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राम मंदिर चंदा चोरी विवाद कांग्रेस ने पीएम मोदी से मांगी संसद में सफाई,

राम मंदिर चंदा चोरी

राम मंदिर चंदा चोरी विवाद संसद के आगामी मॉनसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले देश की राजनीति में एक नया और बेहद संवेदनशील वैचारिक टकराव खड़ा हो गया है। अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को मिले दान में कथित वित्तीय हेराफेरी, चंदा चोरी और प्रशासनिक अनियमितताओं के गंभीर आरोपों को लेकर कांग्रेस ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों लिया है।

मुख्य विपक्षी दल ने मांग की है कि चूंकि इस विशेष ट्रस्ट के गठन का ऐतिहासिक ऐलान खुद प्रधानमंत्री ने संसद के भीतर किया था, इसलिए इस पूरे घटनाक्रम और “आस्था के साथ हुए धोखे” पर उन्हें दोनों सदनों को भरोसे में लेते हुए अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए।

दूसरी ओर, यह संवेदनशील कानूनी मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की सीधी निगरानी में आ चुका है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) आगामी सोमवार, 20 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस पूरे मामले की अब तक की प्रगति पर अपनी अंतरिम स्टेटस रिपोर्ट सौंपने जा रहा है।

इस विधिक व राजनीतिक घटनाक्रम ने न केवल उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था बल्कि अयोध्या के धार्मिक हलकों में भी हलचल तेज कर दी है।

जयराम रमेश का तीखा प्रहार: “संसद को भरोसे में लें प्रधानमंत्री”

संसद सत्र की रणनीतियों और विपक्षी लामबंदी के बीच ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) के महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने पीटीआई (PTI) से बात करते हुए प्रधानमंत्री पर सीधा संसदीय हमला बोला।

रमेश ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए याद दिलाया कि 5 फरवरी 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद लोकसभा में खड़े होकर अत्यंत गौरव के साथ ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के गठन का आधिकारिक ऐलान किया था।

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जयराम रमेश ने आरोप लगाया:

“यह उन बेहद विरल और चुनिंदा मौकों में से एक था जब प्रधानमंत्री खुद लोकसभा में वक्तव्य देने आए थे। इस ट्रस्ट का निर्माण पूरी तरह प्रधानमंत्री की इच्छा और उनके ही द्वारा नियुक्त किए गए लोगों के माध्यम से हुआ था। इसके कार्य, नियम और तमाम गतिविधियां भी पीएमओ और सरकार के स्तर पर ही तय की गई थीं।

आज जब इसी ट्रस्ट के भीतर करोड़ों भारतीयों की गाढ़ी कमाई और उनकी पवित्र आस्था के साथ ‘चंदा चोरी और वित्तीय गबन’ का खेल सामने आया है, तो प्रधानमंत्री की रहस्यमयी खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है।”

कांग्रेस नेता ने सरकार को घेरते हुए कहा कि जिस संसद से इस ट्रस्ट की यात्रा शुरू हुई थी, उसी संसद के पटल पर प्रधानमंत्री को खड़े होकर यह बताना चाहिए कि आख़िर इस पवित्र कार्य में इतनी बड़ी वित्तीय सेंधमारी कैसे संभव हुई।

एक्शन में एसआईटी: गिरफ्तारियां, इस्तीफे और कैश बरामदगी

राम मंदिर को मिलने वाले वैश्विक और घरेलू दान में कथित गबन का यह मामला पिछले महीने तब सार्वजनिक हुआ जब वित्तीय विसंगतियों की शिकायतें खुद ट्रस्ट के भीतर और बाहर से उठने लगीं। इसके बाद ट्रस्ट के ही अनुरोध पर उत्तर प्रदेश सरकार ने बीती 13 जून को एक उच्च स्तरीय त्रिसदस्यीय एसआईटी (SIT) का गठन किया था। इस जांच दल में बेहद वरिष्ठ प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारियों को शामिल किया गया है:

विजय विश्वास पंत (डिवीजनल कमिश्नर, लखनऊ)किरण एस (इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस – IG)नील रतन (विशेष सचिव, वित्त विभाग)

    इस एसआईटी ने अपनी प्राथमिक जांच के बाद 23 जून को राज्य सरकार को नौ पन्नों की एक बेहद गोपनीय और शुरुआती रिपोर्ट सौंपी थी, जिसने पूरे प्रशासनिक अमले को हिलाकर रख दिया। इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने तत्काल प्रभाव से कई एफआईआर (FIR) दर्ज कीं, जिसके बाद अब तक आठ मुख्य आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है।

