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प्रज्वल रेवन्ना को कर्नाटक HC से झटका: रेप केस में उम्रकैद की सजा बरकरार

उम्रकैद की सजा बरकरार 

कर्नाटक हाई कोर्ट ने जनता दल (सेक्युलर) के पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना को एक बड़ा झटका देते हुए उनकी उम्रकैद की सजा को निलंबित करने और जमानत देने की याचिका खारिज कर दी है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि रेप केस में प्रज्वल रेवन्ना की उम्रकैद की सजा बरकरार रहेगी और उन्हें अभी जेल में ही रहना होगा। बुधवार को जस्टिस केएस मुदगल और जस्टिस वेंकटेश नाइक टी की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि अपराध की गंभीरता, उनके खिलाफ पेंडिंग कई अन्य मामले और गवाहों को प्रभावित करने के खतरे को देखते हुए, यह जमानत देने के लिए सही मामला नहीं है।

प्रज्वल रेवन्ना को इस साल अगस्त में उनके परिवार के गन्निकाडा फार्महाउस में काम करने वाली 48 साल की एक घरेलू सहायिका के साथ बार-बार रेप करने का दोषी पाया गया था और उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। कोर्ट ने कहा कि रेवन्ना को ट्रायल के दौरान भी बेल नहीं दी गई थी और पीड़ित ने उनके रसूखदार राजनीतिक और आर्थिक बैकग्राउंड के डर से रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी की थी।

गवाहों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता: अभियोजन पक्ष की दलील

स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर प्रोफेसर रविवर्मा कुमार ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कोर्ट को बताया कि रेवन्ना को बेल पर रिहा करने से पीड़ित और गवाहों की जान को खतरा हो सकता है। उन्होंने दलील दी कि मौजूदा मामले में पीड़िता, प्रज्वल के माता-पिता के खिलाफ चल रहे एक अन्य अपहरण के मामले में भी मुख्य गवाह है। कुमार ने बताया कि पीड़िता को पहले भी दो बार किडनैप किया जा चुका है, जो इस बात का संकेत है कि अगर रेवन्ना बाहर आते हैं, तो खतरा और बढ़ सकता है।

अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि रेवन्ना के खिलाफ रेप और यौन उत्पीड़न से जुड़े तीन और एफआईआर (FIR) दर्ज हैं, जिनमें शिकायतकर्ता आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से हैं। कुमार ने जोर देकर कहा कि रेवन्ना ने जांच में सहयोग नहीं किया और कथित तौर पर यौन कृत्यों को रिकॉर्ड करने के लिए इस्तेमाल किया गया अपना फोन भी सरेंडर नहीं किया। कोर्ट ने इस तर्क को माना कि रेवन्ना को कस्टडी से बाहर रखने से बाकी मामलों में सबूतों से समझौता हो सकता है।

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बचाव पक्ष का दावा: कमजोर सबूत और ‘मीडिया ट्रायल’

प्रज्वल रेवन्ना की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि सजा कमजोर सबूतों पर आधारित थी और यह मामला पूरी तरह से “मीडिया ट्रायल” से प्रभावित था। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और एफआईआर दर्ज करने में तीन से चार साल की देरी को आधार बनाया। लूथरा ने कहा कि जिस फार्महाउस में घटना होने की बात कही गई थी, वह अब मौजूद नहीं है और पुलिस द्वारा कपड़े बरामद करने का तरीका भी शक के दायरे में है।

लूथरा ने फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए और कहा कि डीएनए टेस्ट करने वाले अधिकारी की मौत हो चुकी है, जिससे रिपोर्ट की मंजूरी पर संदेह पैदा होता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ये मामले राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित हैं और प्रज्वल के जर्मनी जाने के बाद अचानक एक साथ चार केस दर्ज किए गए। उन्होंने कहा कि बचाव पक्ष को कम सजा के लिए बहस करने का पूरा मौका नहीं दिया गया।

