Loading Now

असम सरकार की योजना: मूल निवासियों को बंदूक लाइसेंस, विवाद गहराया

असम सरकार "मूल निवासियों" को बंदूक लाइसेंस देगी

“असम सरकार की योजना राज्य में तूफान ला दिया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बड़ा ऐलान किया। छह जिलों के “मूल निवासियों” को बंदूक लाइसेंस दिए जाएंगे।”

यह असम सरकार की योजना बुधवार को कैबिनेट की मंजूरी के बाद सामने आई। सरकार का दावा है कि यह अवैध खतरों से सुरक्षा के लिए जरूरी है। विपक्ष ने इस कदम को खतरनाक और राजनीतिक बताया है।

योजना का स्वरूप और घोषित उद्देश्य

इस विशेष असम सरकार की योजना के तहत बाक्सा, बरपेटा, दर्रांग, मंगलदई, शोणितपुर और नलबाड़ी जिले शामिल हैं। सरकार इन्हें “असुरक्षित और दूरदराज” क्षेत्र बता रही है। मुख्यमंत्री सरमा ने बांग्लादेश सीमा से खतरे का हवाला दिया।

उनका कहना है कि बांग्लादेश में हाल की घटनाओं से असुरक्षा है। स्वदेशी लोगों को हमलों और जमीन हड़पने का डर सता रहा है। सरकार लाइसेंस देगी, लेकिन बंदूक खरीदने में आर्थिक मदद नहीं करेगी। सरमा ने पूर्व कांग्रेस सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अगर पहले लाइसेंस दिए जाते तो बहुत सी जमीनें नहीं बिकतीं।

योजना के विवादास्पद पहलू

इस सरकारी पहलकदमी पर तुरंत सवाल उठने लगे। सबसे बड़ा सवाल भौगोलिक है। छह में से चार जिले (बरपेटा, दर्रांग, नलबाड़ी, शोणितपुर) बांग्लादेश सीमा से सटे ही नहीं हैं। दूसरा बड़ा मुद्दा जनसांख्यिकीय है। ये सभी छह जिले मुस्लिम बहुल इलाके हैं। विश्लेषक मान रहे हैं कि यह चुनावी कैलेंडर से जुड़ा है।

असम में अगले साल (2026) विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा लंबे समय से ‘अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों’ को मुद्दा बनाती रही है। यह राज्य सरकार की पहल सीधे तौर पर ‘भूमिपुत्रों’ को लक्षित करती है। इन्हें बंगाली भाषी मुसलमानों से खतरा बताया जा रहा है। यह कदम सरकार की ‘पुश बैक’ नीति के साथ आया है। इस नीति का लक्ष्य अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजना है।

इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट: असम में फर्जी पुलिस मुठभेड़ों की जांच का आदेश

विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया और आरोप

विपक्षी दलों ने इस असम सरकार के प्रस्ताव को आग में घी डालने वाला बताया। नवनियुक्त राज्य कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई सबसे आगे हैं। उन्होंने इसे “अराजकता और जंगलराज की ओर कदम” करार दिया। गोगोई ने साफ कहा कि असम के लोगों को नौकरियां चाहिए। उन्हें किफायती स्वास्थ्य सेवा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए। उन्हें बंदूकें नहीं चाहिए।

गोगोई ने एक बड़ा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सरकार पुलिस और सीमा बलों को मजबूत करने की बजाय क्यों भाजपा-आरएसएस समर्थकों और अपराधी गिरोहों को हथियार बांटने पर तुली है? उन्होंने चेतावनी दी कि इससे गैंग वॉयलेंस बढ़ेगी। व्यापारियों को परेशान किया जाएगा। उन्होंने तुरंत फैसला वापस लेने की मांग की।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेन बोरा ने अमेरिका का उदाहरण दिया। उन्होंने पूछा, “क्या हम अमेरिका की नकल करना चाहते हैं?” वहां बंदूक हिंसा से बड़े पैमाने पर मौतें होती हैं। क्या हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे ऐसे हिंसक माहौल में पलें-बढ़ें?

