क्या गंभीर-अगरकर से अनबन के कारण टेस्ट से “विराट कोहली संन्यास लिया।
विराट कोहली टेस्ट संन्यास भारतीय क्रिकेट के आधुनिक युग के सबसे बड़े महानायक विराट कोहली द्वारा टेस्ट क्रिकेट को अचानक अलविदा कहने के फैसले ने जितने मुंह, उतनी बातें वाली स्थिति पैदा कर दी थी।
ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ‘डाउन अंडर’ श्रृंखला में मिली शिकस्त के बाद जब कोहली ने खेल के इस सबसे लंबे और पारंपरिक प्रारूप से हटने की घोषणा की, तो क्रिकेट गलियारों में कई तरह की सुगबुगाहटें तेज हो गईं। अब इस पूरे मामले पर भारत के पूर्व क्रिकेटर और बेबाक कमेंटेटर संजय मांजरेकर ने एक बड़ा वैचारिक कूटनीतिक विस्फोट किया है।
मांजरेकर ने दावा किया है कि कोहली का यह फैसला केवल फॉर्म में गिरावट का नतीजा नहीं था, बल्कि इसके पीछे हेड कोच गौतम गंभीर और मुख्य चयनकर्ता अजीत अगरकर की नई कूटनीतिक जुगलबंदी के साथ उनके वैचारिक मतभेद और असहजता भी एक बहुत बड़ी वजह थी।
आरसीबी पॉडकास्ट का दर्द और मांजरेकर का ‘खलनायक’ विश्लेषण
इस पूरे विवाद को हवा तब मिली जब विराट कोहली ने हाल ही में ‘आरसीबी पॉडकास्ट’ (RCB Podcast) पर अपने आलोचकों को आड़े हाथों लेते हुए एक भावुक और आक्रामक बयान दिया। कोहली ने निराशा जाहिर की थी कि इतने साल देश की सेवा करने और अनगिनत रिकॉर्ड बनाने के बावजूद, जब भी वह भारतीय जर्सी पहनते हैं, तो उन्हें हर बार खुद को साबित करने के लिए कहा जाता है। उन्होंने टीम के भीतर एक खास किस्म के बदलते “माहौल” का भी जिक्र किया था।
स्पोर्टस्टार के ‘इनसाइड एज’ (Insight Edge) पॉडकास्ट पर इस बयान की चीर-फाड़ करते हुए संजय मांजरेकर ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा:
“यहाँ बातों के पीछे छिपे असली मतलब को समझने की कोशिश कोई नहीं करेगा, इसलिए सच बोलने के लिए मैं ही यहाँ ‘खलनायक’ बनने को तैयार हूँ। विराट जिस ‘माहौल’ के बदलने की बात कर रहे हैं, उसे समझना बहुत आसान है। जब वह कप्तान और खिलाड़ी के तौर पर रवि शास्त्री के साथ थे, तो शास्त्री हमेशा एक चट्टान की तरह उनके पीछे खड़े रहते थे—उन्हें मोटिवेट करते थे और हर हाल में उनका साथ देते थे, शायद जरूरत से थोड़ा ज्यादा ही।
फिर राहुल द्रविड़ का दौर आया और उनके जाते ही गौतम गंभीर की एंट्री हुई। गंभीर और नए मुख्य चयनकर्ता अजीत अगरकर, दोनों ही बेहद स्वाभिमानी, मजबूत इरादों वाले और भारतीय क्रिकेट को लेकर एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण रखने वाले लोग हैं। उनकी योजनाएं पिछले चयनकर्ताओं जैसी लचीली नहीं हैं। यही वह नया माहौल है जहां विराट खुद को सहज महसूस नहीं कर पा रहे थे।”
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‘पिछले 5 सालों का टेस्ट रिकॉर्ड देखो’: आंकड़ों के आईने में सच
मांजरेकर ने केवल माहौल पर बात नहीं की, बल्कि उन्होंने कोहली के हालिया टेस्ट प्रदर्शन के कड़वे आंकड़ों को भी कूटनीतिक रूप से सामने रख दिया। उन्होंने उजागर किया कि साल २०२० से २०२५ के बीच टेस्ट क्रिकेट में कोहली के बल्ले से रन निकलना लगभग बंद हो गए थे। एक समय टेस्ट में करीब ६० का बेमिसाल औसत रखने वाले इस दिग्गज बल्लेबाज का करियर औसत गिरकर ४६.८५ पर आ गया।
कमेंटेटर ने कड़े शब्दों में कहा कि अपने करियर के आखिरी पांच सालों में टेस्ट स्तर पर कोहली का बल्लेबाजी औसत महज ३१ का रहा था। इस लंबे दौर में वे ऑफ स्टंप से बाहर जाती गेंदों पर लगातार बीट होते रहे और एक-एक शतक के लिए उन्हें लंबा सूखा झेलना पड़ा।
मांजरेकर ने खिलाड़ी की मनोवैज्ञानिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा:
“जब कोई भी महान खिलाड़ी अपने करियर के आखिरी पड़ाव पर होता है, तो यह इंसानी फितरत है कि वह अपनी अंदरूनी तकनीकी और परफॉर्मेंस की कमियों को देखने के बजाय बाहरी चीजों या माहौल को दोष देने लगता है। विराट को अब इस बदले माहौल के बारे में सोचना बंद कर देना चाहिए।
