क्या टाटा में सब ठीक है? टाटा संस चेयरमैन विवाद ने बाजार को चौंकाया
टाटा संस चेयरमैन विवाद ने एक बार फिर भारत के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने को सुर्खियों में ला दिया है क्योंकि एन. चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल को लेकर होने वाला फैसला फिलहाल टाल दिया गया है। मंगलवार, 24 फरवरी 2026 को हुई बोर्ड की बैठक में उम्मीद की जा रही थी कि चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए हरी झंडी मिल जाएगी, लेकिन अंतिम क्षणों में इसे स्थगित कर दिया गया।
रॉयटर्स और इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, स्वयं चंद्रशेखरन ने ही इस चर्चा को आगे बढ़ाने का अनुरोध किया है। यह खबर इसलिए चौंकाने वाली है क्योंकि चंद्रा के नेतृत्व में टाटा ग्रुप ने एयर इंडिया का अधिग्रहण और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे बड़े दांव खेले हैं। इस स्थगन ने निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा छेड़ दी है कि क्या पर्दे के पीछे कुछ बड़ा पक रहा है।
नोएल टाटा की एंट्री और वो कड़वी शर्तें: क्या चंद्रा की राह मुश्किल हो गई है?
इस पूरे टाटा संस चेयरमैन विवाद के केंद्र में अब नोएल टाटा का नाम प्रमुखता से उभर कर आ रहा है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन के रूप में नोएल टाटा ने उन मानदंडों (Criteria) की एक फेहरिस्त तैयार की है, जिन पर चंद्रशेखरन को खरा उतरना होगा।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, नोएल टाटा चाहते हैं कि अगले कार्यकाल में केवल विस्तार नहीं, बल्कि मुनाफे और वैल्यू क्रिएशन पर अधिक ध्यान दिया जाए। उन्होंने विशेष रूप से टाटा मोटर्स के इलेक्ट्रिक व्हीकल सेगमेंट और घाटे में चल रही कुछ कंपनियों के भविष्य को लेकर कड़े सवाल उठाए हैं। बोर्ड के भीतर यह स्पष्ट संदेश गया है कि अब चेयरमैन पद केवल ‘रिटेंशन’ नहीं बल्कि ‘डिलीवरी’ के आधार पर तय होगा।
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बोर्ड में बढ़ता मतभेद: क्या सायरस मिस्त्री वाला दौर फिर से लौट रहा है?
टेलीग्राफ इंडिया ने अपनी एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में दावा किया है कि टाटा संस चेयरमैन विवाद के पीछे बोर्ड के भीतर पनप रहे गंभीर मतभेद हैं। कुछ बोर्ड सदस्यों का मानना है कि चंद्रशेखरन ने टाटा संस के कर्ज को कम करने में शानदार काम किया है, जबकि दूसरे पक्ष का मानना है कि ग्रुप की पारंपरिक कंपनियों (Legacy Companies) पर ध्यान कम हुआ है।
यह वैचारिक टकराव ठीक वैसा ही है जैसा कुछ साल पहले रतन टाटा और सायरस मिस्त्री के बीच देखा गया था। हालांकि, इस बार स्थिति अधिक परिपक्व है, लेकिन निर्णयों को टालना यह दर्शाता है कि बोर्ड अब सर्वसम्मति बनाने में संघर्ष कर रहा है। चंद्रशेखरन के तीसरे टर्म पर ‘ब्रेक’ लगना बाजार के लिए एक रेड सिग्नल हो सकता है।
चंद्रशेखरन का ‘सेल्फ-डेफरमेंट’: रणनीति या मजबूरी?
यह बेहद दिलचस्प है कि टाटा संस चेयरमैन विवाद के बीच एन. चंद्रशेखरन ने खुद अपनी नियुक्ति की बातचीत को टालने का प्रस्ताव दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह चंद्रा की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है ताकि वे बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स के साथ अपनी भविष्य की योजना पर अधिक स्पष्टता ला सकें।
वे नहीं चाहते कि उनकी नियुक्ति किसी विवाद के साये में हो। चंद्रा ने पिछले आठ वर्षों में टाटा समूह को एक आधुनिक और टेक-फर्स्ट डिजिटल कंपनी में बदलने का प्रयास किया है। लेकिन अब जब वे अपने तीसरे कार्यकाल की दहलीज पर हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बोर्ड के सभी धड़ों को एक साथ लेकर चलने की है।
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर: क्या चंद्रा के विजन पर उठ रहे हैं सवाल?
