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भारतीय रुपया 90 के पार: डॉलर के मुकाबले गिरावट से मचा हड़कंप

भारतीय रुपया 90 के पार

बुधवार को भारतीय मुद्रा ने एक ऐसी ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की, जिसने देश के आर्थिक गलियारों में चिंता की लहर दौड़ दी है। भारतीय रुपया 90 के पार पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नीचे आया, और दिन के कारोबार में 90.30 के रिकॉर्ड निचले स्तर को छूने के बाद अंत में 90.21 (प्रोविजनल) पर बंद हुआ। यह गिरावट 2 अप्रैल को अमेरिका द्वारा जवाबी टैरिफ की घोषणा के बाद से अब तक 5.5% की कमी को दर्शाती है। फॉरेक्स मार्केट में मची इस उथल-पुथल ने स्टॉप-लॉस ऑर्डर्स की झड़ी लगा दी, जिससे वोलैटिलिटी और बढ़ गई। आरबीआई (RBI) के मामूली दखल के बावजूद, रुपये की यह कमजोरी रुकने का नाम नहीं ले रही है।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय करेंसी एक साल से भी कम समय में 85 से गिरकर 90 के स्तर पर आ गई है, जो अब तक की सबसे तेज गिरावट है। इस गिरावट का सीधा असर अब आम आदमी की जेब और देश की बड़ी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है।

गिरावट के पीछे के मुख्य कारण: एफपीआई और इंपोर्ट का दबाव

रुपये की इस ऐतिहासिक कमजोरी के पीछे कई प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का लगातार बाहर जाना है। इस साल की शुरुआत से अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से 17 बिलियन डॉलर से ज्यादा की निकासी की है। इसके अलावा, भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर छाई अनिश्चितता ने भी रुपये पर भारी दबाव डाला है।

फॉरेक्स ट्रेडर्स का कहना है कि भारत-अमेरिका व्यापार सौदे पर असमंजस और स्थानीय इकाई में गिरावट को रोकने के लिए आरबीआई की कोशिशों की कमी ने आग में घी का काम किया। साथ ही, कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने-चांदी की रिकॉर्ड इंपोर्ट मांग ने व्यापार घाटे को बढ़ा दिया है, जिससे डॉलर की मांग लगातार बनी हुई है। कोटक सिक्योरिटीज के अनिंद्य बनर्जी ने बताया कि 90 के स्तर के ऊपर स्टॉप-लॉस ट्रिगर होने से भी जबरदस्ती बिकवाली की लहर देखी गई।

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अर्थव्यवस्था और इंपोर्ट पर गहरा असर: महंगाई की मार

भारतीय रुपया 90 के पार जाने का सीधा मतलब है कि अब इंपोर्ट यानी आयात महंगा होगा। इसका असर फ्यूल, इलेक्ट्रॉनिक्स, हेल्थकेयर और रोजमर्रा की चीजों पर पड़ेगा। बैंकर्स का कहना है कि कमजोर रुपये से ‘इंपोर्टेड महंगाई’ का खतरा बढ़ जाता है। जैसे-जैसे आयात की लागत बढ़ेगी, फ्यूल और सब्जियों जैसे जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ सकती हैं।

इसके अलावा, विदेशों में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों, विदेश घूमने जाने वाले पर्यटकों और मेडिकल इलाज के लिए बाहर जाने वाले लोगों के लिए खर्च काफी बढ़ जाएगा। हालांकि, कमजोर रुपये का एक सकारात्मक पहलू यह है कि इससे एक्सपोर्ट से होने वाली कमाई बढ़ सकती है और विदेशों से आने वाला रेमिटेंस ज्यादा आकर्षक हो सकता है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे करंट अकाउंट डेफिसिट को कम करने और डॉलर के संदर्भ में शेयर वैल्यूएशन को सुधारने में मदद मिल सकती है।

विपक्ष का मोदी सरकार पर तीखा हमला: ‘खोई हुई इज्जत’ की तलाश

रुपये की इस ऐतिहासिक गिरावट पर विपक्ष ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने बयानों को याद दिलाते हुए उन पर तीखे कटाक्ष किए। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि पीएम मोदी किसी गहरे गड्ढे में अपनी “खोई हुई इज्जत” ढूंढ रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “2014 में उन्हें डॉलर के मुकाबले रुपया 58.86 पर मिला था, और वह इसे 90 के पार ले गए हैं। ऐसा लगता है कि वह यहां भी सेंचुरी बनाने के लिए बेताब हैं।”

