्तर और तेजी से गिरेगा तथा दिल्ली-NCR की हवा पहले से ज्यादा जहरीली हो जाएगी।

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तीन दशकों के न्यायिक संरक्षण पर अचानक फिरा पानी

यह घटनाक्रम इसलिए भी चौंकाने वाला था क्योंकि पिछले 30 सालों से सुप्रीम कोर्ट ही अरावली को बचाने का सबसे बड़ा हथियार रहा है। 2002, 2004 और 2009 के ऐतिहासिक आदेशों में कोर्ट ने खनन पर सख्त रोक लगाई थी और M.C. Mehta मामले में कठोर रुख अपनाया था। फिर अचानक 2025 में वही कोर्ट सरकार की उस परिभाषा को मान लेता है, जिसे 2010 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) ने सिरे से खारिज कर दिया था। अरावली बचाओ आंदोलन की गूंज अब अदालती गलियारों से लेकर सड़कों तक सुनाई देने लगी है।

सरकार-पूंजीपति गठजोड़ और खनन माफिया के हितों का संदेह

पर्यावरणविदों का यह सवाल पूरी तरह जायज है कि क्या यह महज एक “वैज्ञानिक परिभाषा” का मामला था या इसके पीछे ‘सरकार-पूंजीपति गठजोड़’ का भारी दबाव काम कर रहा था? लंबे समय से खनन कंपनियां, बिल्डर और रियल एस्टेट माफिया कम ऊंचाई वाले इलाकों को “नॉन-आरावली” घोषित करवाने की जुगत में थे। इसका मुख्य कारण यह है कि इन्हीं निचली पहाड़ियों में सबसे ज्यादा बलुआ पत्थर, संगमरमर और अन्य कीमती खनिज पाए जाते हैं। फैसला आते ही विरोध की आग भड़क उठी, सड़कों पर प्रदर्शन हुए और सोशल मीडिया पर #SaveAravalli ट्रेंड करने लगा, जबकि विपक्षी दलों ने इसे “माफिया को लाल कालीन” बिछाने जैसा कृत्य करार दिया।

जन आक्रोश के बाद सुप्रीम कोर्ट का अभूतपूर्व संवैधानिक यू-टर्न

बढ़ते जन दबाव, पर्यावरणविदों की खुली चेतावनियों और विपक्ष के तीखे हमलों के बाद सुप्रीम कोर्ट को अपनी गलती का एहसास हुआ। 29 दिसंबर 2025 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने एक दुर्लभ कदम उठाते हुए नवंबर के आदेश को “अभी लागू नहीं किया जाएगा” घोषित कर स्थगित कर दिया। कोर्ट ने अब एक नई हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी बनाने का रास्ता साफ किया है। यह भारतीय न्यायिक इतिहास की एक बेहद दुर्लभ घटना है कि सर्वोच्च अदालत ने अपने ही किसी बड़े फैसले पर इतनी जल्दी ब्रेक लगा दिया हो।

इकोलॉजिकल कंटिन्यूटी और स्ट्रक्चरल पैराडॉक्स की चुनौतियां

अपने फैसले को स्थगित करते हुए कोर्ट ने माना कि कई महत्वपूर्ण तकनीकी मुद्दों पर स्पष्टता अभी बाकी है। इसमें इकोलॉजिकल कंटिन्यूटी (पारिस्थितिक निरंतरता) और 500 मीटर की सीमा से पैदा होने वाला “स्ट्रक्चरल पैराडॉक्स” प्रमुख हैं। कोर्ट ने स्वीकार किया कि निचली पहाड़ियों में खनन के संभावित प्रभाव विनाशकारी हो सकते हैं। हालांकि यह कदम दिखाता है कि न्यायपालिका अभी भी जनभावना के प्रति संवेदनशील है, लेकिन सवाल यह बरकरार है कि आखिर पहला फैसला इतनी जल्दबाजी और इतनी कम सावधानी के साथ क्यों दिया गया था?

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अनुच्छेद 21 और पर्यावरण संरक्षण के प्रति न्यायिक विडंबना

यह पूरा प्रकरण भारतीय न्यायपालिका की एक गहरी विडंबना को उजागर करता है। एक तरफ कोर्ट पर्यावरण संरक्षण के नाम पर ऐतिहासिक नजीरें पेश करता है, वहीं दूसरी तरफ सरकार की रिपोर्ट को बिना पर्याप्त पारिस्थितिक आकलन के स्वीकार कर लेता है। अरावली जैसी दो अरब साल पुरानी पर्वतमाला को मात्र एक “ऊंचाई का फॉर्मूला” बनाकर मापना न सिर्फ वैज्ञानिक रूप से संदिग्ध है, बल्कि संवैधानिक रूप से भी खतरनाक है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ हवा और पानी शामिल है, ऐसे में 100 मीटर की काल्पनिक रेखा खींचकर करोड़ों जिंदगियों को दांव पर लगाना न्याय की मूल भावना के विपरीत है।

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संस्थागत विश्वसनीयता और 21 जनवरी की अंतिम परीक्षा

आज की तारीख में अरावली बचाओ आंदोलन सिर्फ पहाड़ बचाने की जंग नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बचाने की लड़ाई बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अपने फैसले में सुधार कर अपनी गरिमा बचा ली है, लेकिन मूल प्रश्न वही है: क्या भविष्य में भी ऐसी परिभाषाएं “नीति-निर्देशित” (पूंजीपतियों के लाभ हेतु) होंगी या वास्तव में पारिस्थितिकी को प्राथमिकता मिलेगी? यदि अरावली ढह गई, तो दिल्ली की सांस और राजस्थान का पानी खत्म हो जाएगा। अब सबकी निगाहें 21 जनवरी 2026 की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि फिर वही पुरानी गलती दोहराई गई, तो यह सिर्फ अरावली की नहीं, बल्कि भारतीय पर्यावरण न्याय की सबसे बड़ी हार होगी।

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