वाराणसी रोपवे भ्रष्टाचार: 807 करोड़ खर्च पर जाँच की माँग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में प्रस्तावित 3.75 किलोमीटर लंबे अर्बनवाराणसी रोपवे भ्रष्टाचार रोपवे परियोजना की लागत का खुलासा भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर राजनीति का एक काला अध्याय है। महज 3.75 किमी लंबे रोपवे के लिए 807 करोड़ रुपये के ‘गिफ्ट’ के आगे चाँद तक पहुँचने का खर्च, यानी चंद्रयान-3 मिशन (615 करोड़ रुपये) का बजट भी फीका पड़ जाता है।
यह प्रोजेक्ट, जिसे वाराणसी के कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया चौराहे तक तीर्थयात्रियों को ‘उड़ान’ देने का दावा किया जा रहा है, वास्तव में एक महँगा जुमला साबित हो रहा है।
सरकारी दावों के मुताबिक, यह परियोजना हाइब्रिड एन्युटी मॉडल पर आधारित है, लेकिन जब इसकी लागत प्रति किलोमीटर 215 करोड़ रुपये तक पहुँच जाती है, तो सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह रोपवे है या भ्रष्टाचार का ‘रस्सी पुल’ है?
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और पोस्ट्स (जैसे डॉ. शीतल यादव का) चंद्रयान से तुलना करके इनमे हुए भ्रष्टाचार के बारे में चीख-चीखकर बता रहे हैं, लेकिन सरकार इस मामले में चुप्पी साधे हुए है।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय रोपवे की तुलना में वाराणसी की असाधारण लागत
यह भारी लागत तब और भी संदिग्ध लगती है जब इसकी तुलना समान परियोजनाओं से की जाती है। यूरोप में, समान लंबाई के अर्बन रोपवे (जैसे लंदन के एमिरेट्स एयरलाइन का 1 किमी हिस्सा) महज 50-100 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर में बन जाते हैं। तो फिर भारत का ‘पहला पब्लिक ट्रांसपोर्ट रोपवे’ क्यों इतना महँगा है?
देश के भीतर के आँकड़े भी इस लागत को असामान्य साबित करते हैं।
गुजरात का राजपीपला नर्मदा क्रॉसिंग रोपवे (1.85 किमी): यह मात्र 90 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर में पूरा हुआ, जो वाराणसी की तुलना में आधा भी नहीं है।देहरादून का मालशा देवी मंदिर रोपवे (1.1 किमी): इसे 120-135 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर में तैयार किया गया।जोधपुर का माचिया सफारी पार्क वाला स्ट्रेच (2.5 किमी): इसकी लागत 140 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर पर आई।
ये आंकड़े राष्ट्रीय राजमार्ग लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट लिमिटेड (NHLML) और सरकारी रिपोर्ट्स से लिए गए हैं, जो साफ बताते हैं कि वाराणसी रोपवे भ्रष्टाचार की जाँच आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, बोलीविया के ला पाज़ रोपवे (13 किमी) ने ट्रैफिक 35% घटाया और उसकी लागत मात्र 50 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर थी, तो भारत क्यों पिछड़ रहा है?
तकनीकी जटिलताएँ या अनुभवहीन ठेकेदारों को लाभ?
