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“विकास बनाम विनाश”क्रोनी कैपिटलिज्म और बढ़ते प्रदूषण का पूरा सच

विकास बनाम विनाश

विकास बनाम विनाश सत्ता के गलियारों में बैठे नेताओं का क्रोनी कैपिटलिज्म से गठजोड़ कोई नई बात नहीं है, लेकिन भारत में पिछले एक दशक में यह एक सुव्यवस्थित रणनीति की शक्ल ले चुका है। मोदी सरकार पर लगातार यह गंभीर आरोप लगते रहे हैं कि वह चुनिंदा पूंजीपतियों, जैसे अडानी और अंबानी समूहों को अनुचित फायदा पहुंचाने के लिए नीतियां बना रही है।

इस नीतिगत ढांचे ने सार्वजनिक संसाधनों के निजीकरण को अभूतपूर्व गति दी है। हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने जब अदाणी ग्रुप पर स्टॉक मैनिपुलेशन के आरोप लगाए, तो इसने प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनके कथित करीबी रिश्तों को एक बार फिर वैश्विक स्तर पर उजागर कर दिया।

यह गठजोड़ न केवल भारत में आर्थिक असमानता की खाई को गहरा कर रहा है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव को भी कमजोर कर रहा है। आज स्थिति यह है कि राजनीतिक कनेक्शंस के बिना बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिलना लगभग असंभव हो गया है, जिससे जनता की गाढ़ी कमाई से बनी संपत्ति कुछ चुनिंदा हाथों में सिमट रही है। यह सीधे तौर पर लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर गहरी चोट है।

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पर्यावरण का विनाश: विकास की अंधी दौड़ में उजड़ते जंगल और नदियां

जनता पर तरह-तरह के टैक्स थोपना मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का एक कड़वा और दर्दनाक पहलू रहा है। जीएसटी को जब लागू किया गया था, तब इसे एक ‘सरल टैक्स सिस्टम’ के रूप में विज्ञापित किया गया था, लेकिन हकीकत में यह एक अत्यंत जटिल और बोझिल व्यवस्था साबित हुई है।

इस व्यवस्था ने विशेष रूप से मध्यम वर्ग पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव डाला है। विकास बनाम विनाश के इस दौर में सरकार के टैक्स सुधारों की तीखी आलोचना हो रही है, क्योंकि ये सुधार उपभोग को बढ़ावा देने के बजाय केवल राजस्व की कमी पूरी करने का जरिया बन गए हैं।

एक तरफ जहां अमीरों और कॉर्पोरेट जगत को भारी टैक्स छूट दी जा रही है, वहीं अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले मध्यम वर्ग को इन नीतियों से ठगा हुआ महसूस हो रहा है। ऊपरी तबके के लिए रियायतों का अंबार है और आम आदमी के लिए नियमों की सख्ती; यह विरोधाभास विकास के दावों के बीच असमानता की खाई को और चौड़ा कर रहा है।

पर्यावरणीय क्षति की अनदेखी

सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण मोदी सरकार की आर्थिक सोच का केंद्र बिंदु रहा है। इसके तहत पोर्ट, एयरपोर्ट, एयर इंडिया, बैंक और अन्य महत्वपूर्ण पीएसयू (PSUs) को निजी हाथों में सौंपा गया। साल 2021 में घोषित महत्वाकांक्षी प्राइवेटाइजेशन प्रोग्राम ने राज्य की कीमती संपत्तियों को बेचने का द्वार खोल दिया।

हालांकि, अर्थशास्त्री और आलोचक इसे ‘डिस्ट्रेस सेल’ की संज्ञा देते हैं, जो सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को पूरी तरह नजरअंदाज करता है। इन सार्वजनिक उपक्रमों ने ऐतिहासिक रूप से देश के पिछड़े इलाकों के विकास और रोजगार सृजन में बड़ी भूमिका निभाई है।

अब इन्हें निजी पूंजीपतियों के हवाले करने से न केवल रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी देखी गई है, जो स्पष्ट रूप से क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा देने का काम कर रही है।

लोकतंत्र की रक्षा और नागरिकों की चुप्पी का सवाल

मौजूदा समय में पर्यावरण का विनाश भारत की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है। नीतियां अब विकास के नाम पर जंगलों, नदियों, पहाड़ों और हमारे अनमोल प्राकृतिक संसाधनों को तबाह करने पर तुली हैं। 2014 से 2024 तक की अवधि का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि डिफॉरेस्टेशन, अनियंत्रित माइनिंग और औद्योगिक गतिविधियों ने पर्यावरणीय गिरावट की गति को कई गुना तेज कर दिया है।

