जीएसटी 2.0: क्या मोदी सरकार का यह सुधार सिर्फ एक चुनावी चाल है?
जीएसटी 2.0 के ये सुधार कई महत्वपूर्ण उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किए गए हैं, जिनका लक्ष्य भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देना है। सबसे पहले, इसका मुख्य उद्देश्य कर प्रणाली को सरल बनाना है। मौजूदा जटिल बहु-स्लैब प्रणाली (5%, 12%, 18%, 28%) को 5% और 18% की दो व्यापक दरों में बदलकर, सरकार ने करदाताओं के लिए वर्गीकरण से जुड़ी उलझनों को कम करने और अनुपालन को आसान बनाने का प्रयास किया है। इसके अलावा, इसका एक बड़ा मकसद उपभोक्ता मांग को बढ़ावा देना है।
दैनिक उपयोग की वस्तुओं और एयर कंडीशनर जैसी वस्तुओं पर कर की दरों को कम करके, सरकार का लक्ष्य इन उत्पादों को और भी अधिक किफायती बनाना है। यह सीधे तौर पर उपभोक्ताओं की खर्च करने की शक्ति को बढ़ाएगा, जिससे मांग में तेजी आएगी और कुल मिलाकर आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा मिलेगा। ये सुधार उन क्षेत्रों में उलटे शुल्क ढांचे को भी ठीक करते हैं जहाँ कच्चे माल पर कर तैयार माल की तुलना में अधिक होता था।
सकारात्मक पहलू: सरलीकरण और उपभोग में वृद्धि
जीएसटी 2.0 के सकारात्मक पहलू कई हैं। कर प्रणाली का सरलीकरण निस्संदेह सबसे बड़ा लाभ है। दो-स्लैब संरचना न केवल कर प्रणाली को अधिक कुशल बनाती है, बल्कि यह कर अधिकारियों और व्यवसायों दोनों के लिए विवेकाधीन शक्तियों और जटिलता को भी कम करती है। इसके साथ ही, दैनिक और सफेद वस्तुओं पर दरों में कटौती से उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ कम होता है, जिससे वे अधिक खर्च कर पाते हैं। यह उपभोग को सीधे तौर पर बढ़ावा देता है और अर्थव्यवस्था में एक सकारात्मक माहौल बनाता है। सीमेंट जैसी प्रमुख निर्माण सामग्री पर कर दर को 28% से घटाकर 18% करने से मूल्य स्थिरता आती है, जो अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों पर व्यापक सकारात्मक प्रभाव डालती है। इसके अलावा, सैलून, जिम और योग केंद्रों जैसी सेवाओं पर जीएसटी दर को 18% से 5% तक कम करने से ये सेवाएं आम लोगों के लिए अधिक सुलभ हो गई हैं।
नकारात्मक पहलू: राजस्व और जटिलता की चुनौतियाँ
हालाँकि, जीएसटी 2.0 के कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक है। सबसे बड़ी चुनौती राजस्व पर पड़ने वाला प्रभाव है। यद्यपि सरकार को उम्मीद है कि बढ़ी हुई खपत से राजस्व की भरपाई होगी, ₹48,000 करोड़ की अनुमानित शुद्ध राजस्व हानि केंद्र और राज्यों दोनों के लिए राजकोषीय चुनौतियाँ खड़ी कर सकती है। इसके अलावा, जीएसटी परिषद ने क्षतिपूर्ति उपकर को हटा दिया है, जिससे कुछ राज्यों को राजस्व घाटे का सामना करना पड़ सकता है, खासकर उन राज्यों को जो अपने राजस्व की रक्षा के लिए उपकर जारी रखने की मांग कर रहे थे।
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि नई प्रणाली अभी भी “आवश्यकता से कहीं अधिक जटिल” है। आदर्श रूप से, जीएसटी की एक ही दर होनी चाहिए थी, लेकिन अभी भी 5%, 18% और 40% की विशेष दर जैसे कई स्लैब मौजूद हैं, जिससे पूरी तरह से एकरूपता नहीं आई है। सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि दरों में कटौती का लाभ वास्तव में उपभोक्ताओं तक पहुंचे, न कि केवल व्यवसायों तक।
क्या ये सुधार पर्याप्त हैं?
निष्कर्ष रूप में, जीएसटी 2.0 एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह अंतिम लक्ष्य नहीं है। इसे एक लंबी यात्रा के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए जिसका अंतिम लक्ष्य न्यूनतम छूटों के साथ एक समान दर स्थापित करना है। एक एकीकृत कर दर ही वर्गीकरण विवादों और जटिलताओं को पूरी तरह से समाप्त कर पाएगी। इसके अलावा, जीएसटी सुधारों को अकेले नहीं देखा जा सकता; उन्हें श्रम, भूमि, पूंजी बाजार और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में व्यापक संरचनात्मक सुधारों के साथ पूरक होना चाहिए। एक सरलीकृत कर प्रणाली तभी प्रभावी होगी जब एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद हो जो उद्यमिता और निवेश को बढ़ावा दे। यह एक अच्छी शुरुआत है, एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, लेकिन भारत को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए अभी भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
इन सुधारों को राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इन सुधारों की घोषणा करना, जीएसटी परिषद की बैठक से पहले ही, यह दर्शाता है कि यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम था। यह एक जन-समर्थक उपाय के रूप में देखा जा रहा है जो आम जनता के लिए राहत लाएगा। कर दरों में कटौती से बढ़ती महंगाई के बीच उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, जिससे सरकार की लोकप्रियता बढ़ सकती है। हालांकि, क्षतिपूर्ति उपकर को हटाने का निर्णय विपक्ष शासित राज्यों के लिए एक बड़ा मुद्दा बन सकता है, क्योंकि उन्हें अपने राजस्व की भरपाई के लिए नए तरीके खोजने होंगे। यह केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है।
भविष्य की राह: आगे क्या?
जीएसटी 2.0 के साथ, सरकार ने एक महत्वपूर्ण दिशा में कदम बढ़ाया है। हालांकि, यह सुनिश्चित करने के लिए कि इसका लाभ अधिकतम हो, और भी सुधारों की आवश्यकता होगी। सबसे पहले, मुनाफाखोरी-रोधी प्राधिकरण को पुनर्जीवित करना महत्वपूर्ण होगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कर कटौती का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचे। दूसरा, सरकार को एक एकीकृत जीएसटी दर की ओर बढ़ने के लिए रोडमैप तैयार करना चाहिए, जैसा कि पाठ में सुझाया गया है। इसके लिए, 16वें वित्त आयोग को राज्यों के राजस्व घाटे को संबोधित करने के लिए एक तंत्र विकसित करना होगा। अंत में, जीएसटी सुधारों को व्यापक आर्थिक सुधारों, जैसे कि श्रम और भूमि सुधारों के साथ जोड़ा जाना चाहिए ताकि भारत की अर्थव्यवस्था को वास्तव में नई गति मिल सके। केवल तभी भारत एक वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी पूरी क्षमता का एहसास कर पाएगा।
यह एक अच्छी शुरुआत है, एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, लेकिन भारत को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए अभी और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।



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