टाटा समूह ने चंद्रशेखरन के नेतृत्व में सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण जैसे भविष्य के व्यवसायों में अरबों डॉलर का निवेश करने की योजना बनाई है। हालांकि यह कदम भारत के भविष्य के लिए क्रांतिकारी है, लेकिन कुछ शेयरधारकों और बोर्ड सदस्यों को इसकी ‘जेस्टेशन पीरियड’ (मुनाफा शुरू होने का समय) को लेकर चिंता है।
टाटा संस चेयरमैन विवाद में यह बिंदु भी शामिल है कि क्या ग्रुप अपनी कोर मैन्युफैक्चरिंग से ज्यादा जोखिम भरे हाई-टेक सेक्टर में निवेश कर रहा है। नोएल टाटा के नेतृत्व वाला धड़ा शायद अधिक ‘कैश-फ्लो’ जनरेट करने वाले व्यवसायों को प्राथमिकता देना चाहता है। यही कारण है कि चंद्रा के विजन को अब फिर से कसौटी पर परखा जा रहा है।
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जेन-जी और मिलेनियल्स की नजर: टाटा ब्रांड की साख और युवाओं का निवेश
आज की युवा पीढ़ी जो शेयर बाजार में सक्रिय है, वे टाटा ग्रुप को एक भरोसेमंद संस्थान के रूप में देखती है। टाटा कंज्यूमर और टाटा मोटर्स जैसे स्टॉक्स जेन-जी के पोर्टफोलियो का हिस्सा हैं। टाटा संस चेयरमैन विवाद की खबर जैसे ही डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर आई, सोशल मीडिया पर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।
युवाओं के लिए टाटा का मतलब ‘एथिक्स’ और ‘प्रोफेशनलिज्म’ है। बोर्ड में किसी भी तरह की अनिश्चितता इस ब्रांड इमेज को नुकसान पहुँचा सकती है। मिलेनियल्स यह देखना चाहते हैं कि टाटा समूह बदलती दुनिया के साथ कैसे तालमेल बिठाता है और क्या चंद्रशेखरन जैसे आधुनिक लीडर को उनका वाजिब हक मिलता है या नहीं।
बाजार की प्रतिक्रिया: अनिश्चितता के बीच टाटा ग्रुप के शेयरों का हाल
आमतौर पर टाटा संस में होने वाली किसी भी बड़ी घटना का असर उसकी लिस्टेड कंपनियों पर तुरंत दिखाई देता है। एन. चंद्रशेखरन के री-अपॉइंटमेंट के टलने की खबर ने निवेशकों के मन में एक आशंका पैदा कर दी है।
बाजार विशेषज्ञ मान रहे हैं कि जब तक इस पर अंतिम मुहर नहीं लगती, तब तक टाटा मोटर्स, टीसीएस और टाटा स्टील जैसे बड़े स्टॉक्स में उतार-चढ़ाव बना रहेगा। विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भी बोर्ड के इस रुख को बारीकी से देख रहे हैं क्योंकि चंद्रशेखरन को ‘ग्लोबल मार्केट’ में एक बहुत ही सुलझा हुआ लीडर माना जाता है। उनके पद पर सस्पेंस टाटा ग्रुप के मार्केट कैपिटलाइजेशन के लिए एक अस्थाई झटका हो सकता है।
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स्थिरता और बदलाव के बीच फंसा टाटा समूह
अंततः, टाटा संस में जो चल रहा है वह भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में मेरा मानना है कि टाटा समूह अपनी स्थिरता के लिए जाना जाता है, लेकिन नोएल टाटा की सक्रियता ने इस स्थिरता में एक नया और ‘रिग्रस’ (सख्त) तत्व जोड़ दिया है।
चंद्रशेखरन का कार्यकाल सफल रहा है, लेकिन अब उनसे जो उम्मीदें की जा रही हैं, वे और भी बड़ी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बोर्ड चंद्रा के विजन पर भरोसा बरकरार रखता है या हम टाटा संस के नेतृत्व में एक बड़ा फेरबदल देखेंगे। टाटा की परंपरा है कि वे शोर-शराबे से दूर फैसले लेते हैं, लेकिन इस बार की खामोशी कुछ ज्यादा ही लंबी होती जा रही है।
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