“सुप्रीम कोर्ट अरावली रिपोर्ट” 6 महीने की मोहलत की मांग खारिज की,
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला के परिसीमन और परिभाषा से जुड़े बेहद संवेदनशील मामले में गठित हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) को बड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए छह महीने का अतिरिक्त समय मांगने वाली समिति की अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने समिति को 30 नवंबर तक अपनी रिपोर्ट हर हाल में जमा करने का सख्त अल्टीमेटम दिया है।
शीर्ष अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए चेतावनी दी कि यदि पैनल तय समयसीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने में विफल रहता है, तो पूरी समिति का पुनर्गठन कर दिया जाएगा।
‘दिन-रात काम करे पैनल, नहीं तो बदल दी जाएगी पूरी कमेटी’: CJI
मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाया और कहा, “पैनल को अरावली के मुद्दे पर दिन-रात काम करने दें। अगर वे दो महीने के भीतर रिपोर्ट नहीं सौंप पाते हैं, तो हम पूरे पैनल को फिर से गठित करेंगे।”
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि समिति ने बिना किसी ठोस प्रगति के एक्सटेंशन की मांग की है। पीठ ने निर्देश दिया कि यदि पूरी रिपोर्ट में समय लग रहा है, तो पैनल विशिष्ट मुद्दों से संबंधित अंतरिम रिपोर्ट (Issue-specific interim report) प्रस्तुत करे, ताकि अदालत आवश्यक बिंदुओं पर फैसला ले सके।
अदालत ने पैनल को निर्देश दिया कि वह राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों सहित सभी प्रभावित हितधारकों की बातें सुने।
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28 फरवरी 2027 तक समय सीमा बढ़ाने की थी मांग
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित अरावली हाई-पावर्ड कमेटी की अंतिम रिपोर्ट सौंपने की शुरुआती समयसीमा 31 अगस्त थी। हालांकि, 31 अगस्त को दाखिल अपनी अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) में पैनल ने कहा कि अरावली क्षेत्र का वैज्ञानिक, पारिस्थितिक, भूगर्भीय, जलवैज्ञानिक और सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन करने के लिए अधिक समय की आवश्यकता है।
कमेटी ने अदालत से अंतिम रिपोर्ट की समयसीमा को बढ़ाकर 28 फरवरी 2027 करने की मांग की थी। पैनल का तर्क था कि अरावली से जुड़ा मुद्दा केवल एक तकनीकी सीमांकन नहीं है, बल्कि इसके व्यापक वैज्ञानिक और सामाजिक-आर्थिक प्रभाव हैं, जिन्हें केवल एक भू-भाग आधारित मानदंड से तय नहीं किया जा सकता।
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क्या है अरावली परिभाषा और खनन से जुड़ा पूरा विवाद?
अरावली का यह विवाद मुख्य रूप से इस क्षेत्र में अवैध और वैध खनन गतिविधियों के नियमन से शुरू हुआ था:
20 नवंबर 2025 का फैसला: तत्कालीन चीफ जस्टिस बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने खनन को विनियमित करने के लिए अरावली पहाड़ियों की ऊंचाई-आधारित परिभाषा (Elevation-based criteria) को मंजूरी दी थी। इसके तहत आसपास के स्थानीय क्षेत्र से 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली संरचना को अरावली पहाड़ी और 500 मीटर के दायरे में ऐसी दो पहाड़ियों को रेंज का हिस्सा माना गया था।
पर्यावरणविदों का विरोध: इस परिभाषा की तीखी आलोचना हुई। विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि 100 मीटर की सीमा तय होने से अरावली का लगभग 90% से अधिक हिस्सा कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा और खनन माफियाओं के लिए सुलभ हो जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट का स्वत: संज्ञान: विवाद गहराने पर 29 दिसंबर 2025 को CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने 20 नवंबर के आदेश पर रोक लगा दी और मुद्दे की नए सिरे से जांच करने के लिए मई में एक नई स्वतंत्र एक्सपर्ट कमेटी (HPC) का गठन किया।
सुप्रीम कोर्ट ने अब इस पूरे मामले को अगली सुनवाई के लिए 2 दिसंबर को सूचीबद्ध किया है। शीर्ष अदालत के इस कड़े रुख से साफ है कि अरावली के पारिस्थितिक संरक्षण को लेकर अब किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
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