“भारत के जर्जर बांध “करोड़ों लोगों पर मंडराया भीषण जल प्रलय का खतरा
भारत के जर्जर बांध आज देश के लिए एक ऐसा खामोश लेकिन विस्फोटक संकट बन चुके हैं, जो कभी भी करोड़ों लोगों की जान, संपत्ति और आजीविका को पूरी तरह तबाह कर सकता है। 2025 के राष्ट्रीय बड़े बांध रजिस्टर (NRLD) के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि देश में वर्तमान में 6,545 संचालित बड़े बांध हैं (कुल संख्या 6,628 है जिसमें निर्माणाधीन शामिल हैं)।
इनमें से 1,065 बांध 50 से 100 साल पुराने हो चुके हैं, जबकि 224 से अधिक बांध तो 100 साल की उम्र भी पार कर चुके हैं। ये पुरानी पड़ चुकी संरचनाएं अब सीपेज, गहरी दरारें, कमजोर होती नींव और अपर्याप्त स्पिलवे क्षमता जैसी गंभीर तकनीकी समस्याओं से जूझ रही हैं।
ऊपर से जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली अनियमित और तीव्र बारिश इन बांधों की मूल डिजाइन सीमाओं को पार कर रही है, जिससे स्थिति और भी भयावह हो गई है।
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2025 में बांध टूटने की घटनाएं और मौतों का तांडव
साल 2025 बांधों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद डरावना साबित हुआ है। मध्य प्रदेश में कलोरा, राजस्थान में सुरवाल और छत्तीसगढ़ में लुटी जैसे बांधों के टूटने (ब्रेकेज) से भीषण बाढ़ आई।
विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के लुटी बांध हादसे में 6 लोगों की दर्दनाक मौत हुई। यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है जो न केवल डाउनस्ट्रीम (निचले) इलाकों में तबाही ला रही है, बल्कि हजारों किसानों की मेहनत की फसल को भी एक झटके में बर्बाद कर रही है।
सिल्टेशन का संकट: आधी रह गई बांधों की पानी रोकने की क्षमता
सरकार की उदासीनता का सबसे बड़ा उदाहरण 130 साल पुराना मुल्लापेरियार बांध है। भारत के जर्जर बांध की श्रेणी में यह सबसे संवेदनशील नाम है। 2025 में सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा। कोर्ट ने मई में ट्री कटिंग और ग्राउटिंग की अनुमति दी और अक्टूबर में स्ट्रेंथनिंग के लिए नोटिस जारी किए, लेकिन केरल और तमिलनाडु के बीच आपसी विवाद और पर्यावरण क्लियरेंस की जटिलताओं के कारण सुधार कार्य ठप पड़ा है।
कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि लाइम-सुरखी (चूने और सुर्खी) से बनी इस बांध की संरचना अब बहुत कमजोर हो चुकी है। यदि भूकंप या क्लाउडबर्स्ट जैसी स्थिति बनी, तो मुल्लापेरियार का टूटना इडुक्की जैसे निचले बांधों को भी खतरे में डाल देगा, जिससे लाखों जिंदगियां संकट में आ जाएंगी।
भारत के जर्जर बांध: बढ़ता राष्ट्रीय खतरा
बांधों की हालत सुधारने के लिए ‘डैम रिहैबिलिटेशन एंड इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट’ (DRIP) फेज II और III के तहत 736 बांधों की मरम्मत की योजना बनाई गई है। विश्व बैंक और AIIB की सहायता से इसके लिए 10,211 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित है। लेकिन जमीनी हकीकत निराशाजनक है; जून 2025 तक केवल 25 बांधों पर ही प्रमुख कार्य पूरे हो पाए हैं और अब तक मात्र 1,797 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।
हालांकि फेज I में 223 बांधों को दुरुस्त किया गया था, लेकिन अब भारत के जर्जर बांध प्रशासन की उपेक्षा की भेंट चढ़ रहे हैं। हीराकुड, श्रीसैलम और सिंगुर जैसे महत्वपूर्ण बांधों में लीकेज और गेट्स की गंभीर समस्याएं देखी गई हैं, जहां अब अंडरवाटर ड्रोन से जांच की जा रही है।
