“राष्ट्र पहले, पार्टी बाद में” शशि थरूर का अटल स्टैंड
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने एक बार फिर ‘राष्ट्र पहले, पार्टी बाद में’ के अपने अटल सिद्धांत को दृढ़ता से दोहराया है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद उनकी क्रॉस-पार्टी कूटनीति और राष्ट्रवादी रुख को लेकर कांग्रेस के भीतर मिल रही आलोचनाओं के बावजूद, तिरुवनंतपुरम के सांसद थरूर ने साफ कर दिया कि देश का हित उनके लिए सर्वोपरि है। उन्होंने कहा, “जब मैं भारत की बात करता हूं, तो मैं सभी भारतीयों के लिए बोलता हूं, न कि केवल उन लोगों के लिए जो मेरी पार्टी को पसंद करते हैं।”
- थरूर ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर दलीय मतभेदों को भुलाने की अपील की।
- उन्होंने अपनी आलोचनाओं के बावजूद देशहित में अडिग रहने की बात दोहराई।
- थरूर ने कहा कि पार्टियाँ राष्ट्र को बेहतर बनाने का केवल एक माध्यम हैं।
कोच्चि में एक हाई स्कूल के छात्र के सवाल का जवाब देते हुए थरूर ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध उद्धरण का उल्लेख किया: “अगर भारत खत्म हो गया तो कौन बचेगा?” उन्होंने इस बात पर बल दिया कि राष्ट्रीय एकता को हमेशा राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता पर हावी होना चाहिए।
मुख्य बिंदु :
- थरूर ने पहलगाम हमले के बाद दलगत मतभेद भूलकर भारत सरकार का वैश्विक मंचों पर समर्थन किया।
- कांग्रेस के भीतर आलोचनाओं के बावजूद थरूर ने ‘राष्ट्र पहले, पार्टी बाद में’ का संकल्प दोहराया।
- ऑपरेशन सिंदूर पर थरूर ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से भारत की राष्ट्रवादी नीति का समर्थन किया।
- खड़गे की परोक्ष आलोचना के जवाब में थरूर ने मोदी की सराहना को राष्ट्रहित में ठहराया।
- थरूर ने कहा, पार्टियाँ केवल राष्ट्र सेवा का माध्यम, राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
- थरूर ने 1975 आपातकाल को ‘लोकतंत्र का काला दौर’ बताते हुए गांधी परिवार को अलग किया।
- राष्ट्रीय क्षणों में सभी दलों को एकजुट होकर राष्ट्रहित में सहयोग करना चाहिए: थरूर।
ऑपरेशन सिंदूर और वैश्विक कूटनीति: थरूर का संयुक्त मोर्चा
पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के संदर्भ में, थरूर ने बताया कि उनकी टिप्पणियों का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत सरकार और सशस्त्र बलों का एक संयुक्त मोर्चा प्रस्तुत करना था। उन्होंने अमेरिका जैसे देशों में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था, ताकि पाकिस्तान और उसके आतंकी संबंधों पर भारत के रुख को स्पष्ट किया जा सके। थरूर के अनुसार, वैश्विक संपर्क के दौरान उनकी टिप्पणियों ने आलोचकों को भी उनका प्रशंसक बना दिया, जिन्होंने संकट की घड़ी में दलीय मतभेदों को दरकिनार करने के लिए उनकी प्रशंसा की।
- थरूर ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत का रुख दुनिया को बताया।
- उन्होंने अपनी पार्टी के भीतर मिल रही आलोचनाओं को स्वीकार किया।
- थरूर ने कहा कि उनका उद्देश्य एक संयुक्त अंतर्राष्ट्रीय मोर्चा बनाना था।
हालांकि, कांग्रेस, जिसने शुरुआत में केंद्र को पूर्ण समर्थन का आश्वासन दिया था, ने बाद में सरकार से संघर्ष विराम के कारणों और इसमें अमेरिका की भूमिका पर सवाल उठाते हुए अपना रुख बदल लिया था। इसी पृष्ठभूमि में, सरकार का समर्थन करने वाली थरूर की टिप्पणियाँ उनके पार्टी सहयोगियों को रास नहीं आईं।
कांग्रेस नेतृत्व से तकरार: खड़गे का ‘मोदी पहले’ कटाक्ष
पिछले महीने, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने परोक्ष रूप से थरूर पर निशाना साधते हुए कहा था कि कांग्रेस “देश पहले” में विश्वास करती है, लेकिन “कुछ लोगों के लिए, पहले मोदी और बाद में देश” है। यह टिप्पणी थरूर द्वारा पहलगाम हमले के बाद भारत के जवाबी हमले, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से निपटने के लिए प्रधानमंत्री की प्रशंसा के बाद आई थी। थरूर ने इस पर एक्स पर एक पोस्ट के साथ जवाब दिया था: “उड़ने की इजाज़त मत मांगो। पंख तुम्हारे हैं। और आसमान किसी का नहीं है।”
- खड़गे ने थरूर की प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा पर आपत्ति जताई।
- थरूर ने एक्स पर प्रतीकात्मक पोस्ट के साथ अपनी बात रखी।
- पार्टी के भीतर उनकी निष्ठा पर सवाल उठाए गए।
