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हसीना की चेतावनी: हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले और सियासी घमासान

हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले

हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले बांग्लादेश इस वक्त अपने इतिहास के सबसे कठिन और रक्तरंजित दौर से गुजर रहा है। अवामी लीग के जॉइंट जनरल सेक्रेटरी और पूर्व सांसद बहाउद्दीन नसीम ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के उन आरोपों का पुरजोर समर्थन किया है, जिसमें मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार को फासीवाद और हिंसा का केंद्र बताया गया है।

नसीम का स्पष्ट कहना है कि यूनुस प्रशासन के आने के बाद से पूरे देश में असुरक्षा का माहौल है और हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले की घटनाओं ने वैश्विक स्तर पर चिंता पैदा कर दी है। हसीना ने यूनुस को ‘सूदखोर’ और ‘देश का दुश्मन’ करार देते हुए जनता से एकजुट होने का आह्वान किया है। उनका मानना है कि वर्तमान शासन केवल डर पैदा कर रहा है और देश की संप्रभुता को विदेशी ताकतों के हाथों गिरवी रख रहा है।

शेख हसीना की दिल्ली से गूंज: ‘देश को बाजार में बेचने की साजिश’

भारत में निर्वासन का समय काट रही शेख हसीना ने एक बेहद तीखे ऑडियो संदेश के जरिए अपनी चुप्पी तोड़ी है। नई दिल्ली में आयोजित ‘बांग्लादेश में लोकतंत्र बचाओ’ कार्यक्रम में उन्होंने चेतावनी दी कि बांग्लादेश के संसाधनों और इलाके को विदेशी हितों के लिए बाजार में बेचने की एक गहरी साजिश रची जा रही है।

उन्होंने यूनुस सरकार को एक ‘कठपुतली शासन’ बताया जो केवल विदेशियों की सेवा में लगा है। हसीना ने आरोप लगाया कि उन्हें सत्ता से हटाना कोई साधारण विद्रोह नहीं, बल्कि एक बहुत सोच-समझकर रची गई अंतरराष्ट्रीय साजिश थी। उन्होंने साफ तौर पर अमेरिका, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव की ओर इशारा करते हुए देशवासियों को आगाह किया।

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मौत की घाटी बना बांग्लादेश: गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप

पूर्व प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में देश की वर्तमान स्थिति का जो चित्रण किया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। उन्होंने बांग्लादेश को ‘एक बड़ी जेल, फांसी की जगह और मौत की घाटी’ की संज्ञा दी है। हसीना के अनुसार, यूनुस सरकार के तहत महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न और टॉर्चर की घटनाओं पर कोई लगाम नहीं रह गई है।

उन्होंने विशेष रूप से जोर देकर कहा कि हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले और उनके खिलाफ हो रही हिंसा ने देश के सांप्रदायिक ढांचे को तोड़ दिया है। अराजकता, लूटपाट, जबरन वसूली और हथियारों के साथ डकैती अब बांग्लादेश की नई हकीकत बन चुकी है, जिसे कट्टरपंथी ताकतें और विदेशी अपराधी बढ़ावा दे रहे हैं।

12 फरवरी के चुनाव और अवामी लीग पर प्रतिबंध का संकट

बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने निर्धारित हैं, लेकिन अवामी लीग को इन चुनावों में हिस्सा लेने से रोक दिया गया है। इस प्रतिबंध ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। शेख हसीना ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया है और कहा है कि उनके समर्थकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है।

अवामी लीग के नेता मोहिबुल हसन चौधरी नोफेल ने भी इस ‘एकतरफा’ मुकाबले पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या जनता के धन की इस बर्बादी से बनने वाली सरकार टिक पाएगी? पार्टी का मानना है कि विपक्ष को पूरी तरह समाप्त करने की यह कोशिश देश को और अधिक अस्थिरता की ओर ले जाएगी।

हसीना की पांच सूत्री मांगें और अंतरराष्ट्रीय जांच की पुकार

मौजूदा संकट को हल करने के लिए शेख हसीना ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और यूनुस सरकार के सामने पांच प्रमुख मांगें रखी हैं। उनकी सबसे पहली मांग ‘गैर-कानूनी’ यूनुस सरकार को हटाकर लोकतंत्र बहाल करने की है। इसके अलावा, उन्होंने सड़कों पर जारी हिंसा को तुरंत खत्म करने और हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले रोकने के साथ-साथ महिलाओं व कमजोर वर्गों की सुरक्षा की गारंटी मांगी है।

हसीना ने पत्रकारों और विपक्ष के खिलाफ चल रही राजनीति से प्रेरित कानूनी कार्रवाई को बंद करने और पिछले साल अगस्त में हुई घटनाओं की संयुक्त राष्ट्र (UN) की निगरानी में निष्पक्ष जांच कराने की मांग को भी प्रमुखता से उठाया है।

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गोपालगंज में सन्नाटा: हसीना के गढ़ में समर्थकों की दुविधा

शेख हसीना का पैतृक जिला और अवामी लीग का सबसे मजबूत किला गोपालगंज आज भारी असमंजस में है। यहाँ शेख मुजीबुर रहमान की मूर्तियां तो सुरक्षित हैं, लेकिन समर्थकों का भविष्य धुंधला नजर आ रहा है। 68 साल के डिलीवरी ड्राइवर मोहम्मद शाहजहां फकीर जैसे लाखों समर्थक इस दुविधा में हैं कि क्या उन्हें अपनी वफादारी बदल लेनी चाहिए?

समर्थकों का तर्क है कि अगर नेताओं ने गलतियां कीं, तो उसकी सजा आम कार्यकर्ताओं को क्यों मिल रही है? चुनाव प्रचार तेज है, लेकिन गोपालगंज के लोग उन उम्मीदवारों को पहचानने से भी इनकार कर रहे हैं जो अवामी लीग की अनुपस्थिति में मैदान में उतरे हैं।

दो-तरफा मुकाबला: BNP और जमात-ए-इस्लामी की बढ़ती ताकत

अवामी लीग के मैदान से बाहर होने के कारण अब यह चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और देश की सबसे बड़ी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के बीच सिमट गया है। सड़कों पर जुलूस निकल रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र के नाम पर हो रहे इस चुनाव में एक बड़े धड़े की गैर-मौजूदगी ने माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है।

शेख हसीना के खिलाफ ट्रिब्यूनल द्वारा सुनाई गई मौत की सजा और भारतीय राजनयिकों के परिवारों को देश से निकाले जाने की खबरों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले और राजनीतिक अस्थिरता ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को भी प्रभावित किया है।

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अस्तित्व की लड़ाई: ‘शहीदों के खून से लिखे संविधान’ को बचाने की अपील

अपने संबोधन के अंत में शेख हसीना ने बेहद भावुक होते हुए बांग्लादेश की संप्रभुता और आजादी को वापस पाने की बात कही। उन्होंने यूनुस को ‘सत्ता का भूखा गद्दार’ कहते हुए जनता से आह्वान किया कि वे शहीदों के खून से लिखे संविधान को बचाने के लिए आगे आएं।

भले ही उन पर मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप हैं और वे फिलहाल देश से बाहर हैं, लेकिन अवामी लीग के नेताओं को उम्मीद है कि उनकी पार्टी का इतिहास विपक्ष से सत्ता में लौटने का रहा है। फिलहाल, 12 फरवरी की तारीख बांग्लादेश के भविष्य और वहां के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए निर्णायक साबित होने वाली है।

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