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सिविल विवादों में आपराधिक कार्यवाही दुरुपयोग: सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी!

सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। यह फैसला तुषार शाह बनाम कमल दयानी मामले में आया। सुप्रीम कोर्ट ने सिविल विवादों में आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर कड़ी चिंता जताई। अदालत ने इस खतरनाक प्रवृत्ति को रोकने के स्पष्ट निर्देश दिए। यह सुप्रीम कोर्ट का नजरिया हर नागरिक की सुरक्षा के लिए अहम है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मूल सार

तुषार शाह पर संपत्ति विवाद में एफआईआर दर्ज थी। निचली अदालतों ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। फिर सर्वोच्च न्यायालय ने 8 दिसंबर 2023 को उन्हें अंतरिम जमानत दी। सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश स्पष्ट और बाध्यकारी था। फिर भी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। मजिस्ट्रेट ने चार दिन की पुलिस हिरासत दी। यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सीधी अवहेलना थी।

शाह ने हिरासत में यातना की शिकायत की। उन्होंने पुलिस स्टेशन का सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित करने की मांग की। परमवीर सिंह सैनी मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह अनिवार्य निर्देश है। किंतु इस मांग को भी अनदेखा किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर उपेक्षा माना। अंततः शाह ने अवमानना याचिका दायर की।

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सुप्रीम कोर्ट की कानूनी व्याख्या

मजिस्ट्रेट ने गुजरात की एक स्थानीय प्रथा का हवाला दिया। यह प्रथा सुनीलभाई कोठारी (2014) के गुजरात हाईकोर्ट फैसले पर आधारित थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला साधारण जमानत का नहीं था। यह अनुच्छेद 136 के तहत दिया गया विशेष आदेश था। सुप्रीम कोर्ट की इस स्थिति ने कानूनी प्राथमिकताओं को रेखांकित किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेट के कार्य को पक्षपातपूर्ण बताया। पुलिस इंस्पेक्टर के आचरण को अवमानना की श्रेणी में रखा। सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को दोहराया। मजिस्ट्रेट ने हिरासत हिंसा की शिकायत गलत तरीके से खारिज की।

सीआरपीसी की धारा 200 और 202 का पालन नहीं हुआ। बाद में हाईकोर्ट ने इस खारिजी को पलट दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रियात्मक लापरवाही पर गहरी नाराजगी जताई।

7 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। पुलिस इंस्पेक्टर और मजिस्ट्रेट दोनों अवमानना के दोषी पाए गए। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी बिना शर्त माफी स्वीकार की। याचिका को नरमी के साथ निपटा दिया गया।

किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने भविष्य के लिए सख्त चेतावनी दी। अदालत ने ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को बिल्कुल अस्वीकार्य बताया।

सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी गुजरात की प्रथा के बारे में थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा की कड़ी निंदा की। अग्रिम जमानत के बाद भी पुलिस हिरासत की सामान्य अनुमति दी जाती थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे सुशीला अग्रवाल (2020) के फैसले के विपरीत बताया।

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानूनी अनुशासन की खींची गई स्पष्ट रेखा

सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी अनुशासन की स्पष्ट रेखा खींची। यह सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक सक्रियता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

यह फैसला सिर्फ कानूनी सुधार से कहीं आगे है। सर्वोच्च न्यायालय ने सिविल विवादों में आपराधिक कार्यवाही के दुरुपयोग को सीधे चुनौती दी। इस गंभीर समस्या के कई पहलू हैं। अक्सर देनदारी या संपत्ति विवादों को आपराधिक रंग दे दिया जाता है।

धारा 420 (ठगी) या 406 (अपव्यय) का गलत इस्तेमाल आम हो गया है। चेक बाउंस के मामले (धारा 138) भी अक्सर दबाव बनाने के लिए दर्ज कराए जाते हैं।

इस दुरुपयोग के गंभीर परिणाम होते हैं। निर्दोष लोगों को जेल भेजा जा सकता है। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल होती है। आर्थिक नुकसान तो होता ही है। मानसिक प्रताड़ना का असर लंबे समय तक रहता है।

पुलिस और न्यायपालिका का समय बर्बाद होता है। असली आपराधिक मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है। न्यायिक प्रणाली पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है।

इस प्रवृत्ति के पीछे कई कारण हैं। कानून की जटिलता आम लोगों को भ्रमित करती है। कुछ वकील गलत सलाह देकर मामले बढ़ाते हैं। पुलिस की जांच प्रक्रिया में कमियां रहती हैं। कुछ अधिकारी निजी स्वार्थ या दबाव में काम करते हैं।

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न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति

न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति भी एक कारण है। लोग त्वरित परिणाम पाने के लिए गलत रास्ते चुनते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार इस पर चिंता जताई है। प्रियंका श्रीवास्तव बनाम स्टेट ऑफ यूपी (2023) में चेतावनी दी गई। इंदर मोहन गोस्वामी बनाम स्टेट (2007) में दिशा-निर्देश दिए। ललिता कुमारी मामले में एफआईआर दर्ज करने के मानक तय किए।

फिर भी स्थिति में बड़ा सुधार नहीं हुआ। तुषार शाह मामले का फैसला एक सशक्त पुनर्स्मरण है। सुप्रीम कोर्ट की सजगता नागरिक अधिकारों की रक्षक है।

इस समस्या के समाधान के लिए कई कदम जरूरी हैं। पुलिस अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। उन्हें सिविल और आपराधिक कानून का अंतर समझाया जाए। मजिस्ट्रेटों को भी अधिक सतर्क और स्वतंत्र रहना होगा।

वकीलों को नैतिकता का पालन करना चाहिए। आम जनता को कानूनी जागरूकता बढ़ानी होगी। वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को प्रोत्साहन देना होगा। लोक अदालतों की भूमिका मजबूत करनी होगी।

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न्यायपालिका में सुधारात्मक कदम की जरूरत

न्यायपालिका को भी कुछ सुधारात्मक कदम उठाने होंगे। फिजूल के मुकदमों पर तुरंत कार्रवाई हो। दोषी पाए जाने पर कड़ी सजा का प्रावधान हो। पीड़ित पक्ष को त्वरित मुआवजा दिलाया जाए।

प्रक्रियात्मक देरी को कम करने के उपाय किए जाएं। विशेष न्यायालयों की संख्या बढ़ाई जाए। तकनीक का उपयोग करके कामकाज तेज किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में एक संतुलन दिखाया। कठोर न्याय के साथ करुणा का भाव भी था। दोषियों की माफी स्वीकार करके उन्हें सुधार का मौका दिया। किंतु भविष्य के लिए स्पष्ट संदेश दे दिया।

सर्वोच्च न्यायालय की यह दृष्टि प्रशंसनीय है। कानून सिर्फ दंड देने का साधन नहीं है। यह समाज को सही दिशा दिखाने का मार्गदर्शक भी है।

निष्कर्ष: फैसले की प्रासंगिकता

अंततः, यह फैसला हम सबके लिए प्रासंगिक है। किसी भी नागरिक के साथ ऐसी घटना हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने हमारी स्वतंत्रता की रक्षा का आश्वासन दिया है। यह न्यायपालिका की निगरानी का महत्व दर्शाता है।

प्रक्रियात्मक अनुशासन ही न्याय की आधारशिला है। सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता भारतीय लोकतंत्र की मजबूती है। आइए, हम इस ऐतिहासिक फैसले से प्रेरणा लें।

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