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FCRA संशोधन विधेयक 2026 पर संसद में घमासान:

FCRA संशोधन विधेयक 2026

FCRA संशोधन विधेयक 2026 संसद के मानसून सत्र में ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ (Foreign Contribution Regulation Amendment Bill, 2026) को लेकर सरकार और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक टकराव चरम पर पहुंच गया है।

सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सहयोगियों व अन्य राजनीतिक दलों को सूचित किया है कि सरकार बुधवार (12 अगस्त 2026) को लोकसभा में इस विधेयक को विस्तृत जांच-पड़ताल के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का औपचारिक प्रस्ताव पेश कर सकती है।

हालांकि, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके (DMK) समेत प्रमुख विपक्षी दलों ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें बिल को केवल जेपीसी (JPC) के पास भेजना स्वीकार्य नहीं है; वे इसे इसके मौजूदा स्वरूप में पूरी तरह वापस लेने (Withdrawal) की मांग पर अड़े हुए हैं।

विवाद का मुख्य कारण: NGO की संपत्तियों को जब्त करने का कड़ा नियम

25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किए गए इस संशोधन विधेयक में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक ट्रस्टों और सामाजिक संस्थाओं को मिलने वाली विदेशी फंडिंग और उनकी परिसंपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण के कड़े प्रावधान शामिल हैं।

अथॉरिटी का गठन व संपत्ति जब्ती: विधेयक का सबसे विवादित प्रावधान यह है कि यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द होता है, सरेंडर किया जाता है या उसकी समय-सीमा समाप्त होती है, तो उस संस्था का विदेशी योगदान और उससे निर्मित सभी चल-अचल संपत्तियां बिना किसी पूर्व न्यायिक सुनवाई के सरकार द्वारा नियुक्त ‘अथॉरिटी’ के पास चली जाएंगी।

समेकित कोष में जमा होगी राशि: यदि तय सीमा के भीतर नया सर्टिफिकेट प्राप्त नहीं होता है, तो इन संपत्तियों को नीलाम कर उससे मिलने वाली राशि को ‘भारत के समेकित कोष’ (Consolidated Fund of India) में जमा कर दिया जाएगा।

पुनरुद्धार का अधिकार समाप्त: नए कानून के तहत दोबारा रजिस्ट्रेशन कराने पर भी पुरानी संपत्तियों को वापस पाने का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।

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विपक्ष और सिविल सोसाइटी की मुख्य आपत्तियां

मंगलवार (11 अगस्त 2026) को आयोजित राज्यसभा की कार्य मंत्रणा समिति (Business Advisory Committee) की बैठक में विपक्ष ने इस बिल का पुरजोर विरोध किया।

अल्पसंख्यक और शैक्षणिक संस्थानों पर असर: कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश, टीएमसी की उप-नेता सागरिका घोष और डीएमके नेता तिरुचि शिवा ने तर्क दिया कि यह कानून विशेष रूप से ईसाई गैर-सरकारी संगठनों, चर्चों और अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित कल्याणकारी व शैक्षणिक संस्थानों को निशाना बनाने के उद्देश्य से लाया गया है।

भूतपेक्षी प्रभाव (Retrospective Action) का डर: कई चर्च संगठनों ने हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर अपनी आशंका व्यक्त की थी कि इन कड़े नियमों का इस्तेमाल पुराने कानूनी निवेशों और संपत्तियों पर दंडात्मक कार्रवाई करने के लिए किया जा सकता है।

डीएमके का रुख: डीएमके नेता तिरुचि शिवा ने स्पष्ट कहा, “यह बिल अपने मौजूदा स्वरूप में हमें बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। इसे जेपीसी के पास भेजने से मूल समस्या का समाधान नहीं होगा।”

सरकार का तर्क: “गैर-भेदभावपूर्ण कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा”

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सरकार का कहना है कि यह विधेयक किसी विशेष धर्म या समुदाय को लक्षित करके नहीं बनाया गया है।

पारदर्शिता और नियमन: सरकार का तर्क है कि विदेशी धन के दुरुपयोग, मनी लॉन्ड्रिंग और देश विरोधी गतिविधियों में विदेशी फंड के इस्तेमाल को रोकने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत करना अनिवार्य है।

बीजेपी का पक्ष: बीजेपी सांसद सस्मित पात्रा ने तर्क दिया कि चूंकि विधेयक के कई तकनीकी व विधिक पहलुओं पर हितधारकों की अलग-अलग राय है, इसलिए इसे एक और दौर की गहन समीक्षा के लिए JPC के पास भेजना सबसे लोकतांत्रिक और व्यावहारिक रास्ता है।

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संसद में गतिरोध और आगामी विधायी रणनीति

संसद के मानसून सत्र के दौरान सरकार ने कई महत्वपूर्ण विधेयक पास कराए हैं, लेकिन FCRA संशोधन विधेयक और दिल्ली छात्र प्रदर्शन जैसे मुद्दों पर गतिरोध कायम है।

सरकार को उम्मीद है कि बिल को JPC के पास भेजने के प्रस्ताव से संसद में जारी गतिरोध कुछ हद तक शांत हो सकता है और सिविल सोसाइटी ग्रुप्स की चिंताओं को दूर करने का एक औपचारिक मंच उपलब्ध होगा।

यदि बुधवार को लोकसभा में JPC का प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो इस समिति में लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के सांसदों को शामिल किया जाएगा, जो आगामी सत्र तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करेगी।

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संपादकीय दृष्टिकोण:

विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को दूर करना किसी भी सरकार की प्राथमिकता हो सकती है। लेकिन, बिना किसी पूर्व न्यायिक जांच के निजी या सामाजिक संस्थाओं की संपत्तियों को जब्त कर सरकारी खजाने में जमा करने का प्रावधान न्यायिक सिद्धांतों (Natural Justice) के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील है।

जेपीसी के माध्यम से इस विधेयक के विवादास्पद प्रावधानों पर संसद के भीतर और बाहर सभी हितधारकों (Civil Society Groups) के साथ व्यापक विचार-विमर्श होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के हित में होगा। विदेशी फंडिंग के नए नियमों और संसद में हंगामे के बीच पेश हुआ FCRA संशोधन विधेयक 2026 एनजीओ पर कड़े प्रतिबंधों और नए प्रावधानों के बीच जानें FCRA संशोधन विधेयक 2026 की पूरी सच्चाई

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