“NCLT सुभाष चंद्रा सेटलमेंट ” 22,000 करोड़ रुपये के गारंटी पर विवाद
NCLT सुभाष चंद्रा सेटलमेंट इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत एसेल ग्रुप (Essel Group) के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल गारंटी मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का नवीनतम निर्णय देश के कॉरपोरेट और कानूनी हलकों में एक बड़ी बहस का कारण बन गया है।
22,006.57 करोड़ रुपये से अधिक के कुल दावों के मुकाबले केवल 6.25 करोड़ रुपये के रीपेमेंट प्लान को 2-1 के बहुमत से मिली मंज़ूरी पर वित्तीय संस्थानों, विपक्षी राजनीतिक दलों और असंतुष्ट कर्जदाताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
जहां एक तरफ इस फ़ैसले को IBC के प्रावधानों के तहत एक वैध पुनर्गठन (Restructuring) प्रक्रिया माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसे बैंकों और सरकारी वित्तीय संस्थानों के हितों की अनदेखी करने वाला एक विवादास्पद कदम बताया जा रहा है।
क्या है 22,000 करोड़ रुपये का पूरा मामला?
सुभाष चंद्रा के कार्यालय और कानूनी सलाहकारों द्वारा स्पष्ट किया गया है कि 22,006.57 करोड़ रुपये का आंकड़ा उनका व्यक्तिगत सीधा ऋण नहीं है।
पर्सनल गारंटी का मामला: यह राशि एसेल ग्रुप की विभिन्न कंपनियों द्वारा लिए गए ऋणों के लिए सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई व्यक्तिगत गारंटियों (Personal Guarantees) से संबंधित कुल दावों का योग है।
व्यक्तिगत संपत्ति बनाम दावे: 2016 में देश के प्रमुख उद्योगपतियों में गिने जाने वाले सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति में भारी गिरावट दर्ज की गई है। मौजूदा विवरण के अनुसार, उनकी कुल व्यक्तिगत संपत्ति 31.79 करोड़ रुपये आंकी गई है, जिसमें से बड़ा हिस्सा बंधक रखी गई आवासीय संपत्ति से जुड़ा है।
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IBC की धारा 115 और वोटिंग शेयर का गणित
इस पूरे विवाद के केंद्र में IBC की धारा 115 है, जो यह प्रावधान करती है कि यदि 80 प्रतिशत या उससे अधिक वोटिंग शेयर वाले कर्जदाता (Creditors) किसी रीपेमेंट प्लान को अपनी मंज़ूरी दे देते हैं, तो वह प्लान सभी शेष कर्जदाताओं पर बाध्यकारी हो जाता है।
सहमति का आंकड़ा: NCLT के समक्ष पेश किए गए प्लान को 80.814% वोटिंग शेयर वाले लेनदारों का समर्थन प्राप्त हुआ।
संबंधित इकाइयों पर सवाल: असंतुष्ट लेनदारों का आरोप है कि इस 80% समर्थन में सुभाष चंद्रा के परिवार और प्रमोटर ग्रुप से जुड़ी पांच संस्थाओं का लगभग 61.78% वोटिंग शेयर शामिल था। वीणा इन्वेस्टमेंट्स (4.99%), डायरेक्ट मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन वेंचर्स (1.15%), वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स (28.49%), लेमोनेड कैपिटल एडवाइजर्स (16.85%), और कॉर्पकॉल कैपिटल एडवाइजर्स (10.30%) जैसी संस्थाओं के वोटों पर विरोध दर्ज कराया गया है।
असंतोष और विरोध: 18.42% वोटिंग शेयर वाले संस्थागत लेनदारों ने इस प्लान के खिलाफ मतदान किया, जबकि 4.10% ने मतदान प्रक्रिया से दूरी बनाई।
LIC हाउसिंग फ़ाइनेंस और प्रमुख बैंकों का कड़ा विरोध
इस फ़ैसले से सबसे ज्यादा असर संस्थागत और सरकारी वित्तीय संस्थानों पर पड़ा है।
