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दलित नेताओं की चुप्पी: कुर्सी के लिए बहुजनों से विश्वासघात

दलित नेताओं की चुप्पी

दलित नेताओं की चुप्पी यह विडंबना ही तो है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का कथित ‘सामाजिक न्याय’ का मॉडल वास्तव में एक कुटिल साजिश का पर्याय बन चुका है, जहां दलित और पिछड़े वर्गों के ‘मसीहा’ बनने का दावा करने वाले नेता अपनी ही कम्युनिटी के खिलाफ होने वाली हिंसा पर खामोश रहते हैं। यह मौजा ही मौजा का दौर उन लोगों के लिए है जो सत्ता की मलाई चख रहे हैं।

जितन राम मांझी, चिराग पासवान, जयंत चौधरी, छगन भुजबल और रामदास आठवले जैसे नाम आज बीजेपी के ‘बैकबोन’ हैं, लेकिन ये वही लोग हैं जो सत्ता की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए अपने मूल वोटबैंक को बेचने में संकोच नहीं करते।

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर जूते से हमले का मामला हो या रायबरेली में दलित युवक हरिओम पासवान की बेरहमी से लिंचिंग, इन ‘दलित चेहरों’ के मुंह से विरोध का एक शब्द भी नहीं निकला।

यह केवल दलित नेताओं की चुप्पी नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित सौदेबाजी है, जहां कुर्सी की लालच में दलितों का खून बहते देखना इनके लिए सामान्य हो गया है। बहुजन समाज के उत्पीड़न के दौर में, ये नेता अपनी मिलीभगत से मौजा ही मौजा कर रहे हैं।

रायबरेली की लिंचिंग और हरियाणा के आईपीएस की आत्महत्या: ‘मसीहा’ बने सौदागर

रायबरेली की लिंचिंग का दर्द तो बस एक उदाहरण है, जहां 38 वर्षीय हरिओम पासवान को ‘ड्रोन चोर’ बताकर भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। इस घटना का वीडियो सामने आया जिसमें हमलावर खुद को ‘बाबा के लोग’ कहते हुए हंसते नजर आए, यहां ‘बाबा’ से तात्पर्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से था।

यह घटना सत्ता संरक्षित अपराधियों की मानसिकता को दर्शाती है, लेकिन इसके बावजूद चिराग पासवान जैसे केंद्रीय मंत्री, जो दलित वोटों पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचे, ने इस घटना पर एक शब्द भी नहीं कहा। न ही जयंत चौधरी ने, जो राष्ट्रीय लोकदल के माध्यम से बीजेपी के साथ गठबंधन में हैं, अपनी चुप्पी तोड़ी।

जब हरिओम की चीखें ‘राहुल गांधी’ का नाम लेने पर मौत की सजा दी जा रहीं थीं, तब ये दलितों के स्वयंभू मसीहा सत्ता के गलियारों में चुपचाप बैठे थे। यह न केवल दलित समाज के साथ विश्वासघात है, बल्कि पूरे लोकतंत्र पर एक तमाचा भी है, जहां कानून व्यवस्था का ढोंग रचकर अपराधियों को संरक्षण दिया जा रहा है।

हरियाणा के आईपीएस अधिकारी वाई. पूरन कुमार की आत्महत्या का मामला और भी शर्मनाक है। एक दलित अधिकारी, जो सिस्टम के जातिगत उत्पीड़न से तंग आकर गोली मारकर खुद को खत्म कर ले।

उनकी पत्नी, आईएएस अमनीत पी. कुमार ने एफआईआर में साफ कहा कि यह जाति-आधारित उत्पीड़न था, फिर भी जयंत चौधरी जैसे ‘पिछड़े नेता’ ने चुप्पी साध ली। ये वही जयंत हैं जो बीजेपी के साथ गठबंधन में हैं और उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम वोटों को लुभाने का दावा करते हैं।

महाराष्ट्र और बिहार: कुर्सी की ‘घास’ चरते बीजेपी के ‘बकरी’

महाराष्ट्र में छगन भुजबल, जो ओबीसी चेहरा होने का दावा करते हैं, ने भी दलित मुद्दों पर कभी मुखरता नहीं दिखाई, बल्कि मराठा आरक्षण विवाद में वे बीजेपी के साथ खड़े होकर पिछड़ों के हक छीनने की पैरवी करते रहे। यह साफ है कि इनकी ‘मसीहाई’ सिर्फ चुनावी ड्रामा है, सत्ता में भागीदारी के लिए।

