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गांधीनगर नगर निगम फेल: दूषित पानी से फैला टाइफाइड,100 से ज्यादा बीमार

गांधीनगर नगर निगम फेल

मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पानी की त्रासदी में कई जानों के नुकसान के बाद अब गुजरात की राजधानी गांधीनगर भी इसी तरह के गंभीर स्वास्थ्य संकट की चपेट में है। यहाँ गांधीनगर नगर निगम फेल साबित हुआ है, जिसके कारण शहर के विभिन्न क्षेत्रों में दूषित पानी की आपूर्ति हुई और टाइफाइड का एक बड़ा प्रकोप फैल गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले पांच दिनों में टाइफाइड के 104 संदिग्ध मामले सामने आए हैं, जिनमें से अधिकांश मरीज़ बच्चे हैं। इस जल प्रदूषण संकट ने मुख्य रूप से सेक्टर 24, 25, 26, 28 और आदिवाड़ा/आदिवासी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। गांधीनगर सिविल अस्पताल में बच्चों के वार्ड मरीजों से भर गए हैं, जिससे प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि संक्रमित मरीजों में बुखार, उल्टी और दस्त जैसे गंभीर लक्षण देखे गए हैं।

इंदौर त्रासदी की पुनरावृत्ति: सीवेज और पीने के पानी का मिश्रण बना काल

गांधीनगर का यह मामला ठीक उसी समय आया है जब इंदौर में दूषित पानी के कारण 149 लोग अस्पताल में भर्ती हैं और कई लोगों की जान जा चुकी है। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में प्रदूषण का मुख्य कारण पानी की पाइपलाइन में रिसाव था, जिससे सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल गया था। गांधीनगर में भी इंजीनियरिंग अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि पाइपलाइन नेटवर्क में कम से कम सात लीकेज की पहचान की गई है। यहाँ ड्रेनेज मरम्मत कार्य के दौरान लापरवाही बरती गई, जिससे सीवर लाइन का गंदा पानी पीने की सप्लाई में मिल गया। इंदौर के जिला मजिस्ट्रेट शिवम वर्मा ने जहाँ मृतकों के लिए 2 लाख रुपये की सहायता और मुफ्त इलाज की घोषणा की है, वहीं गांधीनगर में गांधीनगर नगर निगम फेल होने के चलते लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।

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ड्रेनेज मरम्मत में लापरवाही: 257 करोड़ के प्रोजेक्ट पर उठे बड़े सवाल

हैरानी की बात यह है कि गांधीनगर में यह संकट तब आया है जब यहाँ 24/7 पानी की सप्लाई परियोजना में 257 करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश किया गया है। इंजीनियरिंग अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि नई पाइपलाइनें सीवर लाइनों के बिल्कुल पास बिछाई गई थीं। ड्रेनेज मरम्मत कार्य के कारण संक्रमण फैलना तय था। म्युनिसिपल कमिश्नर जेएन वाघेला और जिला कलेक्ट्रेट अधिकारियों ने माना कि जब लीकेज होता है और सीवर लाइन पास होती है, तो दूषित होना अनिवार्य है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि योजना के कार्यान्वयन में गांधीनगर नगर निगम फेल रहा है, जिसके कारण आज सैकड़ों जिंदगियां दांव पर लगी हैं। अब प्रशासन ‘सुपर-क्लोरीनेशन’ के जरिए स्थिति को नियंत्रित करने का दावा कर रहा है।

अस्पताल में बच्चों की चीखें: 104 मरीज और 22 डॉक्टरों की विशेष टीम तैनात

गांधीनगर सिविल अस्पताल की मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. मीता पारिख ने पुष्टि की है कि अस्पताल में भर्ती मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जिनमें ज्यादातर बच्चे हैं। हालांकि सभी मरीजों की हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है, लेकिन टाइफाइड के पुष्ट मामलों ने चिंता बढ़ा दी है। गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सिविल अस्पताल का दौरा किया और मरीजों के परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने स्थिति की 24/7 निगरानी के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति की है और 22 डॉक्टरों की एक विशेष टीम को तैनात किया है। प्रशासन ने मरीजों के परिवारों का बोझ कम करने के लिए उनके मुफ्त खाने और रहने की व्यवस्था भी की है, जिसकी देखरेख खुद कलेक्टर और मेयर कर रहे हैं।

