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नए लेबर कोड्स: 12 घंटे काम, मजदूरों के अधिकार पर हमला

12 घंटे काम

12 घंटे काम नए लेबर कोड्स को सरकारी प्रचार तंत्र भले ही ‘सुधार’ का नाम दे रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि ये चार कोड्स – वेजेज, इंडस्ट्रियल रिलेशन्स, सोशल सिक्योरिटी और ओशा – 29 पुराने मजदूर-हितैषी कानूनों को कुचलकर कॉरपोरेट राज की नींव रख रहे हैं।

21 नवंबर 2025 को अचानक लागू किए गए इन कोड्स को 10 बड़े ट्रेड यूनियन्स, जिनमें INTUC, AITUC, CITU, HMS, AIUTUC, TUCC, SEWA, AICCTU, LPF और UTUC शामिल हैं, ने ‘धोखा’ और ‘स्वतंत्रता के बाद मजदूरों के हार्ड-वॉन राइट्स का सबसे आक्रामक उल्लंघन’ करार दिया है।

सरकारी दावा है कि ये ‘सरलीकरण’ हैं, लेकिन ये तो बस नियोक्ताओं को लूट का खुला लाइसेंस दे रहे हैं, मजदूरों की आवाज दबाकर, उन्हें गुलामी की जंजीरों में जकड़कर। पिछले पांच वर्षों में 2020 से ही संसद में पारित होने के बावजूद, इन्हें लागू करने में देरी राज्य-स्तरीय विरोध के कारण हुई, लेकिन अब बिना यूनियन्स की आपत्तियों पर बहस के, ये चुपके से थोप दिए गए।

सोशल मीडिया X पर #LabourCodesProtest के 20K+ मेंशन्स में विपक्षी सांसदों के वीडियो वायरल हैं, जहां सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने संसद परिसर में धरना देकर इन्हें ‘कॉरपोरेट जंगल राज’ कहा।

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हड़ताल का अधिकार कुचला: कॉर्पोरेट दमन की तैयारी का मौका

इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड का सबसे काला अध्याय है स्ट्राइक का अधिकार कुचलना। पहले सरकारी क्षेत्रों में ही 14 दिन का नोटिस जरूरी था, लेकिन अब सभी सेक्टर्स में मजदूरों को हड़ताल से पहले 14 दिन का ‘सूचना-पत्र’ थमाना पड़ेगा। यह सरकारी साजिश है कि कॉरपोरेट्स को समय मिल जाए दमन की तैयारी करने का, मजदूरों की एकजुटता को तोड़ने का।

यूनियन्स चीख चीख़ कर कह रही हैं कि यह सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार को मार डालता है, और कंपनी-विशेष यूनियन्स को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय स्तर के संघर्षों को कुर्सी से उतार फेंकता है, जो ILO के मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

3 दिसंबर 2025 को संसद में INDIA ब्लॉक के सांसदों ने ‘लेबर कोड वापस लो’ के नारे लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया, जहां DMK सांसद कनिमोझी ने कहा कि ये कोड्स सामूहिक सौदेबाजी को खत्म कर कॉरपोरेट शोषण का द्वार खोलते हैं।

CITU के महासचिव तपन सेन ने इसे ‘मजदूरों की आवाज को कुचलने की साजिश’ बताया, जबकि आंकड़े दिखाते हैं कि 2020 से अब तक 5+ राष्ट्रीय हड़तालें इसी मुद्दे पर हो चुकी हैं।

छंटनी का खेल: 300 मजदूरों तक सरकारी मंजूरी की ज़रूरत नहीं

फायरिंग को आसान बनाने का खेल तो और भी घिनौना है। पुराने कानून में 100 से ज्यादा मजदूरों वाली फैक्ट्री में छंटनी के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी थी, लेकिन अब ये सीमा 300 तक बढ़ा दी गई।

इसका सीधा मतलब है कि छोटे-मझोले कारखानों के मालिक अब बिना किसी रोक-टोक के मजदूरों को सड़क पर फेंक सकेंगे। इसके साथ ही, फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयी का जाल बिछाकर कॉन्ट्रैक्ट लेबर को वैध ठहराया जा रहा है, जहां स्थायी नौकरी का सपना चूर-चूर हो जाता है।

