Loading Now

राहुल की बर्लिन यात्रा: मीडिया का पक्षपात और लोकतंत्र पर वैश्विक मंथन

राहुल की बर्लिन यात्रा

राहुल की बर्लिन यात्रा जो Progressive Alliance की बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व करने और BMW प्लांट का दौरा करने के रूप में शुरू हुई, सत्ता पक्ष के लोग इस यात्रा को राजनीतिक विवाद के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। जहां गांधी ने जर्मन मैन्युफैक्चरिंग की सराहना की और भारतीय इंजीनियरिंग को वैश्विक मंच पर देखकर गर्व व्यक्त किया, जैसे TVS-BMW 450cc मोटरसाइकल का उदाहरण देकर, वहीं उन्होंने भारत की गिरती मैन्युफैक्चरिंग पर चिंता जताई।

लेकिन गोदी मीडिया ने इसे ‘पर्यटन’ का नाम देकर हल्का बनाने की कोशिश की, जबकि यह यात्रा 117 वैश्विक पार्टियों के साथ प्रेसिडियम सदस्य के रूप में लोकतंत्र पर चर्चा का हिस्सा थी। यह दोहरी नैतिकता की मिसाल है, जहां विपक्षी नेता की हर गतिविधि को ट्रोल किया जाता है, लेकिन सत्ता पक्ष की सैकड़ों विदेश यात्राएं विश्व गुरु और ‘राष्ट्रीय हित’ का तमगा पाती हैं।

इसे भी पढ़े :-रामलीला मैदान रैली: राहुल बोले- ‘वोट चोर’ गद्दी छोड़ो, मोदी-शाह पर सीधा वार

मैन्युफैक्चरिंग के सच पर मीडिया का प्रहार

BMW प्लांट का दौरा कोई सैर-सपाटा नहीं था; गांधी ने वहां उत्पादन प्रक्रिया का निरीक्षण किया, अधिकारियों से बात की और भारत की मैन्युफैक्चरिंग चुनौतियों पर तीखे कमेंट किए, जैसे ‘हमारी मैन्युफैक्चरिंग गिर रही है’। यह एक वैश्विक संवाद का हिस्सा था, जहां उन्होंने मजबूत अर्थव्यवस्थाओं को मैन्युफैक्चरिंग पर आधारित बताया।

लेकिन Republic और Zee जैसे चैनल्स ने इसे ‘भारत की बदनामी’ का लेबल चिपका दिया, मानो विपक्षी नेता का विदेश में बोलना ही अपराध हो। क्या यह मीडिया की स्वतंत्रता है या सत्ता की गुलामी?

जब मोदी जी की जापान, भूटान या SCO यात्राएं निवेश और कूटनीति लाती हैं, तो उन्हें ‘विजयी’ बताया जाता है, लेकिन राहुल की बर्लिन यात्रा को ‘पप्पू की मस्ती’ करार दिया जाता है। यह न सिर्फ पक्षपातपूर्ण है, बल्कि जनता को बौद्धिक रूप से बंधक बनाने की साजिश लगती है।

‘लीडर ऑफ टूरिज्म’ बनाम विश्व गुरु का नैरेटिव

गोदी मीडिया की ‘लीडर ऑफ टूरिज्म’ वाली लाइन BJP की रणनीति का हिस्सा है, जो सोशल मीडिया पर हजारों ट्रोल्स के जरिए पुश की जाती है। पोस्ट्स में राहुल को ‘नॉन-रेजिडेंट इंडियन पॉलिटिशियन’ कहा जा रहा है, जबकि मोदी की 12 सालों में सैकड़ों विदेश यात्राओं पर चुप्पी साध ली जाती है।

प्रियंका गांधी ने सही सवाल उठाया कि अगर PM आधा समय बाहर बिताते हैं, तो LoP की यात्रा पर क्यों हंगामा? लेकिन जवाब में BJP नेता जैसे अमित मालवीय और सत्य कुमार यादव इसे ‘भारत विरोधी’ बताते हैं, बिना सबूत के। यह दोहरी नैतिकता की हद है, जहां सत्ता पक्ष की ट्रिप्स ‘पारदर्शी और लाभकारी’ हैं, लेकिन विपक्ष की ‘गुप्त और हानिकारक’।

वैश्विक मंच पर भारत का सम्मान और गोदी चैनल्स की चुप्पी

Progressive Alliance में राहुल का प्रेसिडियम सदस्य बनना भारत को वैश्विक सम्मान दिलाता है, जहां 117 पार्टियां लोकतंत्र, न्याय और समानता पर चर्चा करती हैं। लेकिन गोदी चैनल्स इसे ‘विदेश में बदनामी’ कहकर खारिज करते हैं, मानो भारत की आलोचना ही देशद्रोह हो। क्या मोदी की विदेश यात्राओं में कभी आलोचना नहीं होती?