LIC हाउसिंग फ़ाइनेंस का पक्ष: एलआईसी हाउसिंग फ़ाइनेंस का 1,322.39 करोड़ रुपये का दावा था, जिसके बदले इस सेटलमेंट प्लान के तहत महज 38.09 लाख रुपये दिए जाने का प्रावधान है। संस्थान ने ट्रिब्यूनल के समक्ष इस प्लान को पूरी तरह से अव्यवहारिक और अनुचित बताया।
कमर्शियल विजडम की सीमाएं: NCLT ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि स्थापित कानूनी सिद्धांतों के तहत ट्रिब्यूनल कर्जदाताओं की ‘कमर्शियल विजडम’ (व्यावसायिक समझ) में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
बैंकों की स्थिति: HDFC बैंक (3.17%), एक्सिस बैंक (2.86%), केनरा बैंक (1.60%), आरबीएल बैंक और आईडीबीआई ट्रस्टीशिप जैसी संस्थाओं ने भी इस प्रक्रिया पर अपनी चिंताएं जताई हैं। HDFC बैंक ने संकेत दिया है कि वह इस निर्णय के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में जाने के कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है।
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फोरेंसिक ऑडिट और NCLT की खंडपीठ में मतभेद
मामले की सुनवाई के दौरान फोरेंसिक ऑडिट की अनिवार्यता को लेकर भी कानूनी बहस हुई।
फोरेंसिक ऑडिट की स्थिति: NCLT ने यह साफ किया कि IBC के मौजूदा ढांचे में रीपेमेंट प्लान पर विचार करने या उसे स्वीकृत करने से पहले फोरेंसिक ऑडिट कराना अनिवार्य कानूनी शर्त नहीं है।
बेंच का विभाजित निर्णय: NCLT की दो-सदस्यीय पीठ के बीच शुरुआती राय भिन्न थी। ज्यूडिशियल मेंबर अशोक कुमार भारद्वाज ने प्लान का समर्थन किया, जबकि टेक्निकल मेंबर रीना सिन्हा पुरी ने इसे खारिज कर दिया था। बाद में तीसरे मेंबर नीलेश शर्मा को मामले के संदर्भ में शामिल किया गया, जिन्होंने ज्यूडिशियल मेंबर के पक्ष में सहमति जताई और 2-1 के बहुमत से यह आदेश पारित हुआ।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और IBC के ढांचे पर उठते सवाल
इस निर्णय के सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तीखी रही हैं। विपक्षी दल कांग्रेस ने इस फ़ैसले को IBC के उद्देश्यों का उल्लंघन बताते हुए आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में बड़े कॉरपोरेट कर्जदारों को अनुचित राहत मिल रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि प्रमोटर ग्रुप से जुड़ी कंपनियों के माध्यम से वोटिंग शेयर जुटाने और व्यक्तिगत संपत्ति की घोषणा से जुड़े लूपहोल्स को दूर करने के लिए IBC में संशोधनों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
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सुभाष चंद्रा का यह मामला भारत के दिवालियापन कानून (IBC) की प्रभावशीलता और निष्पक्षता पर कई मूलभूत प्रश्न खड़े करता है। जहां एक ओर कानूनी प्रक्रिया के तहत 80% बहुमत के नियम का पालन किया गया है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक धन और बैंकों के भारी-भरकम दावों की रिकवरी में आई बड़ी गिरावट ने नियामकों और न्यायपालिका को समीक्षा के लिए प्रेरित किया है।
आने वाले समय में NCLAT और सुप्रीम कोर्ट का रुख इस मामले के अंतिम कानूनी स्वरूप को तय करेगा। ट्रिब्यूनल के नए आदेशों, बैंकों के बकाया भुगतान और वित्तीय विशेषज्ञों के बयानों से समझें NCLT सुभाष चंद्रा सेटलमेंट की पूरी हकीकत जी एंटरटेनमेंट, कर्जदाताओं की याचिकाओं और कानूनी लड़ाइयों के बीच गहराया NCLT सुभाष चंद्रा सेटलमेंट मामला
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