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UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की रोक और देशव्यापी विरोध

UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026

UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 को लेकर देशभर में छिड़ी बहस के बीच केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य केवल कैंपस में जातिगत भेदभाव को मिटाना है, न कि किसी के खिलाफ इनका गलत इस्तेमाल होने देना।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मीडिया से संवाद करते हुए इस बात पर जोर दिया कि यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के इन नए नियमों को लागू करना केंद्र, राज्य सरकारों और स्वयं आयोग की सामूहिक जिम्मेदारी है ताकि भेदभाव के नाम पर कानून का दुरुपयोग रोका जा सके।

उन्होंने यह भी साफ किया कि यह पूरा मामला फिलहाल माननीय उच्चतम न्यायालय की निगरानी में है, इसलिए जो भी कदम उठाए जाएंगे, वे पूरी तरह से भारतीय संविधान के दायरे में होंगे। सरकार का यह बयान उस समय आया है जब छात्र संगठन और कई सामाजिक संस्थाएं इन नए नियमों को लेकर सड़कों पर उतर आई हैं।

भेदभाव मुक्त कैंपस और समावेशी माहौल का विजन

सरकार के अनुसार, 13 तारीख को जारी इस रेगुलेशन का मूल आधार उच्च शिक्षण संस्थानों में एक सुरक्षित और समावेशी शैक्षणिक वातावरण तैयार करना है। इस फ्रेमवर्क के तहत विश्वविद्यालयों को ‘इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर’, इक्विटी कमेटियां और विशेष शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं।

साथ ही, छात्रों की मदद के लिए चौबीसों घंटे चालू रहने वाली एक हेल्पलाइन भी शुरू करने की बात कही गई है। सरकार का तर्क है कि इन उपायों से भेदभाव-विरोधी ढांचा मजबूत होगा और अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) तथा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों की समस्याओं का त्वरित समाधान हो सकेगा। हालांकि, इसी विजन को लेकर अब एक बड़ा कानूनी और सामाजिक गतिरोध पैदा हो गया है।

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वाराणसी में सुप्रीम कोर्ट के स्टे का जोरदार जश्न

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाए गए स्टे के बाद छात्रों में खुशी की लहर दौड़ गई। काशी विद्यापीठ यूनिवर्सिटी और उदय प्रताप कॉलेज के छात्रों ने इसे अपनी आंशिक जीत बताते हुए मिठाइयां बांटी और जमकर नारेबाजी की। सामान्य वर्ग के छात्रों का प्रतिनिधित्व कर रहे परशुराम सेवा और करणी सेना के नेताओं ने इस आदेश का स्वागत किया है।

उनका तर्क है कि ये नियम समानता लाने के बजाय समाज में बंटवारा पैदा कर रहे हैं। आंदोलनकारी छात्रों ने चेतावनी दी है कि जब तक इन नियमों को पूरी तरह वापस नहीं लिया जाता, उनकी लड़ाई जारी रहेगी। इसी क्रम में 1 फरवरी को जयपुर में एक विशाल जनसभा का आह्वान किया गया है ताकि सरकार पर दबाव बनाया जा सके।

सरकार को चेतावनी और जयपुर से ‘हुंकार’ की तैयारी

परशुराम सेवा के अध्यक्ष अनिल चतुर्वेदी ने कड़े शब्दों में कहा कि यह जीत अभी अधूरी है और जब तक सरकार इस “काले कानून” को पूरी तरह खत्म नहीं कर देती, आंदोलन थमेगा नहीं। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि 1 फरवरी को जयपुर से जो आवाज उठेगी, वह दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सुनाई देगी।

वहीं, सिंह मकराना ने इन नियमों को उच्च जातियों के लिए एक “लॉलीपॉप” करार दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने स्थिति की गंभीरता को समझा है, इसीलिए इस पर रोक लगाई गई है।

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि लोकसभा में बैठे जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर बहरे और अंधे बने हुए हैं, जबकि जमीनी स्तर पर छात्र अपने भविष्य को लेकर बेहद चिंतित और आक्रोशित हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और 2012 के नियमों की बहाली