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भारत के जर्जर बांध और मौजूदा हालात
देश के जलाशयों में सिल्टेशन (गाद जमा होना) एक कैंसर की तरह फैल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, कई प्रमुख बांधों की स्टोरेज क्षमता 50% तक घट गई है। इसका दोहरा नुकसान हो रहा है—सूखे के दौरान पानी की कमी हो जाती है और भारी बारिश के समय अतिरिक्त पानी छोड़ना मजबूरी बन जाता है, जिससे कृत्रिम बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
भारत के जर्जर बांध का यह रखरखाव न होना सीधे तौर पर किसानों को प्रभावित कर रहा है, क्योंकि बांध न केवल सिंचाई का आधार हैं बल्कि सस्ती बिजली का स्रोत भी हैं। गाद जमा होने से इनकी उत्पादकता लगातार गिरती जा रही है।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ती अनियमित बारिश का दबाव
2025 में पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और असम में अनियमित बारिश और क्लाउडबर्स्ट बढ़े। इससे बांधों की संरचना पर भारी दबाव पड़ा। IISER सहित कई वैज्ञानिक अध्ययनों में बताया गया है कि बांध कभी बाढ़ नियंत्रित करते हैं। कई बार वही बाढ़ को ट्रिगर भी कर देते हैं। यह स्थिति तब बनती है जब जलाशय पहले से भरे होते हैं। ऐसे हालात में थोड़ी अतिरिक्त बारिश भी खतरा बढ़ा देती है।
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बांधों से पानी छोड़ने पर उठते गंभीर सवाल
उत्तराखंड की फ्लैश फ्लड और पंजाब की बाढ़ में बांधों से पानी छोड़ने की भूमिका संदिग्ध रही। भाखड़ा-बीस मैनेजमेंट बोर्ड द्वारा समय पर पानी नहीं छोड़ा गया। इसके कारण पंजाब में लाखों हेक्टेयर फसल डूब गई। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ। इससे बांध प्रबंधन प्रणाली की कमजोरियां सामने आईं।
भारत के जर्जर बांधों से प्रभावित राज्य
किसान इन जर्जर बांधों के सबसे बड़े शिकार हैं। ये बांध सिंचाई की रीढ़ हैं और खरीफ व रबी की फसलें इन्हीं पर निर्भर हैं। 2025 की घटनाओं ने दिखाया कि लुटी बांध टूटने और पंजाब में भाखड़ा-पोंग से अचानक पानी छोड़े जाने के कारण 3.55 लाख लोग प्रभावित हुए।
फसलों की तबाही और पशुओं की मौत ने किसानों को कर्ज के दलदल में धकेल दिया है। सरकार की प्राथमिकताएं तब संदिग्ध लगती हैं जब DRIP जैसे प्रोजेक्ट्स में देरी होती है और स्वदेशी फंडिंग के बजाय केवल विदेशी कर्ज (विश्व बैंक) पर निर्भरता बनी रहती है।
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डैम सेफ्टी एक्ट 2021: कानून तो बना पर जमीन पर काम नहीं
संसदीय कानून ‘डैम सेफ्टी एक्ट 2021’ के बावजूद इसकी प्रभावशीलता शून्य नजर आती है। नेशनल कमिटी ऑन डैम सेफ्टी (NCDS) का पूर्ण गठन अभी तक नहीं हुआ है, जिस पर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई। नवंबर 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ 1,853 बांधों की ही रिस्क स्क्रीनिंग हो पाई है, जबकि 5,000 से अधिक बांधों का सेफ्टी असेसमेंट पेंडिंग है।
इमरजेंसी एक्शन प्लान और इनुंडेशन मैप्स की कमी के कारण निचले इलाकों में रहने वाले समुदाय हमेशा मौत के साये में रहते हैं। यद्यपि DHARMA जैसे डिजिटल टूल्स बनाए गए हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन अत्यंत सुस्त है।



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