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अडानी ग्रुप मार्केट क्रैश के बीच SEC का शिकंजा, समन पर फंसा पेच

अडानी ग्रुप मार्केट क्रैश

अडानी ग्रुप मार्केट क्रैश गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) की सिविल फ्रॉड जांच अब अपने सबसे पारदर्शी और गंभीर मोड़ पर पहुंच गई है। नवंबर 2024 में 265 मिलियन डॉलर की रिश्वतखोरी और सिक्योरिटीज फ्रॉड के गंभीर आरोपों के साथ शुरू हुआ यह मामला, 14 महीने बीत जाने के बाद भी एक साधारण समन सर्व न हो पाने के कारण अधर में लटका हुआ है।

SEC ने अपनी जांच में पाया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग मिलने के बजाय, प्रक्रियात्मक बाधाओं का एक जाल बुना गया है। इस देरी ने न केवल कानूनी विशेषज्ञों को हैरान किया है, बल्कि वैश्विक बाजारों में भारत की विनियामक पारदर्शिता पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं।

हेग सर्विस कन्वेंशन और भारत सरकार के रिजेक्शन की इनसाइड स्टोरी

मामले की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि SEC ने फरवरी 2025 से ही हेग सर्विस कन्वेंशन के प्रावधानों के तहत भारत के कानून और न्याय मंत्रालय के माध्यम से कानूनी समन तामील कराने की कोशिश की थी। लेकिन भारत सरकार की ओर से इसे दो बार रिजेक्ट कर दिया गया।

पहला रिजेक्शन मई 2025 में हुआ, जब मंत्रालय ने दस्तावेजों में ‘इंक सिग्नेचर’ और ‘ऑफिशियल सील’ न होने का तर्क दिया। हालांकि, SEC का स्पष्ट तर्क है कि हेग कन्वेंशन, जिसे भारत ने 2007 में रैटिफाई किया था, ऐसी किसी सख्त औपचारिकता की मांग नहीं करता है। इससे पहले भी कई क्रॉस-बॉर्डर कानूनी प्रक्रियाओं में ऐसी मांगें कभी नहीं रखी गईं, जो इस मामले में सरकार के रुख को संदेहास्पद बनाती हैं।

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तकनीकी आपत्तियां या राजनीतिक संरक्षण का ढाल?

दिसंबर 2025 में जब दूसरी बार समन को रिजेक्ट किया गया, तो मंत्रालय के तर्क और भी विचित्र हो गए। इस बार तकनीकी आपत्तियों के साथ-साथ सीधे तौर पर अमेरिकी रेगुलेटर SEC की अथॉरिटी पर ही सवाल उठा दिया गया कि क्या वह हेग कन्वेंशन का इस्तेमाल करने का पात्र है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इतने महीनों तक छोटी-छोटी बातों पर अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया को अटकाना सामान्य नहीं है। जब आरोपी देश के सबसे प्रभावशाली उद्योगपति हों, तो यह सीधे तौर पर राजनीतिक हस्तक्षेप की ओर इशारा करता है। यह स्थिति दिखाती है कि कैसे नियम आम नागरिक के लिए पत्थर की लकीर हैं, लेकिन रसूखदारों के लिए इनमें लचीलेपन की गुंजाइश बना दी जाती है।

न्यूयॉर्क कोर्ट में SEC का बड़ा प्रहार और ईमेल सर्विस की मांग

14 महीने के इंतजार के बाद, अमेरिकी सिस्टम का धैर्य जवाब दे गया है। 21 जनवरी 2026 को SEC ने न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट फेडरल कोर्ट (ब्रुकलिन) में मजिस्ट्रेट जज के सामने एक महत्वपूर्ण मोशन दायर किया।

इसमें मांग की गई है कि चूंकि हेग रूट पूरी तरह ब्लॉक हो चुका है, इसलिए ‘अल्टरनेटिव सर्विस’ (Rule 4(f)(3)) के तहत ईमेल के जरिए या अडानी के अमेरिकी वकीलों को सीधे समन सर्व करने की इजाजत दी जाए।

