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दावोस में गीता गोपीनाथ: प्रदूषण है इकोनॉमी के लिए बड़ा खतरा

दावोस में गीता गोपीनाथ

दावोस में गीता गोपीनाथ, जो इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की पूर्व चीफ इकोनॉमिस्ट और डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर रह चुकी हैं, ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF 2026) के मंच से बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की इकोनॉमी के लिए ग्लोबल ट्रेड टैरिफ की तुलना में प्रदूषण एक कहीं अधिक घातक और वास्तविक खतरा बनकर उभर रहा है।

गोपीनाथ के अनुसार, प्रदूषण न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि यह धीरे-धीरे भारत की दीर्घकालिक आर्थिक विकास दर (Long-term Economic Growth) की नींव को भी कमजोर कर रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक और राजनीतिक बहसों में अक्सर टैरिफ का मुद्दा छाया रहता है, लेकिन अब समय आ गया है कि एनवायरनमेंटल डैमेज पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए।

प्रदूषण की आर्थिक कीमत: उत्पादकता और स्वास्थ्य पर गहरा असर

गोपीनाथ ने विस्तार से समझाया कि प्रदूषण का प्रभाव केवल धुंध या खराब हवा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे आर्थिक निहितार्थ हैं। उन्होंने कहा, “प्रदूषण की असली कीमत सिर्फ पर्यावरण से जुड़ी नहीं है, बल्कि यह इकोनॉमिक ग्रोथ, वर्कर्स की उत्पादकता और नागरिकों के स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ी हुई है।

” जब प्रदूषण बढ़ता है, तो वर्कफोर्स की कार्यक्षमता घटती है और हेल्थकेयर पर होने वाला खर्च बोझ बन जाता है, जिससे पूरी आर्थिक गतिविधि धीमी पड़ जाती है। गोपीनाथ का मानना है कि भारतीय इकोनॉमी पर प्रदूषण का यह प्रहार अब तक लगाए गए किसी भी अंतरराष्ट्रीय टैरिफ के असर से कहीं ज्यादा गंभीर है।

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विदेशी निवेश पर संकट और ग्लोबल निवेशकों का नजरिया

भारत की वैश्विक छवि और निवेश के माहौल पर चर्चा करते हुए दावोस में गीता गोपीनाथ ने एक महत्वपूर्ण बिंदु उठाया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में अंतरराष्ट्रीय कंपनियां केवल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं देखतीं, बल्कि उनके लिए वहां की पर्यावरणीय स्थितियां भी बहुत मायने रखती हैं।

उन्होंने तर्क दिया, “एक अंतरराष्ट्रीय इन्वेस्टर के नज़रिए से, अगर आप इंडिया में ऑपरेशन शुरू करने और वहां रहने की सोच रहे हैं, तो एनवायरनमेंटल कंडीशन एक निर्णायक फैक्टर बन जाती हैं।” हालांकि भारत ने बुनियादी ढांचे और विकास में काफी तरक्की की है, लेकिन बड़े शहरी केंद्रों में प्रदूषण का स्तर अभी भी विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

1.7 मिलियन मौतें और राष्ट्रीय आपातकाल की पुकार

वर्ल्ड बैंक की 2022 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए गोपीनाथ ने रोंगटे खड़े कर देने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि भारत में हर साल लगभग 1.7 मिलियन मौतें प्रदूषण के कारण होती हैं, जो देश की कुल मौतों का लगभग 18 प्रतिशत है।

इस संकट की भयावहता को देखते हुए उन्होंने भारत सरकार से अपील की कि प्रदूषण को एक ‘नेशनल इमरजेंसी’ (राष्ट्रीय आपातकाल) माना जाए। उन्होंने आह्वान किया कि प्रदूषण से निपटना देश की टॉप प्रायोरिटी होनी चाहिए और इसे एक बड़े मिशन की तरह ‘युद्ध स्तर’ पर सुलझाया जाना चाहिए।