उन्हें यह सोचना छोड़ना होगा कि कौन उन्हें टीम में चाहता है और कौन नहीं। उन्हें सिर्फ अपने पिछले ५ साल के टेस्ट रिकॉर्ड को देखना चाहिए। क्या टेस्ट स्तर पर ५ साल तक ३१ का औसत रखने के बाद भी कोई खिलाड़ी इतने लंबे मौके का हकदार हो सकता है? भारतीय क्रिकेट संस्कृति की यह खासियत है कि यहाँ बड़े नामों को उनकी साख के आधार पर जरूरत से ज्यादा लंबा मौका दिया जाता है, और विराट को भी वह मिला।”
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२०२७ वर्ल्ड कप की चुनौती: ‘शुरुआती रनों का कोई मोल नहीं, फाइनल जिताओ’
विराट कोहली भले ही टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं, लेकिन वे वनडे (ODI) प्रारूप में टीम इंडिया के लिए मुख्य स्तंभ बने हुए हैं। अगले साल दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और नामीबिया की संयुक्त मेजबानी में होने वाले २०२७ के ५० ओवर के वर्ल्ड कप में उनकी भागीदारी को लेकर अभी से कूटनीतिक बहस छिड़ गई है। यदि कोहली इस टूर्नामेंट में खेलते हैं, तो यह उनके करियर का पांचवां वनडे वर्ल्ड कप होगा।
साल २०२३ के वर्ल्ड कप में कोहली ने एक ही संस्करण में सबसे ज्यादा रन बनाने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड जरूर बनाया था, लेकिन मांजरेकर का मानना है कि टूर्नामेंट के लीग मैचों में बनाए गए रनों का तब तक कोई कूटनीतिक महत्व नहीं रह जाता, जब तक आप सबसे बड़े नॉकआउट मैचों में टीम को चैंपियन न बना सकें।
उन्होंने याद दिलाया कि २०१५ और २०१९ के वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में कोहली केवल १-१ रन बनाकर आउट हो गए थे, और २०२३ के फाइनल में अर्धशतक के बावजूद टीम इंडिया खिताब से चूक गई थी।
मांजरेकर ने स्पष्ट शब्दों में मांग की:
“अगर विराट २०२७ वर्ल्ड कप खेलते हैं, तो उनकी फिटनेस को लेकर कोई शक नहीं है। लेकिन मैं उनसे यह उम्मीद नहीं करता कि वे टूर्नामेंट की शुरुआत में छोटे देशों के खिलाफ बहुत सारे रन बनाएं। उनके जैसे कद, अनुभव और क्षमता वाले खिलाड़ी की असली परीक्षा सेमीफाइनल और फाइनल जैसे बड़े मंचों पर होती है।
उन्हें भारत को खिताब जिताना होगा, ठीक वैसे ही जैसे एमएस धोनी ने २०११ के फाइनल में ९१ रनों की नाबाद ऐतिहासिक पारी खेलकर किया था, या जैसे विव रिचर्ड्स, रिकी पोंटिंग और अरविंद डी सिल्वा ने अपनी टीमों के लिए फाइनल मैचों में किया था।
अगर विराट २०२७ के फाइनल में मैच जिताऊ पारी खेलते हैं, तो मैं उनके पिछले सभी खराब फॉर्म को भूल जाऊंगा। लेकिन अगर वह अंतिम दो सबसे महत्वपूर्ण मैचों में फेल रहते हैं, तो उन्हें दिए गए तमाम मौके बेकार माने जाएंगे।”
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संपादकीय दृष्टिकोण:
संजय मांजरेकर का यह आकलन कड़वा जरूर है, लेकिन यह आधुनिक क्रिकेट के उस व्यावसायिक और कड़े सच को बयां करता है जहां भावनाओं से ऊपर आंकड़ों और तात्कालिक नतीजों को रखा जाता है। गौतम गंभीर और अजीत अगरकर की नई कप्तानी-प्रबंधन जोड़ी ‘नाम’ के बजाय ‘काम’ और ‘भविष्य की योजनाओं’ पर केंद्रित है, जो शायद रवि शास्त्री के दौर के लाड़-प्यार वाले माहौल से बिल्कुल जुदा है।
विराट कोहली निस्संदेह सर्वकालिक महान खिलाड़ी हैं, लेकिन टेस्ट से उनका हटना इस बात का संकेत है कि जब कूटनीतिक गलियारों में आपके प्रदर्शन पर उंगलियां उठने लगें, तो सम्मान के साथ हटना ही सबसे बेहतर रणनीति होती है। अब सारा दारोमदार उनके सीमित ओवरों के करियर पर है, जहां उन्हें खुद को साबित करने के बजाय टीम को अंतिम रूप से विश्व विजेता बनाना होगा।
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