“राजनीतिक चंदा विवाद” चुनावी फंडिंग की पारदर्शिता पर खड़े हुए गंभीर सवाल
राजनीतिक चंदा विवाद भारत में चुनावी फंडिंग और राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक आकलनों के अनुसार, देश में ‘रजिस्टर्ड अनरेकग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टीज’ (RUPP) यानी पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की रकम में अप्रत्याशित उछाल देखा गया है।
बहुत कम चुनावी आधार या नगण्य जनसमर्थन वाली कई ऐसी पार्टियों के खातों में करोड़ों रुपये का चंदा आने के आंकड़ों ने देश के चुनावी तंत्र, वित्तीय पारदर्शिता और चुनाव आयोग के नियमों पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं।
विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों का आरोप है कि इन अनजान और कागजी रूप से सक्रिय दिखने वाली राजनीतिक संस्थाओं का उपयोग वित्तीय चक्रों को पूरा करने और चुनावी चंदे की पहचान छिपाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
क्या हैं RUPP और चंदे के चौंकाने वाले आंकड़े?
भारत में चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल को रजिस्टर्ड अनरेकग्नाइज्ड पार्टी का दर्जा पाने के लिए न्यूनतम 100 सदस्यों की सूची, एक संगठनात्मक संविधान और तय प्रक्रिया पूरी करनी होती है। हालांकि, इन दलों को राष्ट्रीय या राज्यस्तरीय मान्यता प्राप्त पार्टी की तरह व्यापक चुनावी आधार साबित करने की आवश्यकता नहीं होती।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार:
सीमित उम्मीदवार, विशाल चंदा: कई ऐसी छोटी पार्टियों ने, जिन्होंने हालिया चुनावों में मात्र कुछ ही उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, सैकड़ों करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त किया।
पारंपरिक दलों से अधिक फंडिंग: कुछ अनजानी पार्टियों द्वारा प्राप्त चंदा राष्ट्रीय स्तर की स्थापित राजनीतिक पार्टियों के कुल घोषित चंदे से भी अधिक पाया गया।
समान पते और दफ्तर: जांच में यह भी सामने आया कि इनमें से कई पार्टियों के मुख्य कार्यालय एक ही पते या क्षेत्र से संचालित हो रहे हैं, जहां जमीनी स्तर पर कोई बड़ा संगठनात्मक ढांचा या सक्रिय जनसंपर्क नजर नहीं आता।
आयकर छूट और वित्तीय पारदर्शिता पर संशय
भारतीय कानून के तहत राजनीतिक दलों को मिलने वाले दान और चंदे पर आयकर अधिनियम की धारा 13A के तहत छूट प्राप्त होती है। आलोचकों और वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस छूट और चुनावी चंदे के ढीले नियमों का फायदा उठाकर कुछ संस्थाएं वित्तीय अनियमितताओं और फंड रूटिंग के लिए इन RUPP का इस्तेमाल कर रही हैं।
जब इन छोटी पार्टियों के खर्च के ब्योरे का विश्लेषण किया गया, तो पाया गया कि कुल प्राप्त चंदे का एक बड़ा हिस्सा चुनावी प्रचार के बजाय ‘अन्य खर्चों’ या ‘चैरिटी’ के मद में दिखाया गया, जबकि वास्तव में उनका चुनावी खर्च बेहद नगण्य था।
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विपक्षी दलों के सवाल और चुनावी सुधार की मांग
चुनावी बॉन्ड योजना पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, राजनीतिक दलों की वित्तीय फंडिंग के नए स्रोतों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है। सवाल उठाए जा रहे हैं कि बिना किसी ठोस आधार के काम कर रही इन गुमनाम पार्टियों को मिल रहे अरबों रुपये के चंदे की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि RUPP की फंडिंग प्रक्रिया की कड़ाई से निगरानी नहीं की गई, तो इससे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और चुनावी शुचिता को गहरा नुकसान पहुंच सकता है।
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आगे का रास्ता
भारत में पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया बनाए रखने के लिए यह आवश्यक हो गया है कि राजनीतिक दलों के पंजीकरण, उन्हें मिलने वाली आयकर छूट और उनके वित्तीय ऑडिट की शर्तों को अत्यधिक कड़ा किया जाए।
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चुनाव आयोग और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) को ऐसी संदिग्ध पार्टियों की मान्यता रद्द करने और उनके आय-व्यय के स्रोतों की गहन जांच करने की सख्त आवश्यकता है ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का विश्वास बना रहे। हालिया वर्षों में सामने आया राजनीतिक चंदा विवाद देश में पारदर्शी शासन व्यवस्था और चुनाव सुधारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभरा है। उच्चतम न्यायालय और चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों के बाद राजनीतिक चंदा विवाद पर व्यापक बहस शुरू हो गई है,
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