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 “भारतीय सेना AASHVAST लैब”मिलिट्री ड्रोन में चीनी पार्ट्स की जांच करेगी

भारतीय सेना AASHVAST लैब

  भारतीय सेना AASHVAST लैब आधुनिक युद्ध रणनीति में मानवरहित प्रणालियों (Unmanned Aerial Systems) की बढ़ती भूमिका को देखते हुए भारतीय सेना ने अपनी तकनीकी और साइबर सुरक्षा तैयारियों को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है।

भारतीय सेना ने नई दिल्ली में ‘AASHVAST’ (असेसमेंट एंड एनालिसिस ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम हार्डवेयर फॉर वल्नरेबिलिटीज एंड सिक्योरिटी थ्रेट्स) नामक एक अत्याधुनिक परीक्षण प्रयोगशाला (Testing Facility) का उद्घाटन किया है।

इस समर्पित लैब का मुख्य उद्देश्य भारतीय सेना द्वारा उपयोग किए जाने वाले सैन्य ड्रोन में छिपे साइबर खतरों, सॉफ्टवेयर कमजोरियों और अवांछित या संदिग्ध चीनी घटकों (Chinese Parts) की पहचान करना है।

14 अगस्त को हुआ उद्घाटन, एयर-गैप्ड और रीड-ओनली तकनीक पर आधारित

यह विशेष परीक्षण सुविधा इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियरिंग महानिदेशालय (DG EME) के अंतर्गत स्थापित की गई है। इस लैब का उद्घाटन 14 अगस्त को आर्मी चीफ जनरल धीरज सेठ द्वारा किया गया।

AASHVAST लैब की सबसे बड़ी विशेषता इसका एयर-गैप्ड (Air-gapped) और रीड-ओनली (Read-only) सिस्टम होना है। इसका अर्थ यह है कि जांच प्रक्रिया के दौरान ड्रोन को इंटरनेट या किसी बाहरी नेटवर्क से पूरी तरह अलग रखा जाता है, जिससे परीक्षण के समय ड्रोन के मूल सॉफ्टवेयर या फर्मवेयर में बिना किसी फेरबदल के उसकी शत-प्रतिशत सटीक जांच की जा सके।

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क्यों पड़ी इस खास लैब की जरूरत?

सैन्य अभियानों में उपयोग किए जाने वाले ड्रोन के भौतिक पहलुओं जैसे वजन, बॉडी स्ट्रक्चर और पेलोड क्षमता का परीक्षण अक्सर कर लिया जाता है। हालांकि, उनके एम्बेडेड सॉफ्टवेयर, फर्मवेयर और इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों की अंदरूनी जांच करना एक जटिल चुनौती बनी रहती है।

क्विकपे टेक (Quickpay Tech) द्वारा निर्मित इस लैब को लेकर कंपनी के निदेशक राजीब रॉय ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक और सतही निरीक्षणों में छिपा हुआ मालवेयर, बैकडोर एक्सेस या सॉफ्टवेयर-स्तरीय खतरे पकड़ में नहीं आते हैं। AASHVAST लैब इसी सुरक्षा चूक को खत्म करने के लिए विकसित की गई है।

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AASHVAST लैब में होगी इन सुरक्षा बिंदुओं की जांच

यह लैब प्रत्येक मिलिट्री ड्रोन का गहन विश्लेषण करती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उसकी प्रणाली सुरक्षित और प्रामाणिक है। जांच के मुख्य बिंदुओं में शामिल हैं:

बैकडोर और हिडन पासवर्ड की खोज: ड्रोन के सॉफ्टवेयर में छिपे रिमोट-एक्सेस टूल्स, एम्बेडेड एन्क्रिप्शन की (Encryption Keys) और अघोषित पासवर्ड की पहचान करना, जो अनधिकृत पहुंच (Unauthorized Access) का कारण बन सकते हैं।

सॉफ्टवेयर अपडेट्स का सत्यापन: यह जांचना कि ड्रोन केवल अधिकृत और प्रामाणिक निर्माताओं (Authorized Manufacturers) से ही फर्मवेयर या सॉफ्टवेयर अपडेट प्राप्त कर रहा है या नहीं।

GPS स्पूफिंग और जैमिंग से बचाव: इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) के दौरान दुश्मन द्वारा जीपीएस स्पूफिंग या सिग्नल जैमिंग की स्थिति में ड्रोन के व्यवहार और लोकेशन कंट्रोल मैकेनिज्म का मूल्यांकन करना।

फर्मवेयर एक्सट्रैक्शन: फ्लाइट कंट्रोलर, कैमरा पेलोड या स्टोरेज चिप्स से सीधे सॉफ्टवेयर इमेज निकालकर गहराई से फोरेंसिक विश्लेषण करना।

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भारतीय रक्षा तंत्र को मिलेगा बड़ा संबल

परीक्षण प्रक्रिया पूरी होने के बाद, यह प्रणाली स्वचालित रूप से एक सरलीकृत और तकनीकी सुरक्षा रिपोर्ट तैयार करती है। इस रिपोर्ट में पाई गई कमियों और कमजोरियों को उनकी गंभीरता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, जिससे तकनीकी विशेषज्ञों और उपकरण खरीद अधिकारियों (Procurement Officers) दोनों को सटीक डेटा प्राप्त होता है।

भारतीय सेना के अनुसार, AASHVAST लैब न केवल भारत के घरेलू रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र (Domestic Defense Ecosystem) को प्रोत्साहित करेगी, बल्कि सैन्य अभियानों की साइबर लचीलापन (Cyber Resilience) और परिचालन तत्परता को भी अत्यधिक मजबूती प्रदान करेगी।

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