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 “रूस भारत गैसोलीन निर्यात ”  कच्चे तेल के एक्सपोर्टर से फ्यूल इम्पोर्टर बना

रूस भारत गैसोलीन निर्यात

रूस भारत गैसोलीन निर्यात भारत रूस तेल वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक ऐतिहासिक और अनूठा बदलाव देखने को मिल रहा है। दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल (Crude Oil) निर्यातकों में से एक, रूस आज खुद गैसोलीन (पेट्रोल) आयात करने पर मजबूर हो गया है।

यूक्रेन के लगातार हो रहे ड्रोन हमलों के कारण रूसी रिफाइनरियों का कामकाज प्रभावित हुआ है, जिसके चलते रूस में घरेलू ईंधन संकट गहरा गया है। इस कठिन समय में भारत, रूस के लिए एक प्रमुख गैसोलीन आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरकर सामने आया है।

शिप-ट्रैकिंग और एनर्जी एनालिटिक्स फर्म वोर्टेक्स (Vortexa) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो महीनों में भारतीय रिफाइनरियों ने रूस की आपातकालीन ईंधन मांग को पूरा करने के लिए लगभग 10 लाख (1 मिलियन) बैरल गैसोलीन निर्यात किया है।

गुजरात की वाडिनार रिफाइनरी से भेजे गए शिपमेंट

भारत से रूस भेजे गए इस गैसोलीन का अधिकांश हिस्सा गुजरात स्थित वाडिनार रिफाइनरी से रवाना किया गया, जिसका संचालन नायरा एनर्जी (Nayara Energy) करती है। उल्लेखनीय है कि रूस की सरकारी स्वामित्व वाली दिग्गज़ तेल कंपनी ‘रोसनेफ्ट’ (Rosneft) की नायरा एनर्जी में 50% हिस्सेदारी है।

रोचक बात यह है कि भारतीय रिफाइनरियों ने जिस पेट्रोल को रूस वापस निर्यात किया, उसमें से एक बड़ा हिस्सा उसी रूसी कच्चे तेल से तैयार किया गया था जिसे भारत ने रूस से सस्ते दामों पर आयात किया था। जून और जुलाई के दौरान भारत का रूसी क्रूड आयात रिकॉर्ड 26 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक पहुँच गया था, जो भारत की कुल क्रूड आवश्यकता के आधे से अधिक है।

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रिफाइनरियों पर 32 हमले: 70% तक गिरा उत्पादन

रूस के घरेलू बाजार में गैसोलीन की भारी किल्लत का मुख्य कारण उसके ऊर्जा बुनियादी ढांचे (Energy Infrastructure) पर हुए लक्षित हमले हैं।

लगातार ड्रोन हमले: वोर्टेक्स के अनुसार, जुलाई और अगस्त के दौरान रूसी रिफाइनरियों को निशाना बनाते हुए 32 अलग-अलग ड्रोन हमले किए गए—यानी औसतन हर दो दिन में एक हमला।

उत्पादन में भारी गिरावट: इन हमलों के चलते प्रभावित रिफाइनिंग प्लांट्स में घरेलू गैसोलीन उत्पादन में 70% तक की भारी कमी दर्ज की गई।

आयात में उछाल: अगस्त के महीने में रूस का समुद्री रास्ते से गैसोलीन आयात रिकॉर्ड 1,25,000 बैरल प्रतिदिन (~4,70,000 टन) तक पहुँच गया। इस कमी को पूरा करने के लिए मॉस्को ने भारत, तुर्की और मोरक्को से ईंधन का आयात किया।

‘डार्क’ शिप-टू-शिप ट्रांसफर और समुद्री प्रतिबंध

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों और निगरानी के बीच रूस तक ईंधन पहुँचाना एक जटिल प्रक्रिया रही है।

प्रतिबंधित जहाजों का इस्तेमाल: वोर्टेक्स डेटा से पता चलता है कि अगस्त में रूस द्वारा आयात किए गए कुल गैसोलीन का लगभग 55% (लगभग 2,60,000 टन) हिस्सा उन जहाजों से आया जो अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के दायरे में हैं।

सिग्नल बंद कर ट्रांसफर: भारत से भेजे गए सभी गैसोलीन कार्गो को भूमध्य सागर में ‘डार्क’ शिप-टू-शिप (STS) ट्रांसफर के जरिए रूस पहुँचाया गया। इस दौरान जहाजों ने पकड़े जाने से बचने के लिए अपने ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) सिग्नल बंद रखे थे।

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निर्यात पर पाबंदी और डीजल संकट

घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने के लिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सरकार ने कड़े कदम उठाए हैं:

एक्सपोर्ट बैन बढ़ाया: रूस ने देश से बाहर गैसोलीन के निर्यात पर लगी पूर्ण पाबंदी को जनवरी 2027 के अंत तक बढ़ा दिया है। वहीं, डीजल निर्यात पर प्रतिबंध को 1 सितंबर, 2026 तक लागू रखा गया है।

डीजल निर्यात में भारी गिरावट: रिफाइनरी को हुए नुकसान के चलते अगस्त में रूस का समुद्री डीजल निर्यात घटकर मात्र 1,50,000 बैरल प्रतिदिन रह गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 6,10,000 बैरल प्रतिदिन कम है।

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भविष्य का दृष्टिकोण

ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले समय में भी रूस को कुछ समय के लिए गैसोलीन का आयात जारी रखना पड़ेगा। ऐतिहासिक रूप से, रूसी रिफाइनरियाँ डीजल की तुलना में गैसोलीन का उत्पादन कम करती हैं। जब तक क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे और रिफाइनरियों की पूरी तरह से मरम्मत नहीं हो जाती, तब तक रूस को अपने घरेलू बाजार को स्थिर रखने के लिए भारत जैसे सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा।

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