Loading Now

“भारत जीडीपी ग्रोथ विवाद” भारत की 7.8% GDP ग्रोथ पर उठा विवाद:

भारत जीडीपी ग्रोथ विवाद

भारत जीडीपी ग्रोथ विवाद देश की अर्थव्यवस्था के मौजूदा स्वास्थ्य को लेकर राजनीतिक और आर्थिक हलकों में एक नई बहस छिड़ गई है। सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1 FY27) के लिए जारी किए गए 7.8 प्रतिशत रियल जीडीपी (Real GDP) विकास दर के आंकड़ों पर अर्थशास्त्रियों और प्रमुख विपक्षी दलों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

आलोचकों का दावा है कि ये आंकड़े ज़मीनी आर्थिक सच्चाइयों—जैसे महंगाई, बेरोजगारी और निजी खपत—से मेल नहीं खाते हैं और गणना पद्धति (Methodology) में किए गए बदलावों के कारण विकास दर अधिक दिखाई दे रही है।

वहीं, दूसरी ओर सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) का तर्क है कि देश के आर्थिक आंकड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों और पारदर्शी प्रक्रियाओं पर आधारित हैं।

नॉमिनल और रियल जीडीपी में विरोधाभास: गणितीय विसंगति पर सवाल

जीडीपी विश्लेषकों का ध्यान सबसे ज्यादा नॉमिनल जीडीपी (Nominal GDP) और रियल जीडीपी (Real GDP) के बीच के अंतर ने खींचा है।

आंकड़ों का गणित: Q1 FY27 में नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर 10.3 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि स्थिर कीमतों पर आधारित रियल जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत बताई गई है।

महंगाई (GDP Deflator) का आकलन: इसका अर्थ यह हुआ कि गणना में प्रयुक्त महंगाई दर (जीडीपी डिफ्लेटर) केवल 2.5 प्रतिशत मानी गई है।

विरोधाभास: आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि जब खुदरा बाज़ार में दैनिक उपभोग की वस्तुओं, ईंधन और खाद्य पदार्थों की कीमतें आम जनता पर भारी पड़ रही हैं, तब महंगाई दर का केवल 2.5% दर्ज होना ज़मीनी स्तर के अनुभवों के विपरीत है। आलोचकों के अनुसार, यदि महंगाई के आंकड़ों को कम आंका जाता है, तो रियल जीडीपी दर अपने आप बढ़ी हुई दिखने लगती है।

इसे भी पढ़े  :  “एयर इंडिया पायलट टेस्ट” में AAIB की रिपोर्ट पर सख्त कार्रवाई

गणना पद्धति (Methodology) और ‘डबल डीफ्लेशन’ पर उठे सवाल

आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकारों और नीति विश्लेषकों के बयानों का भी हवाला दिया जा रहा है।

2015 का संशोधन: आलोचकों का कहना है कि वर्ष 2015 में जीडीपी गणना की पद्धति में जो बदलाव किए गए थे, उनके बाद से वृद्धि दरों के अनुमानों में 2 से 2.7 प्रतिशत अंकों तक का अंतर (Overestimation) देखने को मिला है।

डबल डीफ्लेशन तकनीक: सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ 9.2% दिखाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ‘डबल डीफ्लेशन’ जैसी तकनीकों पर भी सवाल उठे हैं। विपक्ष का आरोप है कि बार-बार बेस ईयर और मेथडोलॉजी बदलकर विकास दर को बढ़ाकर दिखाया जा रहा है।

    कैपेक्स बनाम निजी खपत: विकास का आधार क्या है?