    यही नहीं, जांचकर्ताओं ने मंदिर के दान खाते से अवैध और फर्जी तरीके से निकाली गई भारी नकदी (Cash) को भी बरामद करने में सफलता पाई है।

    इस विवाद की सबसे बड़ी गाज ट्रस्ट के शीर्ष प्रबंधन पर गिरी। चौतरफा दबाव के बीच ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय और पूर्व ट्रस्टी अनिल मिश्रा को अपने पदों से आधिकारिक तौर पर इस्तीफा देना पड़ा।

    चंपत राय ने इस बीच एक पत्र जारी कर कहा है कि वे इस पूरे मामले पर अपनी चुप्पी केवल तभी तोड़ेंगे जब एसआईटी की अंतिम और पूर्ण रिपोर्ट सामने आ जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई कि जांच एजेंसी की बेहद गोपनीय रिपोर्ट मीडिया और जनता के बीच कैसे लीक हो गई।

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    सुप्रीम कोर्ट सख्त: सीबीआइ जांच और सीएजी ऑडिट की मांग

    यह पूरा मामला अब महज एक राज्य सरकार की जांच तक सीमित नहीं रहा है। 13 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस घोटाले की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच की मांग करने वाली विभिन्न जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने एसआईटी को तुरंत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया और साथ ही राम मंदिर ट्रस्ट को कारण बताओ नोटिस जारी किया।

    सर्वोच्च अदालत के समक्ष दायर याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने गंभीर विधिक सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा है कि बिना औपचारिक एफआईआर दर्ज हुए ही एसआईटी ने अपनी जांच कैसे शुरू कर दी थी? याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:

    इस पूरे घोटाले की जांच को राज्य पुलिस के दायरे से निकालकर सीबीआई (CBI) को सौंपा जाए।ट्रस्ट को मिले समस्त चंदों और खर्चों का व्यापक फॉरेंसिक ऑडिट (Forensic Audit) कराया जाए।भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के माध्यम से ट्रस्ट के संपूर्ण वित्तीय खातों का निष्पक्ष ऑडिट सुनिश्चित हो।

    सूत्रों के अनुसार, चूंकि एसआईटी को दी गई 30 दिनों की विस्तारित समय-सीमा समाप्त होने वाली है, इसलिए सोमवार (20 जुलाई) को कोर्ट में अंतरिम रिपोर्ट सौंपने के साथ ही जांच दल उत्तर प्रदेश सरकार और अदालत से जटिल वित्तीय लेन-देन और बैंक खातों के मिलान के लिए कुछ और हफ्तों का अतिरिक्त समय मांग सकता है।

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    22 जुलाई को अयोध्या में महाबैठक: सुधारात्मक उपायों पर होगी चर्चा

    एक तरफ जहाँ कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अपनी धूमिल हुई छवि को सुधारने और प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त करने के लिए आगामी 22 जुलाई 2026 को अयोध्या में एक आपातकालीन और अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है।

    इस बैठक में एसआईटी की अब तक की जांच के निष्कर्षों, दान की गिनती के पारंपरिक तरीकों में बदलाव, डिजिटल और पारदर्शी रसीद प्रणाली लागू करने तथा भविष्य में ऐसे वित्तीय झटकों से बचने के लिए कड़े ‘सुधारात्मक उपायों’ (Corrective Measures) पर अंतिम मुहर लगाई जा सकती है।

    संपादकीय दृष्टिकोण:

    अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण केवल एक कंक्रीट के ढांचे का खड़ा होना नहीं है, बल्कि यह देश और दुनिया के करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की अटूट श्रद्धा और उनके समर्पण का जीवंत प्रतीक है। ऐसे परम पवित्र कार्य के लिए आने वाले चंदे में एक भी रुपये की हेराफेरी या गबन न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के नैतिक विश्वास पर गहरा आघात है।

    विपक्ष द्वारा संसद में इस मुद्दे को उठाना स्वाभाविक है क्योंकि लोकतंत्र में पारदर्शिता ही सबसे बड़ा नियम है। सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में हस्तक्षेप करना राहतकारी है, क्योंकि किसी भी राजनीतिक प्रभाव से दूर हटकर केवल एक शीर्ष न्यायिक निगरानी ही इस ‘चंदा चोरी’ के वास्तविक चेहरों को बेनकाब कर सकती है।

    ट्रस्ट को चाहिए कि वह अपने बही-खातों को पूर्णतः सार्वजनिक और सीएजी ऑडिट के दायरे में लाए, ताकि इस पावन धाम की पवित्रता और शुचिता पर कोई आंच न आने पाए। राम मंदिर चंदा चोरी विवाद: ट्रस्ट के स्पष्टीकरण के बाद भी नहीं थम रहा राम मंदिर चंदा चोरी विवाद

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