कोर्ट का नजरिया: मेरिट पर सुनवाई अभी नहीं

हाई कोर्ट की बेंच ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि वे ज्यादातर अपील की मेरिट पर बात कर रहे हैं, जबकि सजा को निलंबित करने के चरण में हर सबूत की दोबारा गहराई से जांच नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में पहली नजर में कोई गैर-कानूनी बात नहीं पाई गई है और जब तक अपील पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक उम्रकैद की सजा बरकरार रहेगी।

जजों ने कहा कि एक बार जब किसी को दोषी ठहरा दिया जाता है, तो बेगुनाही का अनुमान (presumption of innocence) लागू नहीं होता। सजा के बाद जमानत का नियम बदल जाता है—अब “जेल नियम है, बेल नहीं”। बेंच ने स्पष्ट किया कि सबूतों में कथित कमियों, जैसे राजनीतिक दुश्मनी, एफएसएल रिपोर्ट, वीडियो सबूत आदि की जांच सिर्फ फाइनल सुनवाई के दौरान ही की जाएगी।

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12 जनवरी 2026 को होगी फाइनल सुनवाई

जमानत अर्जी खारिज करने के बाद, हाई कोर्ट ने प्रज्वल रेवन्ना की अपील पर फाइनल सुनवाई की तारीख 12 जनवरी, 2026 तय की है। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की इस बात को भी नोट किया कि सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार अपील पर तेजी से सुनवाई की जा सकती है। अगर रेवन्ना चाहें तो वे जल्दी सुनवाई की मांग कर सकते हैं।

यह मामला तब सुर्खियों में आया था जब 26 अप्रैल, 2024 को लोकसभा चुनाव से पहले हासन में प्रज्वल रेवन्ना से जुड़े कथित अश्लील वीडियो वाली पेन-ड्राइव सर्कुलेट की गई थी। इसके बाद रेवन्ना देश छोड़कर जर्मनी भाग गए थे, लेकिन 31 मई को बेंगलुरु लौटते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।

अपराध की गंभीरता और समाज पर असर

स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने कोर्ट को याद दिलाया कि यह अपराध कितना “घिनौना” था। ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान एक कमजोर और गरीब घरेलू कामगार के साथ बार-बार यौन अपराध किए गए थे। पीड़िता को महज 10,000 रुपये महीने और एक बोरी चावल पर काम पर रखा गया था।

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कोर्ट ने कहा कि रेवन्ना पर लगे आरोप बेहद गंभीर हैं और उनके खिलाफ कई मामले पेंडिंग हैं। ऐसे में उन्हें रिहा करना समाज के लिए खतरनाक हो सकता है। कोर्ट ने यह भी माना कि पीड़िता ने डर की वजह से शुरुआत में पुलिस से संपर्क नहीं किया था, जो आरोपी के रसूख को दर्शाता है। इसलिए, न्याय के हित में उनकी उम्रकैद की सजा बरकरार रखी गई है।

एसआईटी जांच और अन्य मामले

प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ कुल चार अलग-अलग केस दर्ज हैं, जिनमें रेप, यौन उत्पीड़न, स्टॉकिंग और आपराधिक धमकी के आरोप शामिल हैं। इन मामलों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने प्रज्वल को दोषी ठहराने के लिए वीडियो फुटेज, बालों के डीएनए विश्लेषण और पीड़िता के कपड़ों पर मिले बायोलॉजिकल निशानों सहित कई वैज्ञानिक सबूतों पर भरोसा किया था।

प्रज्वल ने सुप्रीम कोर्ट में भी अर्जी दी थी कि उनका केस किसी दूसरे जज को ट्रांसफर किया जाए, जिसमें उन्होंने सेशंस कोर्ट के जज पर पक्षपात का आरोप लगाया था। हालांकि, उनकी यह मांग भी खारिज कर दी गई थी। फिलहाल, प्रज्वल को अपनी बाकी जिंदगी जेल में ही बितानी होगी क्योंकि कोर्ट ने उनकी उम्रकैद की सजा बरकरार रखने का फैसला सुनाया है।

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