गरीब विरोधी बजट 2026: विपक्षी राज्यों की अनदेखी और महंगाई का प्रहार
गरीब विरोधी बजट 2026 संघ बजट 2026 ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मोदी सरकार के लिए विपक्षी शासित राज्य सिर्फ राजनीतिक सजा पाने की जगह हैं, न कि विकास के साझेदार। तमिलनाडु को फिर ‘जीरो’ विशेष आवंटन मिला है, जहाँ न कोई नया प्रोजेक्ट घोषित हुआ और न ही कोई बड़ा पैकेज। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे “स्टेप-मदरली” यानी सौतेला व्यवहार और “पूरी तरह निराशाजनक” करार दिया है।
राज्य जीएसटी और अन्य करों में भारी योगदान देता है, लेकिन बदले में उसे उपेक्षा और राजनीतिक बदले की भावना मिलती है। स्टालिन ने विशेष रूप से शिक्षा फंड्स के 3,548 करोड़ रुपये पेंडिंग होने और जल जीवन मिशन के तहत 3,112 करोड़ रुपये रोके जाने पर कड़े सवाल उठाए हैं।
यह तमिलनाडु जैसे टॉप-परफॉर्मिंग राज्य के साथ घोर अन्याय है। चुनाव नजदीक होने के बावजूद केंद्र ने राज्य की मांगों, जैसे मेट्रो प्रोजेक्ट्स, शिक्षा और जल आपूर्ति को जानबूझकर अनदेखा किया, क्योंकि भाजपा को लगता है कि यहाँ उसकी जीत नहीं होगी। यह संघीय ढांचे का खुला उल्लंघन है, जहाँ टैक्स देने वाले राज्य को सिर्फ सजा मिलती है।
जल जीवन मिशन में 75% की भारी कटौती और ग्रामीण भारत के साथ क्रूर मजाक
जल जीवन मिशन पर विपक्ष की सबसे तीखी आलोचना इसलिए है क्योंकि 2025-26 के बजट अनुमान में 67,000 करोड़ (कुछ स्रोतों में 66,770 करोड़) आवंटित थे, लेकिन रिवाइज्ड एस्टीमेट्स में सिर्फ 17,000 करोड़ (या 16,944 करोड़) ही खर्च होने का अनुमान है। यानी करीब 75% की भारी कटौती! कांग्रेस ने इसे “क्रूर” और “कट वेलफेयर” कदम कहा है, क्योंकि ग्रामीण भारत में अभी भी लाखों घरों को नल का सुरक्षित पानी नहीं पहुंचा है।
एक तरफ इंदौर जैसे शहरों में पानी की गुणवत्ता से मौतें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ सरकार फंड पर कैंची चला रही है। केंद्र का दावा है कि राज्य स्तर पर अनियमितताएं और शिकायतें हैं, इसलिए फंड रिलीज रोके गए, लेकिन हकीकत में यह योजनाओं की धीमी गति और राजनीतिक पूर्वाग्रह को दिखाता है।
2026-27 के लिए फिर 67,600 करोड़ (या 67,670 करोड़) का आवंटन दिखाकर आंखों में धूल झोंकी जा रही है, जबकि पिछले साल का अनस्पेंट पैसा बताता है कि “हर घर जल” का वादा सिर्फ कागजों तक सीमित है। यह न सिर्फ ग्रामीण स्वास्थ्य को खतरे में डालता है, बल्कि केंद्र की कार्यक्षमता पर भी गंभीर सवाल उठाता है।
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महंगाई और बेरोजगारी पर बजट की चुप्पी ने आम आदमी को किया बेहाल
महंगाई और बेरोजगारी जैसे जलते मुद्दों पर बजट पूरी तरह खामोश और असंवेदनशील रहा। राहुल गांधी ने इसे “भारत की असली समस्याओं से अंधा” और गरीब विरोधी बजट 2026 कहा है। आज युवा बेरोजगार हैं, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर गिर रहा है, निवेशक अपनी पूंजी बाहर ले जा रहे हैं और घरेलू बचतें लगातार घट रही हैं।
किसान संकट में हैं और वैश्विक आर्थिक झटके आने वाले हैं, लेकिन बजट में इनके लिए कोई ठोस राहत नहीं दी गई। कोई बड़ा रोजगार प्रोग्राम, महंगाई कंट्रोल के उपाय या किसानों के लिए एमएसपी (MSP) और स्टोरेज जैसी घोषणाएं इस बजट से नदारद रहीं।
इसके बजाय कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये किया गया है, जो स्पष्ट रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर और कॉर्पोरेट्स को ही फायदा पहुंचाएगा। आम आदमी की जेब पर महंगाई का बोझ बढ़ता जा रहा है, लेकिन सरकार का पूरा फोकस अमीरों और बड़े कारोबारों पर है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि यह गरीब विरोधी बजट 2026 आय असमानता को और गहरा करेगा।
विपक्षी मुख्यमंत्रियों की एकजुट ललकार: एंटी-फेडरल और दिशाहीन बजट
विपक्षी राज्यों तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल के मुख्यमंत्रियों की एकजुट चीख है कि यह बजट एंटी-फेडरल, एंटी-पुअर और पूरी तरह दिशाहीन है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे “डायरेक्शनलेस, विजनलेस और एंटी-पीपल” कहा है, जहाँ बजट भाषण में बंगाल का जिक्र तक नहीं किया गया।
