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जिन्ना के नाती की फंडिंग, अनुराग ठाकुर का पाखंड और परिवारवाद पर तंज

परिवारवाद पर तंज

परिवारवाद पर तंज करने वाले केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की जुबान से निकला “जिन्ना का मुन्ना” का तंज राहुल गांधी पर नहीं, बल्कि खुद भाजपा के इतिहास पर एक करारा थप्पड़ है।

दिसंबर 2025 में लोकसभा में वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ पर बहस के दौरान अनुराग ठाकुर ने राहुल और प्रियंका गांधी को निशाना बनाते हुए कहा कि ब्रिटिश और जिन्ना को वंदे मातरम से एलर्जी थी, तो क्या “जिन्ना के मुन्ने” को भी है?

यह सवाल जितना राहुल गांधी की ओर फेंका गया, उससे कहीं ज़्यादा उसकी गूंज भाजपा के पुराने गलियारों में सुनाई देती है। जिस पार्टी के नेता परिवारवाद और राष्ट्रवाद का ढोल पीटते नहीं थकते, उसी की जड़ें मुहम्मद अली जिन्ना के नाती नुस्ली वाडिया की फंडिंग से जुड़ी हुई हैं, ये कितनी बड़ी विडंबना है!

यह केवल अफवाह नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य है, जिसका प्रमाण विश्वसनीय स्रोतों और कई किताबों में मिलता है।

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विनय सीतापति की ‘जुगलबंदी’: जब जिन्ना के नाती ने संभाली जनसंघ की कमान

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक विनय सीतापति की किताब जुगलबंदी: द बीजेपी बिफोर मोदी’ इस ऐतिहासिक विरोधाभास का विस्तार से वर्णन करती है।

1960 के दशक के अंत में जब जनसंघ आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहा था और बड़े उद्योगपति केवल कांग्रेस को फंडिंग करते थे, तब जिन्ना की बेटी दीना वाडिया के बेटे और वाडिया ग्रुप (बॉम्बे डाइंग) के मालिक नुस्ली वाडिया ने नानाजी देशमुख के जरिए पार्टी को बड़ी रकम दी थी।

नुस्ली के पिता नेविल वाडिया ने उन्हें राजनीति से दूर रहने की सलाह दी थी, लेकिन पिता की मौत के बाद नुस्ली ने जनसंघ से करीबी संबंध बनाए। नानाजी देशमुख उनके लिए एक ‘फादर फिगर’ थे। 1970 के दशक तक नुस्ली जनसंघ की बड़ी फंडिंग कर रहे थे, जिसमें विज्ञापनों से लेकर अखबारों और कार्यक्रमों तक का खर्च शामिल था।

जिन्ना के नाती की फंडिंग: जनसंघ की आर्थिक रीढ़

किताब के अर्क में साफ लिखा है कि नुस्ली ने नानाजी को प्रसिद्ध उद्योगपति जेआरडी टाटा से भी मिलवाया, जिससे पार्टी को और समर्थन मिला।

बॉम्बे डाइंग के विज्ञापन जनसंघ के मुखपत्र ‘मदरलैंड’ में छपते थे। कांग्रेस की सत्ता के उस दौर में किसी बड़े उद्योगपति का जनसंघ के अखबार को विज्ञापन देना एक तरह से बहादुरी का काम माना जाता था, और नुस्ली वाडिया ने यही किया।

उन्होंने जनसंघ को न केवल पैसा दिया, बल्कि पार्टी की आर्थिक रीढ़ बनकर उसे मजबूत किया। यह एक ऐसा तथ्य है जो आज के भाजपा नेताओं के राष्ट्रवाद के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

परिवारवाद का जीता-जागता उदाहरण बनाम ‘जिन्ना का मुन्ना’

दिलचस्प बात यह है कि अनुराग ठाकुर खुद परिवारवाद पर तंज करने वाले नेताओं के लिए एक आईना हैं। वह स्वयं प्रेम कुमार धूमल के सुपुत्र हैं और उनकी राजनीतिक यात्रा हिमाचल प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे अपने पिता की राजनीतिक विरासत का लाभ उठाने का जीता-जागता उदाहरण है।

इसी विरासत के दम पर वह सांसद बने और आज मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं। लेकिन जब बात राहुल गांधी पर आती है, तो वह ‘जिन्ना का मुन्ना’ बोलकर राष्ट्रवाद का ढोंग करते हैं।

यह विरोधाभास स्पष्ट है: एक तरफ खुद नेपोटिज्म के सहारे आगे बढ़ना और दूसरी तरफ दूसरों पर परिवारवाद पर तंज कसना। अरे भाई, जिन्ना का असली “मुन्ना” (नाती) तो तुम्हारी पार्टी की फंडिंग करता था!