रामदास आठवले का मामला सबसे हास्यास्पद है। ये वही मंत्री हैं जो सीजेआई गवई पर हमले को ‘जातिगत’ बताकर एससी/एसटी एक्ट की मांग करते हैं, लेकिन बाकी दलित उत्पीड़नों पर खामोश रहते हैं। आठवले खुद बीजेपी के कोर में हैं, और उनकी यह ‘चुनिंदा’ मुखरता सिर्फ दिखावा है।

बिहार के दलित नेता तंज पुनिया ने जितन राम मांझी और चिराग पासवान पर सवाल उठाए कि ये गवई हमले पर क्यों चुप हैं? जवाब साफ है: क्योंकि ये सत्ता के सहभागी हैं, और बीजेपी का ‘बुलडोजर जस्टिस’ इन्हें पसंद है, जब तक यह उनके खिलाफ न हो।

ये नेता दलितों के ‘शेर’ बनने का दावा करते हैं, लेकिन असल में ये बीजेपी के ‘बकरी’ हैं, सत्ता की घास चरने के लिए लाइन में खड़े। यह दलित नेताओं की चुप्पी उनके निजी स्वार्थ का प्रमाण है।

मायावती की दयनीय स्थिति और ओवैसी का ‘वोट कटवा’ खेल

उत्तर प्रदेश में मायावती का हाल और भी दयनीय है। कांशीराम की पुण्यतिथि पर रैली में उन्होंने योगी आदित्यनाथ की खुली तारीफ की, कहा कि योगी सरकार ने दलित स्मारकों की देखभाल के लिए टिकट फंड का सही इस्तेमाल किया। भले ही उन्होंने पांचवीं बार सरकार बनाने का दावा किया, लेकिन अखिलेश यादव ने सही कहा: यह ‘अंदरूनी साठगांठ’ का संकेत है।

मायावती, जो कभी बीजेपी को ‘मनुवादी’ कहती थीं, अब योगी की चमचमाती सड़कों और पार्कों की तारीफ में कसीदे पढ़ रही हैं, जबकि यूपी में दलित लिंचिंग और बुलडोजर की बाढ़ आ रही है।

यह रैली बसपा की कमजोरी का आईना है—9% वोट शेयर वाली पार्टी अब बीजेपी की बी-टिम बनने को तैयार है, ताकि 2027 में योगी को फायदा हो। यह स्थिति दलितों के भविष्य को खतरे में डालती है।

अल्पसंख्यक वोटों की बात करें तो असदुद्दीन ओवैसी का रोल सबसे घिनौना है। बिहार के सीमांचल में उनकी AIMIM ने 2020 में 5 सीटें जीतीं, लेकिन 2024 लोकसभा में फिसड्डी हो गईं, फिर भी, वे इंडिया गठबंधन के वोट काटकर बीजेपी को फायदा पहुंचाने का इंतजाम कर चुके हैं।

ओवैसी की ‘सीमांचल न्याय यात्रा और 100 सीटों पर लड़ने का ऐलान महज ढोंग है, वे जानते हैं कि मुस्लिम वोट बंटवाकर नीतीश-बीजेपी को मजबूत करेंगे। 2025 बिहार चुनावों में यह ‘वोट कटवा’ खेल फिर चलेगा, जहां ओवैसी खुद को ‘मुस्लिम मसीहा बताकर अल्पसंख्यकों को धोखा देंगे।

बीजेपी को इससे ज्यादा खुशी की क्या हो सकती है, जब विरोधी ही उनके लिए ‘B-टीम’ बन जाएं?

बहुजन समाज को जागना होगा

अंत में, इस पूरे तमाशे से लाभ किसका हो रहा है? प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है “बीजेपी का। ये ‘मसीहा’ नेता, चाहे दलित हों, पिछड़े हों या अल्पसंख्यक, सिर्फ सत्ता की भूखे भेड़िए हैं, जो अपनी कम्युनिटी को बलि चढ़ाकर कुर्सी बटोर रहे हैं। जितन राम मांझी की चुप्पी हो या मायावती की तारीफ, ओवैसी का वोट कटना हो या आठवले का ढोंग, इन सबका फायदा मोदी-योगी को हो रहा है।

यह दलित नेताओं की चुप्पी विडंबना नहीं, अपराध है लोकतंत्र का, जहां बहुजनों का खून बहता है और ‘नेता’ भाजपाई जश्न में तालियां बजाते हैं। वक्त है कि बहुजन समाज जागे, इन बिकाऊ मसीहाओं को ठुकराए, वरना 2027 में फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी: बीजेपी की जीत, बहुजनों की हार।

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