यूनियन्स साफ कह रही हैं: ये ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ नहीं, बल्कि मजदूरों की नौकरियां बेचने का बाजार है, जहां बेरोजगारी की आग में और घी डाला जा रहा है। 26 नवंबर 2025 को देशभर में हजारों मजदूरों और किसानों ने संयुक्त किसान मोर्चा के साथ मिलकर विरोध किया, जहां CPI(M) ने इसे ‘मजदूरों को पूंजीपतियों के हवाले करने का कदम’ कहा।

छोटे उद्यमों के संगठन एसोसिएशन ऑफ इंडियन एंटरप्रेन्योर्स ने भी चेतावनी दी कि ये बदलाव छोटे व्यवसायों की लागत 20-30% बढ़ा देंगे, लेकिन मजदूरों के लिए ये महज बेरोजगारी का नया चक्र है।

न्यूनतम मजदूरी सिर्फ नाम की: ₹18,000 की सीलिंग से भूखमरी का डर

वेजेज कोड में न्यूनतम मजदूरी का वादा तो चमकदार लगता है, लेकिन ये सिर्फ नाम का ही है। केंद्र सरकार फ्लोर रेट तय करने का दावा करती है, लेकिन हकीकत में राज्य-स्तरीय निर्धारण से ये आंकड़ा इतना कम रखा गया है – महज 18,000 रुपये मासिक – कि ये जीविका मजदूरी से कोसों दूर है।

यूनियन्स की मांग 26,000 रुपये की थी, लेकिन कॉरपोरेट लॉबी ने इसे ठुकरा दिया। ऊपर से, कॉन्ट्रैक्टर्स को एम्प्लॉयर मानकर प्रिंसिपल एम्प्लॉयर की जिम्मेदारी उतार दी गई। नतीजा यह हुआ कि मजदूरों की तनख्वाहें कटती रहेंगी, और सरकारी ‘समावेशी विकास’ का झूठा नारा चलेगा।

AITUC की महासचिव अमरजीत कौर ने BBC को बताया कि ये कोड्स 90% अनऑर्गनाइज्ड वर्कर्स को बाहर कर देते हैं, जबकि e-Shram पोर्टल पर 31 करोड़ मजदूर रजिस्टर्ड हैं, लेकिन बिना जीविका वेतन के ये फॉर्मलाइजेशन का ढोंग मात्र है।

IMF की 2021 स्टडी के मुताबिक, ऐसी कमजोर मजदूरी से GDP पर 1% का नकारात्मक असर पड़ सकता है, क्योंकि कम आय से उपभोग घटता है।

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सामाजिक सुरक्षा का ढोंग: 90% अनऑर्गनाइज्ड मजदूर बाहर

सोशल सिक्योरिटी कोड गिग वर्कर्स को ‘कवर’ करने का ढोंग रचता है, लेकिन असल में ये 90% अनऑर्गनाइज्ड मजदूरों को छोड़ देता है। PF, ESI जैसी स्कीम्स का विस्तार तो कहा जाता है, लेकिन कवरेज की थ्रेशोल्ड इतनी ऊंची रखी गई कि करोड़ों मजदूर बाहर रह जाएंगे।

फिक्स्ड-टर्म वर्कर्स को ग्रेच्युटी का लालच देकर स्थायी अधिकार छीन लिए जाते हैं, और महिलाओं-युवाओं के लिए ‘विस्तारित सुरक्षा’ का दावा खोखला है जब बेसिक कवरेज ही नगण्य हो। ये कोड्स तो बस कॉरपोरेट्स को सस्ता श्रम मुहैया कराने का हथियार हैं, मजदूरों की पेंशन-बीमा को दानव का दांत।

निति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, गिग इकोनॉमी में 23.5 मिलियन वर्कर्स को 2029 तक कवर करने का वादा है, लेकिन वास्तव में फंडिंग की कमी से ये सिर्फ 10% तक सीमित रह सकता है।