नहीं, क्योंकि मीडिया उन्हें ‘विश्व गुरु’ की छवि में पेश करता है। राहुल की बर्लिन यात्रा के दौरान X पर पोस्ट्स दिखाते हैं कि BJP के स्पोक्सपर्सन जैसे शहजाद पूनावाला और रिशी बग्री राहुल की ट्रिप्स को ‘सीक्रेटिव’ बताते हैं, जबकि मोदी की ‘ऑफिशियल’। यह हिपोक्रिसी जनता को ‘पप्पू’ नैरेटिव में बांधकर रखती है, ताकि सत्ता की असफलताएं छिप सकें।

इसे भी पढ़े :-चुनावी पारदर्शिता पर शाह बनाम राहुल टकराव: लोकसभा में बौखलाहट

विपक्षी एकता और मीडिया की फूट डालो नीति

समाजवादी पार्टी और AAP जैसे सहयोगी भी राहुल की यात्रा पर सवाल उठा रहे हैं, जैसे IP सिंह का कहना कि ‘अगर गंभीर नहीं तो LoP क्यों बने?’। लेकिन यह इंडिया गठबंधन की आंतरिक कलह को बढ़ावा देने का मीडिया का तरीका है। वहीं, बरखा दत्त जैसे पत्रकार इसे ‘वोट चोरी’ और थरूर से मतभेद से जोड़कर सनसनी बनाते हैं।

सच्चाई यह है कि राहुल की यात्रा संसद सेशन के बीच में जरूर है, लेकिन मोदी की SCO या G20 ट्रिप्स भी संसद के दौरान होती हैं। फर्क सिर्फ मीडिया की नजर में है, एक को ‘ड्यूटी’ कहो, दूसरे को ‘पलायन’। यह बौद्धिक बधियाकरण है, जहां जनता को सत्ता भक्त बनाकर रखा जाता है।

कड़वा सच: गिरती मैन्युफैक्चरिंग और भारतीय इंजीनियरिंग का गर्व

राहुल की भारतीय इंजीनियरिंग की तारीफ, जैसे BMW प्लांट में इंडियन फ्लैग देखकर गर्व, को मीडिया ने नजरअंदाज कर दिया। बजाय इसके, वे ‘भारत की गिरती मैन्युफैक्चरिंग’ वाले कमेंट को ‘बदनामी’ बता रहे हैं। क्या सच्चाई बोलना अपराध है? मोदी सरकार की 12 सालों में मैन्युफैक्चरिंग GDP में गिरावट आई है, लेकिन गोदी चैनल्स इसे छिपाते हैं।

सोशल मीडिया पर ट्रोल्स राहुल गांधी को ‘पार्ट-टाइम पॉलिटिशियन’ कहते हैं, जबकि मोदी की ट्रिप्स पर चुप। यह मीडिया का जनता को गुमराह करने का खेल है, जहां सत्ता की चाटुकारिता लोकतंत्र को कमजोर करती है।

इसे भी पढ़े :-विपक्षी नेताओं की अनदेखी: पुतिन के डिनर से राहुल-खड़गे गायब,थरूर शामिल

लोकतंत्र के वैश्विक प्रहरी के रूप में राहुल गांधी

राहुल की बर्लिन यात्रा जैसे वैश्विक संवाद का हिस्सा होना भारत के लिए गौरव की बात होनी चाहिए, जहाँ एक विपक्षी नेता दुनिया की 117 पार्टियों के साथ लोकतंत्र बचाने की चर्चा कर रहा है। जैसे राहुल की लोकतंत्र पर वैश्विक डिबेट को छिपाने जैसा मीडिया का यह नैरेटिव जनता को सच्चाई से दूर रखता है।

यहाँ तक कि आपकी जानकारी के अनुसार आज भी भारत में प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका में जो बाइडेन के कार्यकाल की तुलना में मीडिया का चश्मा केवल सत्ता के हित में ही झुका रहता है।

इसे भी पढ़े :-राहुल गांधी के H-बम: फर्जी वोट, एसआईआर और चुनाव आयोग साख संकट

अंत में: मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल

अंत में, यह मामला मीडिया की विश्वसनीयता का है। गोदी चैनल्स सत्ता के गुलाम बनकर जनता को ‘पप्पू’ नैरेटिव से बांधते हैं, लेकिन सच्चाई छिप नहीं सकती। राहुल की बर्लिन यात्रा वैश्विक संवाद का हिस्सा है, जो भारत को मजबूत बनाती है, जबकि मीडिया की दोहरी नैतिकता लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाती है।

अगर मीडिया निष्पक्ष होता, तो मोदी और राहुल गांधी दोनों की ट्रिप्स पर समान स्क्रूटिनी होती। लेकिन आज, यह सत्ता भक्ति का बौद्धिक बंधन है, जिसे तोड़ने की जरूरत है, वरना जनता हमेशा धोखे में रहेगी।

Spread the love

Post Comment

You May Have Missed