स्टालिन और केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने भी केंद्र पर राज्यों की उपेक्षा का आरोप लगाया। शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण सड़कें (PMGSY में कटौती), PMAY (ग्रामीण) और इंटर्नशिप स्कीम जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं में कटौती ने साबित किया कि केंद्र का फोकस सिर्फ अपने वोटबैंक वाले राज्यों पर है।
16वें फाइनेंस कमीशन की 41% डेवोल्यूशन (राजस्व हस्तांतरण) जारी रखने से तमिलनाडु जैसे राज्य सालाना 5,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठा रहे हैं। चुनावी साल में यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई के अलावा और कुछ नहीं है। विपक्ष के पास अब यह मुद्दा एक सुनहरा हथियार बन गया है, जो जनता को याद दिलाएगा कि केंद्र सिर्फ अपनी सत्ता की राजनीति देखता है।
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आर्थिक सुधारों के नाम पर कागजी आंकड़े और जनता से धोखाधड़ी
आर्थिक सुधारों का ढोल पीटने वाली सरकार असल में जमीनी सुधारों से भाग रही है और वेलफेयर योजनाओं में कटौती पर उतर आई है। जहाँ बेरोजगारी दरें चरम पर हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था डगमगा रही है, वहां बजट में कोई ‘गेम-चेंजर’ घोषणा नहीं की गई।
पुरानी योजनाओं को कागजी आवंटन देकर और बाद में रिवाइज्ड एस्टीमेट्स में उन्हें काटकर जनता को ठगा जा रहा है। कुल व्यय में 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कटौती और रेवेन्यू रिसीट्स में 78,000 करोड़ रुपये की कमी के आंकड़े बताते हैं कि सरकार फिस्कल डिसिप्लिन (राजकोषीय अनुशासन) के नाम पर सोशल सेक्टर को पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है।
यह गरीब विरोधी बजट 2026 न सिर्फ दिशाहीन है, बल्कि लोगों की पीड़ा से पूरी तरह कटा हुआ एक ऐसा दस्तावेज है जो अमीरों के लिए अवसर और गरीबों के लिए सिर्फ निराशा लेकर आया है। इसमें कोई स्ट्रक्चरल रिफॉर्म या रिलीफ पैकेज नहीं है जो आम नागरिक को राहत दे सके।
विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार: चुनावी मैदान में भारी पड़ेगा बजट का वार
चुनावी मौसम में यह गरीब विरोधी बजट 2026 विपक्ष के लिए सबसे बड़ा हथियार साबित होने जा रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, राज्यों की उपेक्षा, जल और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों पर की गई कटौती, और फेडरल स्ट्रक्चर का खुला उल्लंघन—ये सभी मुद्दे मिलकर जनता को यह संदेश देंगे कि केंद्र में बैठी सरकार उनकी नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी राजनीति और कॉर्पोरेट्स की हितैषी है।
अगर विपक्ष इसे सही ढंग से उठाएगा, जैसा कि राहुल गांधी, एम.के. स्टालिन और ममता बनर्जी कर रहे हैं, तो 2026-27 का यह बजट सत्तापक्ष के लिए राजनीतिक रूप से सबसे महंगा साबित हो सकता है।
राज्यसभा और लोकसभा में होने वाली बहस, मीडिया कवरेज और जमीन पर किया गया प्रचार इन मुद्दों को वोटों में तब्दील करने की पूरी क्षमता रखता है। जनता अब केंद्र की इन नीतियों का हिसाब मांगने के लिए तैयार बैठी है।
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राजनीतिक पूर्वाग्रह और विफल आर्थिक नीतियों का दस्तावेज
संक्षेप में कहें तो, यह बजट न सिर्फ आर्थिक नीतियों की नाकामी है, बल्कि राजनीतिक पूर्वाग्रह और सोशल सेक्टर की उपेक्षा का एक जीता-जागता सबूत भी है। आम जनता की उम्मीदों पर पानी फेरकर, विपक्ष को मजबूत बनाने का काम खुद सरकार ने ही कर दिया है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि महंगाई और बेरोजगारी की यह आग और राज्यों के बीच बढ़ता असंतोष आने वाले चुनावों में कितने वोटों में तब्दील होता है। बजट भले ही कागजों पर संतुलित और आंकड़ों के जाल में लिपटा हुआ दिखे, लेकिन जमीन पर यह सिर्फ निराशा, उपेक्षा और बढ़ती आर्थिक असमानता की एक कड़वी कहानी लिख रहा है।
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