जस्टिस नाथ ने कहा, “आवारा कुत्तों के केस में जानवरों से मिला मानवीय सम्मान”
आवारा कुत्तों पर एक ऐतिहासिक फैसले के बाद, जस्टिस विक्रम नाथ ने खुलासा किया कि उन्हें जानवरों से मिला मानवीय सम्मान, जिसने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई। मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष और सह-अस्तित्व पर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में आयोजित एक क्षेत्रीय सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में एक ऐसी बात कही जिसने सबका ध्यान खींच लिया। उन्होंने कहा कि “अब तक, कानूनी बिरादरी में मुझे मेरे छोटे-मोटे कामों के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन मैं उन आवारा कुत्तों का शुक्रगुज़ार हूँ, जिन्होंने मुझे न केवल इस देश में, बल्कि दुनिया भर में, पूरे नागरिक समाज में पहचान दिलाई। मुझे यह सम्मान देने के लिए मैं उनका आभारी हूँ।” राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और केरल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (KeLSA) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन का विषय ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष और सह-अस्तित्व: कानूनी एवं नीतिगत परिप्रेक्ष्य’ था।
फैसले का विवाद और नया मोड़
जस्टिस नाथ का यह बयान इसलिए खास है क्योंकि कुछ समय पहले ही उनकी अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने आवारा कुत्तों से जुड़े एक आदेश में संशोधन किया था। दरअसल, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अगुवाई वाली दो-न्यायाधीशों की पीठ ने 11 अगस्त को एक आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि दिल्ली-एनसीआर के आवारा कुत्तों को नसबंदी के बाद आश्रय स्थलों में ही रहना चाहिए। इस आदेश की पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और आवारा कुत्ता प्रेमियों सहित समाज के कई वर्गों ने कड़ी आलोचना की थी और इसे “कठोर और क्रूर” करार दिया था। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने मामले को फिर से जस्टिस नाथ की पीठ को सौंपा।
जब आवारा कुत्तों से मिली वैश्विक पहचान
जस्टिस नाथ ने बताया कि इस मामले के बाद उन्हें कैसी प्रतिक्रियाएं मिलीं। उन्होंने कहा कि उन्हें संदेश मिल रहे हैं कि कुत्ते प्रेमियों के अलावा, कुत्ते भी उन्हें आशीर्वाद और शुभकामनाएँ दे रहे हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मानवीय आशीर्वाद और शुभकामनाओं के अलावा, मुझे उनकी भी शुभकामनाएँ मिल रही हैं।” उन्होंने लॉ एशिया पोला शिखर सम्मेलन का भी ज़िक्र किया, जहाँ उन्हें भारत के बाहर भी लोग इस मामले के कारण जानने लगे थे। उन्होंने कहा, “हम शिखर सम्मेलन में थे, और वकील संघ के अध्यक्ष भी वहाँ मौजूद थे। उन्होंने आवारा कुत्तों के मामले पर सवाल पूछना शुरू कर दिया। मुझे बहुत खुशी हुई, क्योंकि भारत के बाहर के लोग भी मुझे जानते हैं। यह वाकई में एक दुर्लभ अनुभव था जब एक न्यायाधीश ने खुले तौर पर जानवरों से मिला मानवीय सम्मान को स्वीकार किया।
मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व पर जोर
अपने संबोधन में, जस्टिस नाथ ने मानव और वन्यजीवों के सह-अस्तित्व के महत्व पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि सदियों से मनुष्य वन्यजीवों और प्रकृति के साथ रहते आए हैं, लेकिन पिछले दशकों में कहीं न कहीं हम इस लोकाचार से भटक गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप संघर्ष हुआ है। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान ने इस संघर्ष के समाधान खोजने की रूपरेखा तैयार की है। उनका यह बयान यह दर्शाता है कि यह केवल एक कानूनी मामला नहीं था, बल्कि एक गहरा सामाजिक और नैतिक मुद्दा भी था। इस मामले से मिली वैश्विक पहचान ने इस बहस को और भी व्यापक बना दिया। यह एक मिसाल है कि किस तरह से एक कानूनी फैसला समाज के हर वर्ग को प्रभावित कर सकता है। यह एक ऐसा मामला था जहाँ जानवरों से मिला मानवीय सम्मान ने कानूनी और सामाजिक दोनों ही मोर्चों पर एक महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत की।
सुप्रीम कोर्ट का संतुलित और व्यावहारिक फैसला
22 अगस्त को, जस्टिस नाथ की अगुवाई वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने 11 अगस्त के पूर्व आदेश में संशोधन किया। पीठ ने आदेश दिया कि जिन कुत्तों को उठाया जाएगा, उनकी नसबंदी की जाएगी, उन्हें कृमिनाशक दवा दी जाएगी और टीका लगाया जाएगा, जिसके बाद उन्हें उसी क्षेत्र में वापस छोड़ दिया जाएगा जहाँ से उन्हें उठाया गया था। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि यह स्थानांतरण उन कुत्तों पर लागू नहीं होगा जो रेबीज से संक्रमित हैं या रेबीज से संक्रमित होने की आशंका वाले हैं, और न ही आक्रामक व्यवहार वाले कुत्तों पर। इस सम्मेलन में जस्टिस नाथ के साथ अन्य शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीशों में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश भी शामिल थे।
राष्ट्रीय नीति और भविष्य की दिशा
न्यायमूर्ति नाथ की पीठ ने आवारा कुत्तों पर एक राष्ट्रीय नीति बनाने पर भी ज़ोर दिया और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया। साथ ही, आवारा कुत्तों से संबंधित विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित सभी कार्यवाही को भी शीर्ष न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया। यह फैसला न केवल आवारा कुत्तों के भविष्य के लिए एक नई दिशा प्रदान करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे एक न्यायाधीश के लिए एक छोटे-से माने जाने वाले मामले ने उन्हें पूरे देश और दुनिया में एक नई पहचान दिलाई। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे एक संवेदनशील और संतुलित कानूनी दृष्टिकोण से जानवरों से मिला मानवीय सम्मान प्राप्त किया जा सकता है, जो केवल कानूनी बिरादरी तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे नागरिक समाज को प्रभावित करता है। यह भी उल्लेखनीय है कि जस्टिस नाथ, जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस सूर्यकांत के बाद 2027 में भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने की दौड़ में हैं।



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