न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को झटका: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को झटका देते हुए उस रिट याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने आंतरिक जांच रिपोर्ट को चुनौती दी थी। इस रिपोर्ट में उन्हें कदाचार का दोषी ठहराया गया था। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने आज यह फैसला सुनाया।
- आंतरिक जांच को संवैधानिक और कानूनी रूप से वैध माना गया है।
- पीठ ने न्यायमूर्ति वर्मा के आचरण को विश्वास के योग्य नहीं माना।
- महाभियोग कार्यवाही की सिफारिश को असंवैधानिक नहीं बताया गया।
मुख्य बिंदु:
- सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की आंतरिक जांच को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
- पीठ ने आंतरिक जांच प्रक्रिया को कानूनी, संवैधानिक और निष्पक्ष बताते हुए उसका समर्थन किया।
- न्यायमूर्ति वर्मा के आवास से नकदी मिलने पर तीन न्यायाधीशों की समिति गठित की गई थी।
- समिति ने वर्मा को कदाचार का दोषी ठहराया और महाभियोग की सिफारिश की थी।
- कोर्ट ने माना कि जांच के दौरान सभी नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया गया था।
- सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल और मुकुल रोहतगी की संवैधानिक दलीलें खारिज कर दीं।
- वर्मा के खिलाफ महाभियोग का निर्णय अब संसद की प्रक्रिया और सांसदों की भूमिका पर निर्भर है।
मामले का संक्षिप्त विवरण और समिति की रिपोर्ट
यह पूरा मामला 14 मार्च को न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास में आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में नकदी मिलने से जुड़ा है। इस घटना के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने तीन न्यायाधीशों की एक आंतरिक जांच समिति का गठन किया था। समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा के कदाचार की पुष्टि करते हुए उन्हें हटाने की सिफारिश की थी, जिससे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को झटका लगा।
- समिति ने माना कि नकदी पर न्यायमूर्ति वर्मा का गुप्त नियंत्रण था।
- न्यायाधीशों के पैनल ने 55 गवाहों से पूछताछ की और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी देखे।
- समिति ने पाया कि न्यायमूर्ति वर्मा नकदी के बारे में कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं दे पाए।
याचिका खारिज करने का कारण
पीठ ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा ने शुरू में आंतरिक जांच में भाग लिया था और बाद में इसकी क्षमता पर सवाल उठाया। इस आचरण को देखते हुए, अदालत ने याचिका पर विचार नहीं किया। पीठ ने कहा कि प्रक्रिया का पूरी निष्ठा से पालन किया गया था, सिवाय वीडियो फुटेज अपलोड करने के।
- पीठ ने माना कि मुख्य न्यायाधीश और समिति ने प्रक्रिया का पालन किया।
- न्यायमूर्ति वर्मा ने सही समय पर जांच प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाए थे।
संवैधानिक मुद्दों पर अदालत का रुख
अदालत ने कई संवैधानिक मुद्दों पर भी अपना फैसला सुनाया, जिससे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को झटका लगा है। पीठ ने कहा कि आंतरिक प्रक्रिया संवैधानिक नहीं है, यह कहना गलत होगा। कोर्ट ने माना कि यह एक समानांतर और संविधानेतर तंत्र नहीं है।
- प्रक्रिया के अनुसार मुख्य न्यायाधीश द्वारा राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजना असंवैधानिक नहीं है।
- अनुच्छेद 124, 217 और 218 का उल्लंघन नहीं हुआ, न ही मौलिक अधिकारों का हनन।
कपिल सिब्बल और मुकुल रोहतगी की दलीलें
न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और मुकुल रोहतगी पेश हुए। सिब्बल ने दलील दी कि किसी न्यायाधीश को केवल अनुच्छेद 124(4) के तहत ही हटाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आंतरिक प्रक्रिया असंवैधानिक है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
- मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश महाभियोग शुरू करने का आधार नहीं हो सकती है।
- आंतरिक प्रक्रिया केवल एक प्रारंभिक जांच है, जो बाध्यकारी नहीं है।
मैथ्यूज जे. नेदुम्परा की याचिका भी खारिज
न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग वाली अधिवक्ता मैथ्यूज जे. नेदुम्परा की एक और रिट याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। इस याचिका में “न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग” और “झूठी प्रस्तुतियाँ” का आरोप लगाया गया था। इस फैसले ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को झटका और भी गहरा कर दिया है।
- अधिवक्ता नेदुम्परा की याचिका में प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई थी।
भविष्य की संभावनाएं और निष्कर्ष
पीठ ने न्यायमूर्ति वर्मा को महाभियोग कार्यवाही में अपनी दलीलें रखने का अधिकार सुरक्षित रखा है। राज्यसभा और लोकसभा के सांसदों ने पहले ही महाभियोग का नोटिस प्रसारित कर दिया है। इस फैसले के बाद अब इस सिफ़ारिश पर कार्रवाई करने की ज़िम्मेदारी संसद पर है।
- महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने पर न्यायमूर्ति वर्मा अपनी दलीलें पेश कर सकते हैं।



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