सांप्रदायिक विभाजन के आरोप

रायजोर दल के प्रमुख अखिल गोगोई ने सीधा आरोप लगाया। उनका कहना है कि यह एक “खतरनाक राजनीतिक रणनीति” है। असम सरकार की यह योजना चुनाव से पहले सांप्रदायिक अशांति फैलाने के लिए है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार कहती है कि वह स्वदेशियों की रक्षा नहीं कर सकती, तो यह गृह विभाग की विफलता है। यह बेहद शर्मनाक है।

अखिल गोगोई ने जोर देकर कहा कि यह कोई सामान्य नीतिगत कदम नहीं है। इससे असम के समाज में गहरी दरार पड़ सकती है। चुनाव नजदीक आते ही सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ सकता है।

असम जातीय परिषद के अध्यक्ष लुरिनज्योति गोगोई ने भी इसी राग को दोहराया। उन्होंने कहा कि यह चुनाव से पहले समुदायों को बांटने की सोची-समझी चाल है। पहले ‘स्मार्ट पुलिस’ का नारा था। फिर ‘पुलिस राज’ की बात हुई। अब ‘सबके लिए बंदूक’ की नई संस्कृति थोपी जा रही है। यह सिर्फ अक्षमता नहीं, सोची-समझी साजिश है।

इसे भी पढ़ें: कोलंबिया बयान वापसी, भारत की कूटनीतिक जीत और थरूर की सफलता

सामुदायिक चिंताएँ और सुरक्षा तंत्र पर सवाल

अल्पसंख्यक समुदाय और सिविल सोसाइटी भी चिंतित हैं। ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष रेजाउल करीम ने गहरी आशंका जताई। उन्होंने कहा कि असमिया लोग, चाहे अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक, शांतिप्रिय हैं। लेकिन यह असम सरकार की योजना इस शांति को भंग कर सकती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है। गृह विभाग इसी काम के लिए बना है। जनता को कलम और विकास चाहिए, बंदूकें नहीं। ऐसा करके सरकार अपनी विफलता खुद स्वीकार कर रही है।

तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सुस्मिता देव ने भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का यह बयान बीएसएफ (सीमा सुरक्षा बल) और असम पुलिस के लिए अपमानजनक है। सरमा का कहना कि ‘भूमिपुत्र’ खुद को अवैध अप्रवासियों से बचाएंगे, यह दर्शाता है कि सरकार को अपने ही सुरक्षा बलों पर भरोसा नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

चुनावी पृष्ठभूमि और भविष्य की आशंकाएँ

राजनीतिक पर्यवेक्षक इस असम सरकार की योजना को 2026 के विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। भाजपा ‘अवैध प्रवासन’ को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है। ‘पुश बैक’ नीति और अब बंदूक लाइसेंस का यह कदम इसी रणनीति का हिस्सा लगता है। विपक्ष और नागरिक समाज को गहरी चिंता है कि इससे समाज में सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा।

व्यक्तिगत प्रतिशोध की घटनाएं बढ़ सकती हैं। आपराधिक गिरोहों को बढ़ावा मिल सकता है। स्थानीय व्यापारियों और आम नागरिकों के लिए असुरक्षा का माहौल पैदा हो सकता है।

इसे भी पढ़ें: स्वदेशी ब्रांड संकट: भारत का विनिर्माण विरोधाभास

सुरक्षा बनाम राजनीति का सवाल

असम सरकार की यह विवादास्पद योजना गंभीर सवालों के घेरे में है। सरकार इसे स्वदेशी आबादी की सुरक्षा और उनकी जमीन बचाने का जरूरी उपाय बता रही है। विपक्ष और आलोचक इसे साफ तौर पर चुनावी स्टंट मानते हैं। उनका मानना है कि यह सांप्रदायिक विभाजन को गहरा करने का एक खतरनाक प्रयास है।

इस नीति के दीर्घकालिक सामाजिक और कानून-व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर गंभीर आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी नागरिकों पर थोपने के बजाय पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बलों और खुफिया तंत्र को मजबूत करना ज्यादा कारगर होगा।

असम के लोगों को शांति, रोजगार, शिक्षा और विकास की जरूरत है। उन्हें हथियारों की होड़ या सांप्रदायिक तनाव की जरूरत नहीं है। असम सरकार की इस योजना का भविष्य अब राजनीतिक बहस और सार्वजनिक प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।

Spread the love

Post Comment

You May Have Missed