“मुंबई क्लस्टर रीडेवलपमेंट पर बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला:
मुंबई क्लस्टर रीडेवलपमेंट फैसला देश की आर्थिक राजधानी और दुनिया के सबसे घने शहरी क्षेत्रों में से एक, मुंबई में पुरानी और जर्जर इमारतों के कायाकल्प को लेकर एक बड़ा कानूनी और नीतिगत अवरोध समाप्त हो गया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MHADA) के बड़े लेआउट्स के क्लस्टर (सामूहिक) या एकीकृत (Integrated) पुनर्विकास के पक्ष में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।
जस्टिस मकरंद एस. कार्णिक और जस्टिस श्रीराम एम. मोदक की खंडपीठ ने बांद्रा रिक्लेमेशन और वर्ली के आदर्श नगर जैसे मुंबई के सबसे महंगे प्राइम लोकेशंस पर स्थित महाडा कॉलोनियों के पुनर्विकास की टेंडर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली व्यक्तिगत हाउसिंग सोसायटियों की याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग सोसायटियों द्वारा टुकड़ों-टुकड़ों (Piecemeal) में किए जाने वाले निर्माण के मुकाबले सामूहिक और एकीकृत पुनर्विकास से व्यापक जनहित की पूर्ति होती है।
इस ऐतिहासिक फैसले से मुंबई के पांच सबसे बड़े रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स का कानूनी आधार मजबूत हो गया है, जिससे लगभग 37,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश और 80,000 से ज्यादा परिवारों का भविष्य सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
क्या है सरकार की नीति और कोर्ट का तर्क?
यह विवाद राज्य सरकार द्वारा अप्रैल और दिसंबर 2025 में जारी किए गए उन सरकारी प्रस्तावों (GRs) को लेकर था, जिसमें ग्रेटर मुंबई और उपनगरीय क्षेत्रों में 20 एकड़ या उससे अधिक बड़े महाडा लेआउट्स के एकीकृत विकास के लिए एक नई नीति बनाई गई थी। इस नीति के तहत अलग-अलग सोसायटियों को स्वतंत्र रूप से बिल्डर चुनने के बजाय, पूरे लेआउट का विकास एक ही प्राइवेट कंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (C&D) एजेंसी को सौंपने का प्रावधान किया गया था।
इन कॉलोनियों का निर्माण 1950 और 1960 के दशक में मध्यम (MIG) और निम्न आय वर्ग (LIG) के किफायती आवास के रूप में किया गया था, जिनकी इमारतें अब जर्जर हो चुकी हैं। याचिकाकर्ता सोसायटियों का तर्क था कि यह नीति उनकी स्वायत्तता और ‘डेवलपमेंट कंट्रोल एंड प्रमोशन रेगुलेशंस’ (DCPR) के तहत स्वतंत्र विकास के अधिकार का हनन करती है।
अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि महाडा की जमीन पर सोसायटियों का कोई बेरोकटोक या पूर्ण मालिकाना हक नहीं है। एकीकृत पुनर्विकास के माध्यम से सड़कों, सीवरेज, पार्कों और नागरिक सुविधाओं की योजना एक बड़े और समग्र नजरिए (Holistic Approach) से बनाई जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि डेवलपर को ई-टेंडरिंग के तहत लेआउट की कम से कम 51% सोसायटियों की सहमति लेना अनिवार्य है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुकूल है। इसके अलावा, निवासियों को उनके मौजूदा घरों के आकार से दोगुने से अधिक बड़े फ्लैट और उचित कॉर्पस फंड देकर पर्याप्त मुआवजा सुनिश्चित किया गया है।
इसे भी पढ़े : मिस्टर इंडिया कॉकरोच सीन 4 दशक पुराना सीन हुआ वायरल,
मोतीलाल नगर और अभ्युदय नगर के फैसलों का हवाला
बॉम्बे हाई कोर्ट का यह रुख नया नहीं है, बल्कि यह पूर्व के कई नजीर बन चुके फैसलों की अगली कड़ी है। मार्च 2025 में, तत्कालीन चीफ जस्टिस आलोक अराधे (वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश) और जस्टिस भारती एच. डांग्रे की पीठ ने गोरेगांव (पश्चिम) स्थित 36,000 करोड़ रुपये के मोतीलाल नगर पुनर्विकास मामले में भी यही रुख अपनाया था।
उस समय अदालत ने कहा था कि यदि प्रत्येक सोसाइटी केवल अपने संकीर्ण व्यावसायिक हितों को देखेगी, तो पूरे क्षेत्र का व्यवस्थित शहरी नियोजन (Urban Planning) ध्वस्त हो जाएगा। कोर्ट ने माना था कि मोतीलाल नगर में हर साल होने वाले गंभीर जल-जमाव और बाढ़ की समस्या का समाधान केवल एक समग्र ड्रेनेज और क्लस्टर प्लानिंग से ही संभव है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था।
