“वाराणसी-एर्नाकुलम स्पेशल ट्रेन”केरल कुंभ और महामाघ महोत्सव की धूम
वाराणसी-एर्नाकुलम स्पेशल ट्रेन केरल के मलप्पुरम जिले में आयोजित हो रहे महामाघ महोत्सव ने श्रद्धा और आस्था के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। वीकेंड के दौरान थिरुनावाया में भक्तों की भारी भीड़ देखी गई, जहां शनिवार को रोजाना एक लाख से ज्यादा लोग पहुंचे। नीला आरती देखने और खास रस्मों में हिस्सा लेने के लिए भक्त नीला घाट पर उमड़ पड़े।
इस महोत्सव की महत्ता को देखते हुए रेलवे द्वारा संचालित वाराणसी-एर्नाकुलम स्पेशल ट्रेन (नंबर 04358) शुक्रवार सुबह 4.30 बजे वाराणसी से रवाना हुई, जो सलेम, इरोड, तिरुप्पुर और कोयंबटूर के रास्ते अपने गंतव्य तक पहुंचेगी। भक्तों का उत्साह इस कदर है कि घाटों पर पैर रखने की जगह नहीं बची है।
दक्षिणामूर्ति और भैरव पूजा: ज्ञान और भयमुक्ति का संगम
त्योहार के हिस्से के तौर पर शनिवार को सुबह से ही दक्षिणामूर्ति पूजा की गई। यह रस्म त्रयोदशी-चतुर्दशी तिथि, प्रदोष व्रत और पुनर्तम नक्षत्र के शुभ संयोग में संपन्न हुई, जिसका नेतृत्व आचार्य विष्णु आनंद ने किया। दक्षिणामूर्ति भगवान महादेव के गुरु रूप को दर्शाते हैं और उन्हें ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है।
मान्यता है कि दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दक्षिणामूर्ति नंदीकेशन के जरिए भक्तों को दिव्य ज्ञान देते हैं। यह पूजा उन छात्रों के लिए विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है जो अपनी याददाश्त और एकाग्रता को बेहतर बनाना चाहते हैं। वहीं, शाम 6 बजे के बाद भैरव पूजा की गई, जो भक्तों के डर को दूर करने और उन्हें मुश्किलों से बचाने के लिए समर्पित है।
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राहु दोष से मुक्ति और ज्योतिषीय परंपराएं
ज्योतिषीय परंपराओं में महामाघ महोत्सव के दौरान की जाने वाली इन पूजाओं का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि भैरव पूजा जीवन की बाधाओं से निपटने, बुरी ताकतों और दुश्मनों से सुरक्षा देने और शत्रु दोष से राहत दिलाने में मदद करती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह पूजा राहु दोष की तीव्रता को कम करने में भी सहायक है, जिससे बिना वजह के डर, चिंता और मानसिक अशांति से राहत मिलती है। आध्यात्मिक साधकों के लिए यह समय आत्मिक शांति और सच्चे ज्ञान की प्राप्ति का एक दुर्लभ अवसर बनकर उभरा है।
250 साल बाद केरल की धरती पर लौटा ‘दक्षिण का कुंभ’
उत्तर भारत के प्रयागराज कुंभ से प्रेरित होकर ‘दक्षिण भारत का कुंभ मेला’ कहे जाने वाले इस महोत्सव की 250 साल बाद वापसी हुई है। 18 जनवरी को भरतपुझा नदी के किनारे, जिसे ‘दक्षिण गंगा’ भी कहा जाता है, इस उत्सव का भव्य शुभारंभ हुआ। रात के समय आसमान दीयों की रोशनी से जगमगा उठा और चौबीसों घंटे वैदिक मंत्रों की गूंज सुनाई दे रही है।
भगवा कपड़े पहने साधुओं का सैलाब नदी के किनारे उमड़ पड़ा है। यह ऐतिहासिक आयोजन स्वामी आनंदवन भारती महाराज के विचार की उपज है, जो वर्तमान में जूना अखाड़े के वरिष्ठ साधु हैं।
ब्रिटिश काल में थमी परंपरा और सनातन धर्म का पुनरुत्थान
ऐतिहासिक ममनकम मैदान, जो कभी मध्ययुगीन युद्धों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का गवाह था, आज फिर से भक्ति का केंद्र बना है। ब्रिटिश कब्जे के बाद यह परंपरा समाप्त हो गई थी। स्वामी आनंदवनम भारती ने बताया कि 270 साल पहले ब्रिटिश शासकों ने इस आयोजन को रोक दिया था।
आज़ादी के बाद कुछ कोशिशें हुईं लेकिन वे सफल नहीं हो पाईं। इस बार राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने महोत्सव का उद्घाटन किया और सनातन धर्म की परंपरा को फिर से जीवित करने की सराहना की। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं देखा जाना चाहिए।
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प्रशासन की चाक-चौबंद व्यवस्था और ‘नीला आरती’ का आकर्षण
भरतपुझा के किनारे हर शाम काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों द्वारा ‘नीला आरती’ की जाती है, जो ठीक वैसी ही होती है जैसी गंगा आरती वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर होती है। सरकार ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं; 300 से ज्यादा पुलिसकर्मी और बम डिटेक्शन स्क्वॉड तैनात किए गए हैं।
यज्ञशाला में सघन चेकिंग के बाद ही प्रवेश दिया जा रहा है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए KSRTC ने 100 से ज्यादा विशेष बसें चलाई हैं। साथ ही, श्रद्धालुओं को लाने के लिए वाराणसी-एर्नाकुलम स्पेशल ट्रेन अपनी सेवाएं दे रही है, ताकि उत्तर और दक्षिण के बीच सांस्कृतिक सेतु बना रहे।
विवादों के साये में आयोजन और राजनीतिक हलचल
इस भव्य आयोजन के बीच कुछ विवाद भी सामने आए। राजस्व विभाग द्वारा भरतपुझा नदी पर एक अस्थायी पुल के निर्माण को रोकने के आदेश के बाद राजनीतिक घमासान मच गया। भाजपा नेता कुम्मनम राजशेखरन ने इसे महोत्सव को खराब करने की साजिश करार दिया।
वहीं, विपक्षी दलों का मानना है कि लेफ्ट फ्रंट सरकार आगामी चुनावों को देखते हुए ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह पर चल रही है। इन तमाम बहसों के बावजूद भक्तों की आस्था अटूट बनी हुई है और लाखों की संख्या में लोग ‘दक्षिण गंगा’ में डुबकी लगा रहे हैं।
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रेलवे का विशेष शेड्यूल और तीर्थयात्रियों के लिए रूट चार्ट
श्रद्धालुओं की यात्रा सुगम बनाने के लिए वाराणसी-एर्नाकुलम स्पेशल ट्रेन 1 फरवरी को दोपहर 12.35 बजे सलेम पहुंचेगी और फिर इरोड, तिरुप्पुर होते हुए शाम 4 बजे कोयंबटूर जंक्शन पहुंचेगी। वापसी में यही वाराणसी-एर्नाकुलम स्पेशल ट्रेन (नंबर 04358) 3 फरवरी को रात 8 बजे एर्नाकुलम से चलेगी और 6 फरवरी को वाराणसी पहुंचेगी।
इसके अतिरिक्त, तिरुनेलवेली-मेट्टुपालयम वीकली स्पेशल ट्रेन की सेवा भी 22 फरवरी तक बढ़ा दी गई है, जिसका विभिन्न स्टेशनों पर समय बदल दिया गया है ताकि महामाघ महोत्सव में आने वाले यात्रियों को अधिकतम लाभ मिल सके।
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