जल प्रदूषण और भूमि क्षरण जैसी समस्याएं अब विकराल रूप ले चुकी हैं, जिसका सीधा और घातक असर कृषि उत्पादन और जन-स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

विकास बनाम विनाश की इस अंधी दौड़ में सरकार की नई नीतियां, जैसे कि फॉरेस्ट क्लियरेंस की प्रक्रिया को आसान बनाना, अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान को न्योता दे रही हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां और अधिक गंभीर हो गई हैं।

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हवा में घुलता जहर और मूक हत्यारा बनता शहरी प्रदूषण

भारत के शहरों में बढ़ता प्रदूषण अब एक मूक हत्यारा साबित हो रहा है, जो हर साल लाखों जिंदगियां निगल रहा है। 2018 से 2023 तक के डराने वाले आंकड़े बताते हैं कि वायु प्रदूषण के कारण भारत में सालाना औसतन 1.6 से 2 मिलियन मौतें हो रही हैं। अकेले 2023 में ही 2 मिलियन मौतें प्रदूषण जनित बीमारियों से जुड़ी पाई गईं।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की स्थिति तो और भी भयावह है, जहां कुल मौतों में से 15% का सीधा संबंध खराब वायु गुणवत्ता से है। ये आंकड़े किसी भी युद्ध में होने वाली मौतों से कहीं ज्यादा हैं, लेकिन इसके बावजूद नीतिगत स्तर पर किसी ठोस कार्रवाई का अभाव दिखता है। इंडस्ट्री और ट्रांसपोर्ट सेक्टर से निकलने वाले उत्सर्जन को लगभग अनियंत्रित छोड़ दिया गया है, जो जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।

सरकारी नीतियाँ और कॉरपोरेट हित

विकास के शोर के पीछे धर्म के नाम पर की जा रही राजनीति ने समाज को गहराई से बांटने का काम किया है। बीजेपी और आरएसएस पर अक्सर यह आरोप लगते हैं कि वे हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेल रहे हैं और उन्हें निशाना बना रहे हैं। सीएए (CAA) और हिजाब बैन जैसे विवादास्पद कानूनों और फैसलों ने देश में धार्मिक स्वतंत्रता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे सामाजिक तनाव चरम पर पहुंच गया है।

यह स्पष्ट रूप से चुनावी लाभ के लिए अपनाई गई एक रणनीति नजर आती है, लेकिन इसकी कीमत देश की धर्मनिरपेक्ष (Secular) छवि को चुकानी पड़ रही है। इस माहौल में हिंसा के मामले बढ़े हैं और धर्म को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना न केवल जनता को गुमराह कर रहा है, बल्कि हमारी राष्ट्रीय एकता को भी कमजोर कर रहा है।

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विकास बनाम विनाश: राजनीतिक बहस

विकास बनाम विनाश के इस मोड़ पर देश के नागरिकों की चुप्पी आने वाली पीढ़ियों के साथ एक बड़ा अन्याय होगी। पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सद्भाव को जो नुकसान आज पहुंचाया जा रहा है, वह अपूरणीय है। समय की मांग है कि सरकारों को जवाबदेह बनाया जाए, चाहे सत्ता में कोई भी दल हो।

नीतियां जनहित में होनी चाहिए, न कि कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों के निजी हितों को साधने के लिए। अपनी आवाज उठाना लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन इस संवाद को केवल आरोपों तक सीमित न रखकर ठोस तथ्यों पर आधारित रखना अनिवार्य है। नागरिक चेतना ही वह एकमात्र रास्ता है जो सत्ता को निरंकुश होने से रोक सकती है।

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सच्चा विकास और समानता का मार्ग

अंततः, हमें यह समझना होगा कि गगनचुंबी इमारतें और निजी पोर्ट्स सच्चा विकास नहीं हैं। सच्चा विकास तभी संभव है जब पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक न्याय और सामाजिक समानता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

विकास बनाम विनाश की इस लड़ाई में यदि हमने आज अपने संसाधनों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा नहीं की, तो भविष्य का भारत केवल असमानता और प्रदूषण का केंद्र बनकर रह जाएगा। देश की प्रगति का पैमाना चंद अरबपतियों की संपत्ति नहीं, बल्कि आम नागरिक की खुशहाली और सुरक्षित पर्यावरण होना चाहिए।

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