मोदी-अबी की गर्मजोशी: कॉर्पोरेट हित, भारत की दोहरी नैतिकता का खेल।
इथियोपिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का असाधारण स्वागत, जहाँ प्रधानमंत्री अबी अहमद ने खुद एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया और कार ड्राइव करके होटल तक छोड़ा, दिखने में तो असाधारण मोदी-अबी की गर्मजोशी का प्रदर्शन लगता है, लेकिन यह भारत की अफ्रीकी डिप्लोमेसी की उस चालाक रणनीति को उजागर करता है जो ग्लोबल साउथ की एकजुटता की बातें करके अपने कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता देती है।
यह व्यक्तिगत गर्मजोशी और अनप्लांड विजिट्स, जैसे जॉर्डन में क्राउन प्रिंस या इथियोपिया में अबी का कार ड्राइव करना महज फोटो-ऑप्स हैं जो संबंधों की गहराई दिखाते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपी है भारत की बड़ी भू-राजनीतिक और आर्थिक रणनीति। यह दौरा संसद के शीतकालीन सत्र को बीच में ही छोड़कर किया गया, जो मोदी की व्यक्तिगत ब्रांडिंग का शो प्रतीत होता है।
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मानवाधिकारों पर चुप्पी: नोबेल विजेता और भारत की दोहरी नैतिकता
यह दौरा भारत की दोहरी नैतिकता का जीता-जागता उदाहरण है। अबी अहमद, जो नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं लेकिन टाइग्रे संघर्ष में हजारों मौतों और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों से घिरे हैं, उन्हें मोदी का गले लगाना (जो मोदी-अबी की गर्मजोशी में स्पष्ट दिखा) दिखाता है कि भारत लोकतंत्र और मानवाधिकार की बातें तो करता है, लेकिन सत्ता के हितों के लिए उन्हें आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है।
इथियोपिया में अबी की सरकार द्वारा मीडिया पर पाबंदियाँ, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन जगजाहिर है। ऐसे में, अफ्रीकी संघ की संसद को संबोधित करते हुए भारत को सबसे बड़े लोकतंत्र की जननी बताना और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाना भारत की विश्वसनीयता को गिराता है।
ग्लोबल साउथ का नेतृत्व बनाम भू-राजनीतिक खेल
यह दौरा ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने की भारत की महत्वाकांक्षा का हिस्सा है, लेकिन असल में यह एक भू-राजनीतिक खेल है। रेड सी और हॉर्न ऑफ अफ्रीका में चीन के बढ़ते प्रभाव को काउंटर करने के लिए इथियोपिया जैसे देशों को रणनीतिक साझेदार बनाया जा रहा है।
अफ्रीका को साझेदार कहकर भारत वास्तव में अपने भू-राजनीतिक और आर्थिक हित साध रहा है। ब्रिक्स और अफ्रीकी संघ में भारत की भूमिका चमकाने का प्रयास भी इस दौरे का एक लक्ष्य है, लेकिन मानवाधिकारों को नजरअंदाज करके भारत अपनी नैतिक विश्वसनीयता खो रहा है।
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व्यापारिक सहयोग और कर्ज जाल डिप्लोमेसी
इस दौरे में व्यापारिक सहयोग की बातें होंगी, सौर ऊर्जा, कृषि, खनन और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत की $5 बिलियन से अधिक की निवेश योजनाएँ और लाइन ऑफ क्रेडिट पर जोर दिया जाएगा। लेकिन आलोचक इसे पुरानी औपनिवेशिक शैली की नीति मानते हैं जो अफ्रीकी देशों को कर्ज के जाल में फँसाकर भारत पर निर्भर बनाती है।
यह ठीक वैसे ही है जैसे चीन करता है, लेकिन भारत खुद को ‘विकल्प’ बताता है। इथियोपिया पहले से ही आर्थिक संकट और IMF की शर्तों के बीच है, ऐसे में भारत का यह ‘दानवीय सहयोग’ स्थानीय लोगों के लिए कितना फायदेमंद होगा, यह संदेहास्पद है।