द लैंसेट के एडिटर-इन-चीफ रिचर्ड हॉर्टन ने भी इस पर सहमति जताते हुए इसे ‘अस्वीकार्य’ बताया और नेताओं की जवाबदेही तय करने की बात कही।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और जमीनी सुधारों की आवश्यकता

एक तरफ जहां दावोस में गीता गोपीनाथ अंतरराष्ट्रीय मंच से अलार्म बजा रही थीं, वहीं भारत में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र और राज्य सरकारों (दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, यूपी, राजस्थान) को सख्त निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने प्रदूषण से निपटने के लिए लॉन्ग-टर्म एक्शन प्लान और CAQM के उपायों को लागू करने की आउटलाइन मांगी है।

हालांकि दिल्ली के AQI में मामूली सुधार दिखा है, लेकिन यह अब भी ‘बहुत खराब’ श्रेणी में बना हुआ है। इसके साथ ही गोपीनाथ ने अन्य संरचनात्मक चुनौतियों का भी जिक्र किया, जिनमें जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को आसान बनाना, न्यायिक सुधार (Judicial Reforms) और ह्यूमन कैपिटल की स्किलिंग शामिल है, जो विकास की गति बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं।

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तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सफर और चुनौतियां

भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य पर चर्चा करते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और गीता गोपीनाथ दोनों ने भरोसा जताया कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकॉनमी बनने की राह पर है।

जहां वैष्णव ने कहा कि मजबूत नींव के कारण भारत यह लक्ष्य ‘पक्का’ हासिल कर लेगा, वहीं गोपीनाथ ने अनुमान लगाया कि मौजूदा ग्रोथ रेट के आधार पर यह 2028 या उससे भी पहले संभव है। हालांकि, गोपीनाथ ने आगाह किया कि केवल इकॉनमी का साइज बढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि असली चुनौती नागरिकों की ‘प्रति व्यक्ति आय’ (Per Capita Income) को बढ़ाना और उनके जीवन स्तर में सुधार करना है।

जीडीपी डेटा की विश्वसनीयता और आईएमएफ का ‘C’ ग्रेड

डाटा की शुचिता पर उठ रहे सवालों के बीच दावोस में गीता गोपीनाथ ने स्पष्ट किया कि आईएमएफ में उनके कार्यकाल के दौरान ऐसे कोई सबूत नहीं मिले जिससे भारत के जीडीपी नंबरों पर संदेह हो। उन्होंने बताया कि उभरते हुए देशों को अक्सर डेटा कलेक्शन की पद्धति के कारण ‘C-ग्रेड’ मिलता है, जो कि एक एब्सोल्यूट माप है, न कि किसी देश के खिलाफ कोई नकारात्मक टिप्पणी।

उन्होंने कहा कि आईएमएफ भारतीय सांख्यिकी कार्यालय के साथ मिलकर डेटा कलेक्शन और मेथडोलॉजी को सुधारने पर काम कर रहा है। भाजपा की संजू वर्मा ने भी इसे एक रूटीन प्रक्रिया बताया और कहा कि भारत सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाला उभरता बाजार बना हुआ है।

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भविष्य की राह: लेबर रिफॉर्म्स और स्किलिंग पर जोर

लेख के समापन की ओर बढ़ते हुए यह स्पष्ट है कि भारत की आर्थिक क्षमता को पूरी तरह अनलॉक करने के लिए लेबर मार्केट में लचीलापन जरूरी है। गोपीनाथ ने सरकार द्वारा पारित लेबर कानूनों को राज्यों में प्रभावी ढंग से लागू करने की अपील की।

इसके साथ ही इंडस्ट्रियलिस्ट सुनील भारती मित्तल ने भी देश के सकारात्मक माहौल और स्थिर सरकार की तारीफ की, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा के प्रति आगाह भी किया। अंततः, निष्कर्ष यही है कि भारत एक उभरती हुई महाशक्ति है, लेकिन प्रदूषण और संरचनात्मक सुधारों जैसी बाधाओं को दूर करना ही इसके स्वर्णिम भविष्य की गारंटी देगा।

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