SEC ने कोर्ट को प्रमाण दिए हैं कि गौतम अडानी और सागर अडानी को आरोपों की पूरी जानकारी है और वे पहले से ही अपनी डिफेंस तैयार कर रहे हैं। अडानी ग्रुप मार्केट क्रैश के साये में SEC का यह कदम संकेत है कि वह अब भारत की प्रोसीजरल बाधाओं को बायपास करने के लिए तैयार है।

रॉबर्ट जे. गिफ्रा जूनियर का लेटर और अडानी पक्ष की नई चाल

SEC के मोशन के ठीक दो दिन बाद, 23 जनवरी 2026 को अडानी पक्ष के वकील सुलिवन एंड क्रॉमवेल के पार्टनर रॉबर्ट जे. गिफ्रा जूनियर ने कोर्ट में एक संक्षिप्त पत्र दाखिल किया। इस पत्र में खुलासा किया गया कि प्रतिवादी (गौतम और सागर अडानी की सहमति से) और SEC अब समन तामील करने के तरीके पर एक ‘शर्त’ (stipulation) के लिए बातचीत कर रहे हैं।

उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया है कि SEC के 21 जनवरी के मोशन पर फैसला फिलहाल टाल दिया जाए ताकि यह समझौता पूरा हो सके। यह एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है, जिससे अडानी अब SEC से सीधी डील कर कोर्ट की सख्त टिप्पणियों को दरकिनार करना चाहते हैं।

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निवेशकों में खौफ और 1 लाख करोड़ रुपये की भारी गिरावट

कानूनी दांव-पेंच के इस माहौल का असर शेयर बाजार पर बिजली की गति से हुआ। 23 जनवरी को एक ही कारोबारी सत्र में अडानी ग्रुप मार्केट क्रैश देखने को मिला, जिससे समूह की लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप 12.5 बिलियन डॉलर (लगभग 1 लाख करोड़ रुपये) साफ हो गया। कई स्टॉक्स 10% से 14% तक टूट गए।

निवेशक समझ चुके हैं कि यह लड़ाई अब केवल कानूनी नहीं रह गई है, बल्कि यह उच्च-स्तरीय राजनीतिक संरक्षण की साख की लड़ाई बन गई है। हालांकि अडानी ग्रुप ने सफाई दी है कि आरोप व्यक्तिगत हैं न कि कंपनियों पर, लेकिन वैश्विक निवेशकों के लिए टॉप मैनेजमेंट पर लगा फ्रॉड का ठप्पा वैल्यूएशन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

अंतरराष्ट्रीय संधियों की अनदेखी और कूटनीतिक प्रभाव

भारत द्वारा हेग कन्वेंशन की भावना के विपरीत जाकर ‘इंक सिग्नेचर’ जैसे बहाने बनाना अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश की छवि को प्रभावित कर रहा है। एक तरफ भारत ट्रेड, डिफेंस और टेक्नोलॉजी में अमेरिका के साथ गहरे सहयोग की आकांक्षा रखता है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी रेगुलेटर्स की जांच में सहयोग न करना विरोधाभास पैदा करता है।

अगर SEC कोर्ट से ईमेल सर्विस की अनुमति प्राप्त कर लेता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग के मामले में भारत के लिए एक बड़ा धब्बा होगा। अडानी ग्रुप मार्केट क्रैश यह साबित करता है कि ग्लोबल मार्केट अब “रूल ऑफ लॉ” की निष्पक्षता को लेकर बेहद सतर्क है और किसी भी प्रकार के “क्रोनी कैपिटलिज्म” को जोखिम के रूप में देख रहा है।

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संस्थानिक साख और भविष्य की राह

यह मामला अब केवल एक उद्योगपति की कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भारतीय संस्थानों की विश्वसनीयता का लिटमस टेस्ट बन गया है। अडानी के वकीलों द्वारा की जा रही बातचीत महज समय खरीदने की रणनीति भी हो सकती है, लेकिन SEC का अडिग रुख बताता है कि जांच अब डिस्कवरी और डिपोजिशन के चरण तक पहुंचकर ही दम लेगी।

अगर नेगोशिएशन विफल होता है और कोर्ट वैकल्पिक सर्विस को मंजूरी देता है, तो अडानी को अमेरिकी कानून के समक्ष जल्द जवाबदेह होना पड़ेगा। समय अब तेजी से निकल रहा है और वैश्विक निगरानी के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून के आगे राजनीतिक ढाल टिक पाएगी या नहीं।

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