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “अगर कुछ भारी है, तो वह गिरेगा। हमारे रुपये में ताकत और वजन है, इसीलिए यह गिर रहा है।” वहीं, सलमान खुर्शीद ने एएनआई से बात करते हुए कहा कि अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ के मुद्दे को सुलझाया जाना चाहिए ताकि रुपये में सुधार हो सके। विपक्ष का आरोप है कि यह सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता का प्रतीक है।

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बाजार की प्रतिक्रिया: सेंसेक्स और रुपये का टूटा रिश्ता

पारंपरिक रूप से शेयर बाजार और रुपये की चाल एक साथ चलती थी, लेकिन इस बार यह रिश्ता टूटता नजर आ रहा है। जहां भारतीय रुपया 90 के पार लुढ़क गया है, वहीं बीएसई सेंसेक्स (BSE Sensex) नई ऊंचाइयों को छू रहा है और 86,000 के पार चला गया है। हाल ही में आए 8.2% जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े भी रुपये के गिरते सेंटिमेंट को संभाल नहीं पाए।

मार्केट एनालिस्ट्स का कहना है कि निफ्टी भी मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण 26,000 के स्तर से नीचे गिर गया, क्योंकि निवेशक महंगाई के जोखिमों और विदेशी निवेशकों की कम भागीदारी को लेकर चिंतित हो गए थे। कोटक महिंद्रा एएमसी के नीलेश शाह ने तर्क दिया कि भारत की उत्पादकता और महंगाई के अंतर को देखते हुए रुपये का सालाना 2-3% कमजोर होना स्वाभाविक है और एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस के लिए जरूरी भी है।

एक्सपर्ट्स की राय: कौन से सेक्टर होंगे प्रभावित?

एसबीआई सिक्योरिटीज के सनी अग्रवाल के अनुसार, रुपये की गिरावट का असर अलग-अलग सेक्टर्स पर अलग-अलग होगा। एक्सपोर्ट पर निर्भर सेक्टर्स जैसे टेक्सटाइल, आईटी, फार्मा, इंजीनियरिंग और श्रिम्प (झींगा) उद्योग को गिरते रुपये से फायदा हो सकता है। वहीं, एफएमसीजी, प्लास्टिक पॉलीमर्स, ऑयल और गैस जैसे इंपोर्ट पर निर्भर सेक्टर्स पर लागत का दबाव बढ़ेगा।

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि केंद्रीय बैंक ने कोई एब्सोल्यूट एक्सचेंज रेट टारगेट नहीं किया है और बाजार की डायनामिक्स ही रुपये की चाल तय करेंगे। एनालिस्ट्स को उम्मीद है कि रुपया जल्द ही 89.50 और 91.20 के बीच ट्रेड करेगा।

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क्या 90 रुपये नया नॉर्मल है?

बाजार के जानकारों का मानना है कि भारतीय रुपया 90 के पार जाना अब कोई असामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह एक ‘रीसेट’ हो सकता है। करेंसी ट्रेडर्स का कहना है कि अगले कुछ महीनों तक घरेलू यूनिट पर दबाव बना रह सकता है। सुधार तभी संभव है जब नए कैपिटल इनफ्लो आएं, ग्लोबल रेट कट पर स्पष्टता मिले और एक्सपोर्ट में सुधार हो।

विश्लेषकों का कहना है कि जब भारत-अमेरिका ट्रेड डील पक्की हो जाएगी, तो रुपये की गिरावट रुक सकती है और स्थिति बदल भी सकती है। यह इसी महीने होने की संभावना है, लेकिन बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि डील के तहत भारत पर क्या टैरिफ शर्तें लागू होती हैं।

भविष्य का आउटलुक और RBI की भूमिका

फिलहाल RBI ने आक्रामक रूप से दखल नहीं दिया है, जिससे गिरावट और तेज हुई है। हालांकि, फॉरेक्स कंसल्टेंट के.एन. डे का कहना है कि 90.21 के स्तर पर आरबीआई के हल्के हस्तक्षेप से गिरावट कुछ समय के लिए रुकी है। लेकिन बाहरी दबाव, विदेशी फंड्स की निकासी और ग्लोबल मार्केट की अनिश्चितता को देखते हुए रुपये का रास्ता अभी भी कठिन नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और आरबीआई इस चुनौती से कैसे निपटते हैं और क्या रुपया अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकेगा।

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