परियोजना की लागत को सही ठहराने के लिए तकनीकी जटिलताओं का हवाला दिया जा सकता है, जैसे घनी आबादी में 30 टावर्स (10-55 मीटर ऊँचे) और 150 गोंडोलास लगाना, या फिर स्विस फंडिंग (322 करोड़ रुपये का लोन Xport Finance से) और बार्थोलेट माशिनेबाउ AG की विदेशी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल।
लेकिन ये बहाने खोखले लगते हैं जब यह प्रोजेक्ट विशवा समुद्र इंजीनियरिंग जैसी अनुभवहीन फर्म को सौंप दिया गया, जिसके पास पोर्ट प्रोजेक्ट्स का अनुभव तो है, लेकिन रोपवे का नहीं। यह फर्म फिर इसे आउटसोर्स कर रही है। RTI से DPR (Detailed Project Report) माँगने की आवश्यकता है, क्योंकि विशवा समुद्र होल्डिंग्स जैसी फर्म को कॉन्ट्रैक्ट मिलना संदिग्ध लगता है।
सुप्रीम कोर्ट का दखल और ओवररन: भ्रष्टाचार के आईसबर्ग का सिरा
वाराणसी रोपवे भ्रष्टाचार का एक और प्रमाण सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने दशाश्वमेध घाट स्टेशन पर निर्माण रोक दिया, क्योंकि वहाँ अवैध तोड़फोड़ के आरोप लगे थे। यह तो बस भ्रष्टाचार के आईसबर्ग का सिरा है।
प्रोजेक्ट डायरेक्टर पूजा मिश्रा के अनुसार, ट्रायल रन मार्च 2025 से चल रहे हैं, और अगस्त तक फुल ऑपरेशन का दावा है। लेकिन देरी (लैंड एक्विजिशन और लीगल हर्डल्स से) पहले ही 20% ओवररन कर चुकी है। यह अतिरिक्त खर्च उच्च मानकों (90,000 यात्री प्रतिदिन क्षमता, 16 घंटे ऑपरेशन) के कारण है, या ठेकेदारों की जेब भरने का तरीका है, यह जाँच का विषय है।
विरासत पर खतरा और पारदर्शिता की माँग
भ्रष्टाचार का यह ‘रोपवे’ न सिर्फ जनता का पैसा लूट रहा है, बल्कि पर्यावरण और विरासत को भी चोट पहुँचा रहा है। वाराणसी जैसी सांस्कृतिक नगरी में, जहाँ गंगा घाटों की पवित्रता पहले ही खतरे में है, यह हाई-टेक ‘उड़ान’ स्थानीय पारिस्थितिकी को बर्बाद कर सकती है, टावर्स से प्रदूषण, पक्षियों का माइग्रेशन बाधित कर सकती है, और ट्रैफिक जाम का समाधान देने के बजाय नई जटिलताएँ पैदा कर सकती है।
क्या यह ‘विकास’ है या वोट बैंक की राजनीति? पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र में ऐसा भ्रष्टाचार युक्त ‘गिफ्ट’ देना, जब देश का जेन-जेड सड़कों पर है, तो सवाल तो बनेगा ही कि प्राथमिकताएँ किसके हित में हैं? जापान के मैग्लेव प्रोजेक्ट की गलत तुलना फैक्ट-चेक (इंडिया टुडे, सितंबर 2025) ने खारिज की, लेकिन वाराणसी की लागत वैसी ही चुभती है।
अब समय है पारदर्शिता की। CAG ऑडिट की माँग तेज होनी चाहिए, क्योंकि सरकारी रिपोर्ट्स (जैसे इकोनॉमिक टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स) में लागत वृद्धि के संकेत मिलते हैं, लेकिन कोई ठोस जाँच नहीं। CAG जैसी स्वतंत्र एजेंसी ही फैसला कर सकती है कि यह ‘इनोवेशन’ है या ‘इनकम जनरेशन’ स्कीम।
अंत में, यह रोपवे न सिर्फ पैसे की बर्बादी है, बल्कि लोकतंत्र की परीक्षा भी। अगर भारत 615 करोड़ में चाँद पर पहुँच सकता है, तो एक शहर की सड़कों के ट्रैफिक को हल्का करने के लिए 807 करोड़ का खर्च क्यों?
यह सवाल जनता का है, और जवाब सरकार को देना होगा। वाराणसी रोपवे भ्रष्टाचार की सीएजी द्वारा जाँच हो, दोषी को सज़ा मिले, और विकास सच्चा बने, वरना ‘विकसित भारत’ का सपना रोपवे की तरह ही हवा में लटका रहेगा।



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