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वाजपेयी और आडवाणी से नुस्ली वाडिया की करीबी

नुस्ली वाडिया की करीबी केवल नानाजी देशमुख तक सीमित नहीं थी। उनकी अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी से भी गहरी दोस्ती थी।

वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल (1998-2004) में नुस्ली को पीएमओ और वाजपेयी के घर में बेरोकटोक आने-जाने की छूट थी। वह वाजपेयी को स्नेह से “बाबजी” कहते थे, एक ऐसा संबोधन जो आमतौर पर केवल परिवार वाले ही इस्तेमाल करते थे। आडवाणी से भी उनकी दोस्ती ‘पहली नाम’ की थी, यानी बहुत गहरी।

आपातकाल (इमरजेंसी) के दौरान नानाजी देशमुख नुस्ली के मुंबई स्थित घर में छिपे थे। कई विश्वसनीय स्रोतों में लिखा है कि नुस्ली जनसंघ के मुख्य फंडर थे, खासकर तब जब पार्टी को कोई बड़ा उद्योगपति समर्थन नहीं देता था।

सत्ता से दूरी, रिश्ते ठंडे: आज गुमनाम क्यों नुस्ली?

हालांकि, 2004 के बाद जब भाजपा सत्ता से बाहर हुई, तो पार्टी और नुस्ली के रिश्ते ठंडे पड़ गए। आज मोदी युग में नुस्ली वाडिया का नाम तक सार्वजनिक मंचों पर नहीं लिया जाता, क्योंकि यह सच कड़वा है और भाजपा के वर्तमान ‘राष्ट्रवादी’ नैरेटिव से मेल नहीं खाता। यह दिखाता है कि सत्ता की राजनीति में सुविधा के अनुसार इतिहास को कैसे भुला दिया जाता है।

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नानाजी देशमुख का राष्ट्रवाद और ‘दोहरा मापदंड’

भाजपा नेता नानाजी देशमुख की तस्वीरें लगाकर राष्ट्रवाद बेचते हैं और उनके कार्यों का बखान करते हैं, लेकिन यही नानाजी देशमुख पार्टी के कोषाध्यक्ष के रूप में नुस्ली वाडिया से चंदा लेते थे—यानी जिन्ना के नाती से!

नानाजी ने नुस्ली की मदद से ही जनसंघ के लिए अखबार चलाए और कई कार्यक्रम आयोजित किए। किताब में स्पष्ट उदाहरण है कि जनसंघ के अखबारों में बॉम्बे डाइंग के विज्ञापन छपते थे।

जिन्ना के नाती के पैसे से पार्टी फली-फूली, वाजपेयी जैसे नेता प्रधानमंत्री बने, और आज अनुराग ठाकुर जैसे नेता कैबिनेट में बैठकर दूसरों को जिन्ना से जोड़ते हैं। परिवारवाद पर तंज करते हुए अपने इतिहास को भूल जाना, यही दोहरा मापदंड है।

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आईना दिखाने का वक्त: अनुराग ठाकुर, शर्म करो!

दिल्ली दंगों में “गोली मारो” का नारा देने वाले और संसद में “वंदे मातरम” को गलती से “बंदे भारत” बोलने वाले अनुराग ठाकुर को अब आईना दिखाने का वक्त है।

राहुल गांधी को “जिन्ना का मुन्ना” कहने से पहले उन्हें अपनी पार्टी के इतिहास को देखना चाहिए, जहां जिन्ना का नाती खुलेआम फंडिंग करता नजर आएगा। विनय सीतापति की किताब, विकिपीडिया, एनडीटीवी, और इंडियन एक्सप्रेस जैसे कई विश्वसनीय स्रोतों से ये तथ्य पुष्ट होते हैं।

अनुराग जी, वंदे मातरम से एलर्जी अगर किसी को है, तो वो आपकी पार्टी का वो इतिहास है जो जिन्ना के नाती के पैसे पर पला-बढ़ा। भाजपा कभी ये सच खुलकर नहीं बताएगी, क्योंकि उनका राष्ट्रवाद सिर्फ वोट बैंक के लिए है।

जिन्ना के नाती के पैसे से बनी पार्टी आज जिन्ना का नाम लेकर वोट मांगती है। परिवारवाद पर तंज करने वाले अनुराग ठाकुर का यह तंज उनकी अपनी पार्टी पर ही वापस लौट रहा है। यह विडंबना नहीं, बल्कि राजनीतिक ढोंग की मिसाल है!

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