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“पंडित दीनदयाल उपाध्याय 110वीं जयंती” बचपन से ‘एकात्म मानववाद’ तक

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती

भारतीय राजनीति और विचार प्रक्रिया को नई दिशा देने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के अवसर पर उनके जीवन, संघर्ष और सिद्धांतों को याद किया जा रहा है।

बचपन में एक के बाद एक परिजनों को खोने के गहरे व्यक्तिगत दुखों से गुजरने के बावजूद, उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज और देश सेवा में समर्पित कर दिया। भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में शामिल दीनदयाल उपाध्याय का ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) का दर्शन आज भी भारतीय राजनीति और समाज नीति के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है।

त्रासदी और संघर्षों से भरा शुरुआती जीवन

25 सितंबर, 1916 को जन्मे दीनदयाल उपाध्याय का बचपन अत्यधिक संघर्षमय रहा:

परिजनों का विछोह: ढाई साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया। सात वर्ष के होते-होते मां भी टीबी की बीमारी के कारण चल बसीं। दस वर्ष की आयु तक उनके नाना का भी देहांत हो गया। इसके बाद उनके छोटे भाई शिवदयाल, दादी और मौसी का भी निधन हो गया।

खानाबदोश जीवन और उत्कृष्ट प्रतिभा: लगातार परिजनों को खोने के कारण 25 वर्ष की आयु तक वे 11 अलग-अलग स्थानों पर रहे। बायोग्राफर महेश चंद्र शर्मा के अनुसार, “वे सही मायने में एक खानाबदोश थे।” इन विषम परिस्थितियों के बावजूद वे सीकर और पिलानी में बोर्ड परीक्षाओं में प्रथम आए और उन्हें गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया।

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जब ठुकरा दी सरकारी नौकरी: राष्ट्र सेवा का चुना कठिन रास्ता

प्रांतीय सेवा परीक्षा (Provincial Services Exam) उत्तीर्ण करने के बावजूद उन्होंने सरकारी नौकरी स्वीकार नहीं की। उन्होंने विवाह न करने और आजीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का प्रचारक बनने का संकल्प लिया। जब परिवार ने उन पर व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के लिए दबाव बनाया, तो उन्होंने भावुक पत्र में लिखा— “संघ कार्यकर्ता के लिए समाज और देश पहले आते हैं; निजी कर्तव्य बाद में।”

1937 में संघ से जुड़े उपाध्याय ने 1946 में एक ही रात में प्रसिद्ध उपन्यास ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ और 1947 में ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ लिखा। उन्होंने ‘राष्ट्र धर्म’, ‘पांचजन्य’ और ‘स्वदेश’ जैसे पत्र-पत्रिकाओं का संपादन और संचालन भी किया।

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‘एकात्म मानववाद’: पूंजीवाद और समाजवाद का भारतीय विकल्प

1965 में भारतीय जनसंघ के महामंत्री के रूप में उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ का दर्शन पेश किया:

तीसरा मार्ग: उन्होंने पश्चिमी पूंजीवाद (Capitalism) और मार्क्सवादी समाजवाद (Marxist Socialism) दोनों को खारिज किया क्योंकि वे मनुष्य को केवल एक ‘आर्थिक इकाई’ मानते थे।

संतुलित विकास: उनका मानना था कि मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है। उनका दर्शन इन चारों के संतुलित विकास और नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ी आत्मनिर्भर व्यवस्था पर बल देता है।

    दिसंबर 1967 में जनसंघ के अध्यक्ष बनने के कुछ ही सप्ताह बाद, 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन के पास वे रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाए गए।

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    110वीं जयंती पर दिल्ली में विशेष ‘भजन क्लबिंग’ कार्यक्रम

    पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के उपलक्ष्य में नई दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय पार्क में एक विशेष भजन क्लबिंग कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शिरकत की, जहां वे भजनों की लय पर खंजरी बजाते दिखे।

    फिल्म ‘हनुमान अंश’ की टीम की प्रस्तुति: कार्यक्रम में फिल्म ‘हनुमान अंश’ के गायक साधु तिवारी ने प्रसिद्ध भक्ति गीत ‘जब जिद पर आ गई पार्वती’ प्रस्तुत किया, जबकि निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने हनुमान चालीसा का पाठ किया।

    फिल्म की सफलता: बाबा नीम करोली के विचारों पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन कर रही है और भारत में इसका नेट कलेक्शन ₹291.53 करोड़ तथा वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन ₹381.35 करोड़ के पार पहुंच गया है। उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे टैक्स-फ्री घोषित किया है।

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