SEWA जैसी यूनियन्स ने कहा कि माइग्रेंट वर्कर्स के लिए अस्थायी आवास प्रावधान हटाना उन्हें असुरक्षा की ओर धकेल रहा है, जबकि 44 करोड़ अनऑर्गनाइज्ड वर्कर्स का 50% GDP योगदान करने के बावजूद उन्हें कोई वास्तविक सुरक्षा नहीं मिल रही।

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ओशा कोड में ‘प्रोडक्टिविटी’ के नाम पर 12 घंटे काम की गुलामी

ओशा कोड में सेफ्टी स्टैंडर्ड्स का झंडा लहराया जा रहा है, लेकिन ये भी मजदूर-विरोधी जाल है। वर्किंग ऑवर्स को 8 से 12 घंटे तक बढ़ाने की छूट देकर ‘प्रोडक्टिविटी’ का बहाना किया जा रहा है, जो थकान, दुर्घटनाओं और स्वास्थ्य हानि को न्योता देगा।

यूनियन्स चेतावनी दे रही हैं: यह 12 घंटे काम की छूट फैक्ट्री फ्लोर को मौत का अड्डा बना देगी, जहां मजदूरों की जानें सस्ती हो जाएंगी। महिलाओं को नाइट शिफ्ट्स की ‘स्वतंत्रता’ देकर असल में असुरक्षा का खतरा बढ़ाया जा रहा है, बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के।

कर्नाटक में 2020 के ऑर्डिनेंस से पहले ही 8-12 घंटे शिफ्ट्स ने दुर्घटनाओं में 15% वृद्धि की, जैसा कि यूनियन रिपोर्ट्स बताती हैं।

अब पूरे देश में यह 12 घंटे काम की व्यवस्था लागू होने से, खासकर टेक्सटाइल और ऑटो सेक्टर्स में, स्वास्थ्य जोखिम दोगुना हो सकता है, जबकि महिलाओं के लिए नाइट वर्क की ‘छूट’ बिना ट्रांसपोर्ट या सिक्योरिटी के महज शोषण का नया रूप है।

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देशव्यापी विरोध प्रदर्शन और संसद में विपक्ष का धरना

अंत में, ये कोड्स लोकतंत्र की हत्या हैं, संसद में बिना बहस, यूनियन्स की आपत्तियों को ठुकराकर, मोदी सरकार ने कॉरपोरेट क्रोनियों के साथ मिलकर मजदूरों पर ‘मास्टर-सर्वेंट’ राज थोप दिया है।

पिछले 5 सालों में 5 से ज्यादा हड़तालें हो चुकीं, और 27 नवंबर 2025 से नेशनवाइड प्रोटेस्ट्स की लहर उठी, जो सोशल मीडिया X पर #LabourCodesProtest के 15K+ मेंशन्स में दिख रही है।

लेकिन सरकार का जवाब? चुप्पी और दमन। 4 दिसंबर को दिल्ली में 200-300 मजदूरों का प्रदर्शन और संसद में विपक्ष का धरना इसका प्रमाण है। ये सुधार नहीं, बल्कि मजदूर आंदोलन का गला घोंटना है।

GDP ग्रोथ का सपना टूटेगा? अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर

अगर इन मजदूर-विरोधी कोड्स को वापस नहीं लिया गया, तो FY26 की 7.3% GDP ग्रोथ का सपना टूटेगा, और असली ‘रिस्क’ मजदूरों के खून से रंगेगी।

प्रोफेसर अरुण कुमार जैसे अर्थशास्त्री कहते हैं कि कम मजदूरी से मांग घटेगी, न कि निवेश बढ़ेगा, और बेरोजगारी 8% से ऊपर चढ़ सकती है।

इस तरह, श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन और शोषण केवल उनके जीवन पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक नींव पर भी गंभीर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।

कंपनियों का तर्क है कि 12 घंटे काम से उत्पादन बढ़ता है और समय की बचत होती है। वहीं श्रमिक संघ मांग कर रहे हैं कि 12 घंटे काम की नीति लागू करने से पहले सही वेतन और सुरक्षा दी जाए।

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