थरूर ने जोर देकर कहा कि भले ही पार्टियों की विचारधाराएँ पूंजीवाद बनाम समाजवाद, विनियमन बनाम मुक्त बाजार जैसी अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन सभी को “बेहतर और सुरक्षित भारत” के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। उन्होंने कहा, “राजनीति प्रतिस्पर्धा के बारे में है, लेकिन जब राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में अन्य दलों के साथ सहयोग की जरूरत होती है, तो कभी-कभी पार्टियों को लगता है कि यह विश्वासघात है।”
‘राष्ट्र सर्वोपरि’: थरूर का अदम्य संकल्प
कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य थरूर ने दोहराया कि पार्टियाँ राष्ट्र की सेवा करने का एक माध्यम मात्र हैं। “मेरे विचार से, राष्ट्र सर्वोपरि है। पार्टियाँ राष्ट्र को बेहतर बनाने का एक माध्यम हैं। आप जिस भी पार्टी से हों, उस पार्टी का उद्देश्य अपने तरीके से एक बेहतर भारत का निर्माण करना है।” उन्होंने कहा कि “मेरे सशस्त्र बलों और हमारी सरकार के समर्थन में मेरे रुख़ की वजह से बहुत से लोग मेरी बहुत आलोचना करते रहे हैं… लेकिन मैं अपनी बात पर अड़ा रहूँगा क्योंकि मेरा मानना है कि देश के लिए यही सही है।” कार्यक्रम से इतर जब थरूर से पूछा गया कि क्या कांग्रेस आलाकमान के साथ उनकी कोई समस्या है, तो उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, “मैं दो भाषण देने आया था।”
- थरूर ने ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के अपने दर्शन को पुनः स्थापित किया।
- उन्होंने कहा कि आलोचना के बावजूद अपने रुख पर कायम रहेंगे।
- थरूर ने देशहित को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से ऊपर रखा।
केरल मुख्यमंत्री सर्वेक्षण और आपातकाल पर थरूर का स्पष्टीकरण
एक अलग बात यह है कि थरूर से एक सर्वेक्षण के बारे में भी पूछा गया, जिसमें कहा गया था कि केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ का सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री पद का चेहरा वही हैं। उन्होंने कहा, “किसी ने मुझे यह सर्वेक्षण भेजा और मैंने जवाब में उन्हें सलाम किया। मेरे पास कहने के लिए और कुछ नहीं था। मैंने कोई टिप्पणी नहीं की और मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ।” इसके अतिरिक्त, थरूर ने 1975 के आपातकाल की आलोचना करने वाले अपने विवादास्पद लेख को भी सही ठहराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने “गांधी परिवार के खिलाफ कुछ नहीं कहा”, बल्कि “केवल उस समय (आपातकाल) हुई कुछ व्यक्तियों और घटनाओं का उल्लेख किया है।” उन्होंने 21 महीने के आपातकाल को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक “काला दौर” बताया था।
- थरूर ने केरल सीएम पद के सर्वेक्षण पर टिप्पणी से इनकार किया।
- उन्होंने आपातकाल पर अपने लेख का बचाव किया, गांधी परिवार को बरी किया।
- थरूर ने अपने लेख को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का ‘काला दौर’ बताया।
थरूर ने जोर देकर कहा, “राजनीति में मेरे 16 वर्षों के दौरान समावेशी विकास मेरा मूलमंत्र रहा है और मैं समावेशिता और विकास में विश्वास करता हूं। मैं राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय हित में भी विश्वास करता हूं।” उन्होंने कहा कि वह किसी भी “राजनीतिक षड्यंत्र” में शामिल नहीं होना चाहते।
शशि थरूर का ‘राष्ट्र पहले’ दृष्टिकोण: निरंतरता और प्रतिबद्धता
थरूर ने कहा किराष्ट्र पहले, पार्टी बाद में हमेशा से उनका मार्गदर्शक दर्शन रहा है। उन्होंने बताया कि वह भारत केवल इसलिए लौटे हैं ताकि वह राजनीति के माध्यम से और राजनीति से बाहर, हर संभव तरीके से राष्ट्र की सेवा कर सकें। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि “मैं यहाँ किसी राजनीति या समस्या पर चर्चा करने नहीं आया हूँ… आज का भाषण सांप्रदायिक सद्भाव के बारे में था।” उन्होंने दोहराया कि राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय महत्व के क्षणों में हाथ मिलाने में संकोच नहीं करना चाहिए।
- थरूर ने राष्ट्र पहले, पार्टी बाद में को अपना मार्गदर्शक दर्शन बताया।
- उन्होंने राष्ट्र सेवा के लिए भारत लौटने की बात दोहराई।
- थरूर ने सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय हित पर जोर दिया।



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