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स्वास्थ्य अलर्ट: पिछले 72 घंटों में टाइफाइड के मामलों में 50% की भारी बढ़ोतरी

स्वास्थ्य अधिकारियों ने पूरे शहर में अलर्ट जारी किया है क्योंकि पिछले तीन दिनों (72 घंटों) में टाइफाइड के पॉजिटिव मामलों में 50 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। राज्य के परिवार कल्याण और स्वास्थ्य विभाग की अतिरिक्त निदेशक डॉ. नीलम पटेल और प्रधान सचिव राजीव टोपनो ने बताया कि अब तक 102 से 104 मामले सामने आए हैं। प्रभावित इलाकों से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में आधिकारिक रूप से पुष्टि हो गई है कि पानी पीने लायक नहीं था। इस संकट को देखते हुए नगर निगम ने 63 निगरानी टीमें तैनात की हैं, जिन्होंने अब तक 10,000 घरों का सर्वे किया है और लगभग 38,000 लोगों से संपर्क साधा है। अधिकारियों का कहना है कि वे हर संदिग्ध मामले की खून जांच कर रहे हैं।

अमित शाह की सीधी नजर: जिला कलेक्टर के साथ तीन हाई-लेवल ब्रीफिंग

गांधीनगर गृह मंत्री अमित शाह का संसदीय क्षेत्र है, इसलिए इस त्रासदी पर केंद्र सरकार का भी सीधा ध्यान है। खबरों के मुताबिक, अमित शाह ने जिला कलेक्टर मेहुल दवे के साथ फोन पर तीन बार लंबी चर्चा की और स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने निर्देश दिया है कि सभी 104 मरीजों को, जिनमें कई पीडियाट्रिक वार्ड में बच्चे हैं, तुरंत और बेहतरीन इलाज मिलना चाहिए। गृह मंत्री ने शाम को एक और समीक्षा बैठक करने की बात कही है। प्रशासन पर दबाव बढ़ता जा रहा है क्योंकि गांधीनगर नगर निगम फेल होने की खबरें अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई हैं।

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बचाव के उपाय: उबला हुआ पानी और क्लोरीन की गोलियों का वितरण

बीमारी को और फैलने से रोकने के लिए गांधीनगर नगर निगम अब घर-घर जाकर क्लोरीन की गोलियां बांट रहा है। निवासियों को सख्त सलाह दी गई है कि वे पानी को उबालकर ही पिएं और केवल घर का बना खाना ही खाएं। प्रभावित सेक्टरों में पानी की टंकियों की सफाई और चैंबरों की सफाई का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है। टैंकरों के माध्यम से वैकल्पिक पेयजल की व्यवस्था की गई है। स्वास्थ्य विभाग की रैपिड रिस्पॉन्स टीम, जिसमें माइक्रोबायोलॉजिस्ट भी शामिल हैं, लगातार संक्रमण के स्रोत की जांच कर रही है ताकि सुपर-क्लोरीनेशन के जरिए अगले एक-दो दिन में आउटब्रेक को पूरी तरह कंट्रोल किया जा सके।

जवाबदेही और कार्रवाई: इंदौर से गांधीनगर तक प्रशासनिक विफलता

इस पूरी त्रासदी ने बुनियादी ढांचे के विकास के दावों की पोल खोल दी है। इंदौर में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जहाँ जिम्मेदार दो अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की घोषणा की है, वहीं गांधीनगर में भी जनता जवाबदेही की मांग कर रही है। सेक्टर 24 से सबसे ज्यादा मामले सामने आने के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है। यह दुखद है कि आधुनिक शहरों की श्रेणी में आने वाले इन केंद्रों में लोग सीवेज मिश्रित पानी पीने को मजबूर हैं। अंततः गांधीनगर नगर निगम फेल होने की यह घटना एक सबक है कि विकास के प्रोजेक्ट्स में इंजीनियरिंग की छोटी सी चूक कितनी बड़ी मानवीय त्रासदी का कारण बन सकती है। प्रशासन अब दोषियों की पहचान करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जांच की बात कह रहा है।

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