    आर्थिक आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण यह भी दिखाता है कि 7.8 प्रतिशत की दर्ज विकास दर में सरकारी खर्च (Capital Expenditure) का योगदान सर्वाधिक है।

    सरकारी निवेश का दबदबा: सकल स्थायी पूंजी निर्माण (GFCF) में 11.9% की वृद्धि मुख्य रूप से सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) जैसे बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की सरकारी कंपनियों द्वारा किए गए निवेश से आई है।

    निजी क्षेत्र और खपत कमजोर: निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र का नया निवेश और आम उपभोक्ताओं द्वारा की जाने वाली खपत (Private Final Consumption Expenditure) अभी भी सुस्त बनी हुई है।

    असंगठित क्षेत्र और छोटी इकाइयां: सर्विस सेक्टर की 10% ग्रोथ में आईटी और वित्तीय सेवाओं का दबदबा है, जबकि छोटे दुकानदार, एमएसएमई (MSME) और पर्यटन क्षेत्र अब भी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

    इसे भी पढ़े  :  “नीम करौली बाबा” ‘हनुमान अंश’के बीच चर्चा में आए नीम करौली बाबा

    एनएसओ (NSO) के आंकड़ों में ‘डिस्क्रेपेंसी’ और अंतरराष्ट्रीय अनुमान

    जीडीपी कैलकुलेशन में ‘डिस्क्रेपेंसी’ (आंकड़ों का अंतर) का लगातार बढ़ना भी चिंता का विषय बना हुआ है। जब नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) के अलग-अलग तरीकों से निकाले गए जीडीपी आंकड़ों में अंतर 1.11 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है, तो सांख्यिकीय सटीकता पर बहस होना स्वाभाविक है।

    इसके अलावा, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और कई वैश्विक रेटिंग एजेंसियां भारत की चालू वित्त वर्ष की वास्तविक विकास दर 6.1% से 6.6% के बीच रहने का अनुमान लगा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुमानों और आधिकारिक दावों के बीच का यह फासला आर्थिक विश्लेषकों को अधिक सतर्क रुख अपनाने पर मजबूर करता है।

    आम जनता और वास्तविक अर्थव्यवस्था की चुनौतियां

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी देश की वास्तविक आर्थिक प्रगति का आकलन केवल शीर्ष आंकड़ों से नहीं, बल्कि आम नागरिकों के जीवन स्तर से होता है।

    बेरोजगारी और महंगाई: यदि जीडीपी 7.8% की दर से बढ़ रही है, लेकिन असंगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर सीमित हैं और बेरोजगारी दर में अपेक्षित गिरावट नहीं आ रही है, तो इस वृद्धि को ‘जॉबलेस ग्रोथ’ का नाम दिया जाने लगता है।

    समान विकास की आवश्यकता: सरकार का मानना है कि बुनियादी ढांचे में किया जा रहा निवेश दीर्घकालिक विकास की नीव रख रहा है। हालांकि, आलोचकों का आग्रह है कि नीतियों का केंद्र बिंदु आंकड़ों के जश्न से हटकर आम आदमी की क्रय शक्ति (Purchasing Power) बढ़ाने पर होना चाहिए।

    इसे भी पढ़े  :  “पाकिस्तान टेस्ट क्रिकेट संकट” ‘क्या भारत की हार से क्रिकेट खत्म हो गया?

    भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर जारी यह विवाद यह दर्शाता है कि केवल जीडीपी वृद्धि दर का आंकड़ा ही किसी अर्थव्यवस्था की संपूर्ण तस्वीर नहीं प्रस्तुत कर सकता। 7.8% की विकास दर निस्संदेह कागजों पर एक मजबूत संख्या है, लेकिन जब तक नॉमिनल और रियल जीडीपी के अंतर, गणना पद्धति के संशय, और असंगठित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को पारदर्शी तरीके से संबोधित नहीं किया जाता, तब तक आंकड़ों की प्रामाणिकता पर बहस जारी रहेगी।

    रिजर्व बैंक की रिपोर्ट, विपक्ष के आरोपों और अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण से समझें भारत जीडीपी ग्रोथ विवाद के मुख्य बिंदु आर्थिक आंकड़ों, बेरोजगारी की दर और नीति निर्माताओं के दावों के बीच गहराया भारत जीडीपी ग्रोथ विवाद

    इसे भी पढ़े  :  “कॉकरोच जनता पार्टी बंटवारा” मनीष ब्रह्मभट्ट ने CJP-D लॉन्च की।

    Spread the love

    Post Comment

    You May Have Missed