देश की शीर्ष अदालत ने UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर रोक लगाते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल 2012 के पुराने UGC रेगुलेशंस ही प्रभावी रहेंगे। अदालत ने विशेष रूप से रेगुलेशन 3 (C) की भाषा पर सवाल उठाए, जो जाति-आधारित भेदभाव को परिभाषित करता है।

कोर्ट के अनुसार, इस प्रावधान में स्पष्टता की कमी है, जिससे इसका दुरुपयोग होने की पूरी संभावना है। बेंच ने यह भी पूछा कि क्या 75 वर्षों से जाति-रहित समाज बनाने की हमारी कोशिशें पीछे की ओर जा रही हैं?

कोर्ट ने एक काल्पनिक स्थिति का उदाहरण देते हुए सवाल किया कि यदि एक ही आरक्षित श्रेणी के दो व्यक्तियों के बीच कोई अपमानजनक टिप्पणी होती है, तो क्या इस नए फ्रेमवर्क में उसका कोई समाधान है?

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सामान्य वर्ग की चिंताएं और सुरक्षा मानकों का अभाव

आंदोलन कर रहे छात्रों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि ये नए नियम ‘इक्विटी’ के नाम पर ‘इनइक्विटी’ फैला रहे हैं। छात्रों का कहना है कि नए नियमों में सामान्य वर्ग के खिलाफ दर्ज होने वाली झूठी या फर्जी शिकायतों को रोकने के लिए कोई सुरक्षा कवच (Safeguards) नहीं दिया गया है।

लखनऊ में ‘छात्र पंचायत’ के बैनर तले गांधी मूर्ति पर इकट्ठा हुए छात्रों ने आरोप लगाया कि ये नियम कैंपस के एकेडमिक माहौल को प्रदूषित करेंगे।

प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि जब समानता की बात होती है, तो शिकायतों के निवारण के लिए बनी कमेटियों में केवल विशिष्ट श्रेणियों का प्रतिनिधित्व क्यों अनिवार्य है, और सवर्ण समाज के सदस्यों को इससे बाहर क्यों रखा गया है?

देशव्यापी आंदोलन और 1 फरवरी का ‘भारत बंद’

विरोध की यह आग उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से होती हुई दिल्ली और अन्य राज्यों तक पहुंच गई है। प्रयागराज में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ भवन पर छात्रों ने इसे सामान्य वर्ग के अधिकारों का हनन बताया। कानपुर में चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय के छात्रों ने काली पट्टी बांधकर विरोध मार्च निकाला, जबकि देवरिया और कौशाम्बी में भी प्रदर्शन की खबरें आईं।

राजनीति में भी इसका असर दिखने लगा है; रायबरेली में भाजपा किसान मोर्चा के एक पदाधिकारी ने इन नियमों को विभाजनकारी बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। आंदोलनकारियों ने अब 1 फरवरी को ‘भारत बंद’ का ऐलान किया है, जिससे प्रशासन और सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं।

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कैंपस की खामोशी और भेदभाव की गहरी परतें

विश्वविद्यालय केवल कक्षाओं और विरोध प्रदर्शनों के शोर से नहीं बनते, बल्कि वहां की इनफॉर्मल जगहों पर होने वाली चर्चाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 को लेकर हो रहे विवाद के बीच यह समझना भी जरूरी है कि कैंपस में भेदभाव अक्सर बहुत सूक्ष्म होता है।

कभी किसी छात्र का खुद को “गायब” महसूस करना, तो कभी चर्चाओं में जानबूझकर नजरअंदाज किया जाना, ऐसे घाव हैं जो किसी कागजी शिकायत में दर्ज नहीं होते।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि संस्थाएं केवल नियमों से नहीं, बल्कि अपनी आदतों से भी सुधारती या बिगड़ती हैं। ऐसे में किसी भी नए रेगुलेशन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह निष्पक्षता और विश्वास का माहौल कैसे पैदा करता है।

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