इसी तरह, कालाचौकी के अभ्युदय नगर और अंधेरी-पश्चिम के सरदार वल्लभभाई पटेल (SVP) नगर में भी क्लस्टर मॉडल को मंजूरी दी गई है। वर्तमान में महाडा लगभग 925 एकड़ भूमि पर सी&डीए (C&DA) मॉडल के तहत 11 बड़े क्लस्टर प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है।
इन परियोजनाओं में कॉर्पोरेट जगत की बड़ी कंपनियों की रुचि है; जैसे बांद्रा, वर्ली और मोतीलाल नगर के लिए अडानी प्रॉपर्टीज सबसे ऊंची बोली लगाने वाली कंपनी के रूप में उभरी है, जबकि एसवीपी नगर के लिए जेएसडब्ल्यू स्टील की हनूरा रियल्टी ने बाजी जीती है।
महाराष्ट्र हाउसिंग एक्ट में संशोधन: 13,000 जर्जर इमारतों को मिलेगी संजीवनी
अदालती आदेशों के समांतर, महाराष्ट्र सरकार ने विधायी स्तर पर भी ‘महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट एक्ट’ में एक क्रांतिकारी संशोधन पारित किया है। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य कानून की धारा 79A (Section 79A) को पुनर्जीवित और स्पष्ट करना है।
दरअसल, पिछले साल हाई कोर्ट ने “सक्षम प्राधिकारी” (Competent Authority) शब्द की कानूनी अस्पष्टता के कारण महाडा द्वारा जारी लगभग 935 पुनर्विकास नोटिसों पर रोक लगा दी थी। अब विधानमंडल ने कानून में बदलाव कर सीधे महाडा के अधिकृत अधिकारियों को यह कानूनी शक्ति सौंप दी है।
इस संशोधन से दक्षिण और मध्य मुंबई में स्थित लगभग 13,000 से अधिक पुरानी ‘सेस्ड’ (Cessed) इमारतों के पुनर्विकास की राह में आने वाली अड़चनें दूर हो जाएंगी, जो पिछले कई दशकों से मकान मालिक और किरायेदारों के मुकदमों के कारण अटकी हुई थीं।
इसे भी पढ़े : ट्विशा शर्मा मौत मामला सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, CBI को सौंपी गई जांच
खतरे की घंटी: 5 वर्षों में 345 हादसे और 815 मौतें
मुंबई में जर्जर इमारतों का मुद्दा कितना संवेदनशील और जानलेवा है, इसका अंदाजा सरकारी आंकड़ों से लगाया जा सकता है। आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता जितेंद्र घाडगे की संस्था ‘द यंग व्हिसलब्लोअर्स फाउंडेशन’ द्वारा जुटाई गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 1970 से 2018 के बीच मुंबई में इमारतें ढहने से 815 निर्दोष लोगों की मौत हुई।
वहीं, जनवरी 2021 से अगस्त 2025 के बीच केवल साढ़े चार वर्षों में मुंबई में आंशिक या पूर्ण रूप से इमारत गिरने की 345 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 8 लोगों की जान गई और 28 लोग गंभीर रूप से घायल हुए।
महाडा के ‘मुंबई बिल्डिंग रिपेयर्स एंड रिकंस्ट्रक्शन बोर्ड’ (MBRRB) ने इस मॉनसून से पहले 82 अत्यधिक खतरनाक आवासीय इमारतों की सूची जारी कर उन्हें तुरंत खाली करने का अल्टीमेटम दिया है, जिनमें से 43 इमारतें पिछले साल भी इसी सूची में थीं। किराएदार अक्सर सामुदायिक जुड़ाव और ट्रांजिट कैंपों (अस्थायी आवासों) की खराब स्थिति के डर से घर खाली करने का विरोध करते हैं।
इसे भी पढ़े : UPSC Prelims परीक्षा 2026 देश भर में 5.49 लाख छात्र परीक्षा में शामिल,
संपादकीय दृष्टिकोण:
मुंबई जैसे वैश्विक महानगर में जमीन की अत्यधिक कमी और अनियोजित विकास के कारण ‘क्लस्टर रीडेवलपमेंट’ अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। बॉम्बे हाई कोर्ट का यह निर्णय निजी सोसायटियों के संकीर्ण हितों पर सामूहिक जन सुरक्षा और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की जीत है।
मुंबई की 80 से 100 साल पुरानी पगड़ी और सेस्ड इमारतें हर साल मॉनसून में ‘मौत का जाल’ बन जाती हैं। कानून में हालिया संशोधन और अदालती संरक्षण के बाद महाडा को उन डेवलपर्स और मकान मालिकों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए जो पुनर्विकास में रोड़ा अटकाते हैं।
यह नीति तभी सफल होगी जब निजी कंसोर्टियम तय समय सीमा के भीतर पारदर्शी तरीके से आम नागरिकों को उनके पुनर्वास वाले फ्लैट सौंपेंगे, ताकि मुंबई को झोपड़पट्टियों और जर्जर इमारतों के कलंक से मुक्त कर एक वैश्विक स्तर का ढांचा दिया जा सके। मुंबई क्लस्टर रीडेवलपमेंट फैसला: बदल जाएगी शहर की सूरत, पुरानी इमारतों के पुनर्विकास को लेकर मुंबई क्लस्टर रीडेवलपमेंट फैसला में बड़ी राहत
इसे भी पढ़े : लुटियंस दिल्ली जिमखाना विवाद जिमखाना क्लब को खाली करने का नोटिस



Post Comment