स्थानीय समुदायों के वास्तविक लाभ के बिना, इथियोपिया की आंतरिक अस्थिरता और आर्थिक संकट में भारत का निवेश कितना टिकाऊ होगा, इस पर सवाल उठते हैं।
क्रोनी कैपिटलिज्म: अडानी पैटर्न की आशंका
अडानी का मुद्दा सबसे दिलचस्प और विवादित है। अभी तक इथियोपिया में अडानी ग्रुप का कोई बड़ा प्रोजेक्ट या निवेश नहीं है, लेकिन मोदी-अबी की गर्मजोशी के बीच मोदी की हर विदेश यात्रा में अडानी जैसे क्रोनी कैपिटलिस्ट्स के लाभ की आशंका बनी रहती है, क्योंकि पैटर्न स्पष्ट है: मोदी जहाँ जाते हैं, अडानी के डील वहाँ फॉलो करते हैं। ऐसे उदाहरणों की भरमार है:
केन्या: मोदी की डिप्लोमेसी के बाद अडानी को एयरपोर्ट और पावर ट्रांसमिशन के बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिले (जो बाद में विवादों और अमेरिकी आरोपों से कैंसल हुए)।
तंजानिया: मोदी की 2016 की विजिट के बाद अडानी पोर्ट्स ने दार एस सलाम पोर्ट का 30 साल का कंसेशन हासिल किया।
श्रीलंका: मोदी के दबाव से अडानी को विंड पावर प्रोजेक्ट मिला।
बांग्लादेश: पावर इंपोर्ट डील।
इजराइल: हाइफा पोर्ट का अधिग्रहण मोदी की 2017 की विजिट के बाद।
ऑस्ट्रेलिया: कोल माइन डील्स मोदी की यात्राओं से जुड़ी।
यह कोई संयोग नहीं, बल्कि क्रोनी कैपिटलिज्म का क्लासिक उदाहरण है जहाँ प्रधानमंत्री की डिप्लोमेसी कॉर्पोरेट एजेंडे को आगे बढ़ाती है।
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इथियोपिया में भविष्य के डील्स की जमीन?
अफ्रीका में केन्या और तंजानिया जैसे पड़ोसी देशों में यह पैटर्न दोहराया गया है, इसलिए इथियोपिया में भी भविष्य में ऐसे डील की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यह दौरा संभवतः किसी भविष्य के अडानी डील की जमीन तैयार कर रहा है।
क्रोनी कैपिटलिज्म का यह घालमेल विदेश यात्राओं को कॉर्पोरेट डील्स का माध्यम बनाता है, जो लंबे समय में भारत की विदेश नीति को अवसरवादी और अविश्वसनीय बना सकता है, और यह दोनों देशों के लिए नुकसानदेह साबित होगा। यह पैटर्न, जो केन्या, तंजानिया, श्रीलंका जैसे देशों में साफ दिखता है, इथियोपिया दौरे को भी संदेह के घेरे में लाता है।
कूटनीति की सीमाएँ: फोटो-ऑप्स तक सीमित?
मोदी की पर्सनल डिप्लोमेसी अक्सर फोटो-ऑप्स और गले मिलने तक सीमित रहती है। इस दौरे में मोदी-अबी की गर्मजोशी तो दिखी, लेकिन असल चुनौतियाँ अनसुलझी हैं। इथियोपिया को चीन के खिलाफ इस्तेमाल किया जाना एक हद तक तो ठीक है, लेकिन मानवाधिकारों को नजरअंदाज करके भारत अपनी नैतिक विश्वसनीयता खो रहा है।
यह व्यक्तिगत डिप्लोमेसी संबंधों की गहराई दिखा सकती है, लेकिन यह कॉर्पोरेट एजेंडे से जुड़ी हुई है, जहाँ विदेश यात्राएँ कॉर्पोरेट डील्स का माध्यम बनती हैं।
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अवसरवाद और विश्वसनीयता का संकट
कुल मिलाकर, यह दौरा भारत की विदेश नीति की अवसरवादी प्रकृति को उजागर करता है। ग्लोबल साउथ की एकजुटता और लोकतंत्र की बातें करना एक तरफ है, लेकिन दूसरी तरफ मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपी नेता को गले लगाना और क्रोनी कैपिटलिज्म के लिए जमीन तैयार करना, भारत की विश्वसनीयता को खतरे में डालता है।
प्रधानमंत्री का निजी ब्रांडिंग शो, कॉर्पोरेट एजेंडे के घालमेल के साथ, लंबे समय में भारत की विदेश नीति को अविश्वसनीय बनाता है, जो दोनों देशों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।



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