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36 मिनट में 7 बिल बिना बहस विधायी कामकाज निपटाने पर उठे सवाल

36 मिनट 7 बिल

36 मिनट में 7 बिल संसद के वर्तमान मानसून सत्र (अगस्त 2026) में दिल्ली में छात्र प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई, पेपर लीक और राजनीतिक गतिरोध को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच खींचतान अपने चरम पर है।

मीडिया बहसों (जैसे ‘इंडिया टुडे’ के ‘इंडिया फर्स्ट’ शो) में बीजेपी और कांग्रेस के प्रवक्ताओं के बीच तीखी बहस और दोनों सदनों में जारी लगातार हंगामे के बावजूद, सरकार अपना विधायी एजेंडा (Legislative Agenda) तेजी से पूरा करने में सफल रही है।

संसदीय आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारी विरोध और नारेबाजी के बीच सरकार ने अब तक 19 महत्वपूर्ण विधेयक पारित करवा लिए हैं। हालांकि, इन विधेयकों के पारित होने की प्रक्रिया ने संसदीय प्रणाली, बिना बहस के कानून निर्माण और प्रश्नकाल (Question Hour) के लगातार बाधित होने पर गंभीर संवैधानिक व लोकतांत्रिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

36 मिनट में 7 बिल पारित: औसतन हर 5 मिनट में एक कानून

मानसून सत्र के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब लोकसभा में महज 36 मिनट के भीतर 7 महत्वपूर्ण विधेयकों को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।

बहस का अभाव: औसतन हर पांच मिनट में एक बिल पास होना यह दर्शाता है कि विधेयकों के प्रमुख प्रावधानों पर न तो कोई विस्तृत चर्चा हुई और ना ही विपक्षी सदस्यों के सुझावों पर विचार करने का पर्याप्त अवसर मिला।

समय का उपयोग: 15 दिनों के तय सत्र में जहां लोकसभा को कम से कम 90 घंटे काम करना चाहिए था, वहीं लगातार स्थगन के कारण केवल 15 घंटे 36 मिनट ही विधायी कार्य हो सका। इसके विपरीत, राज्यसभा में 24 घंटे 21 मिनट काम हुआ, जहां प्रत्येक बिल पर औसतन लगभग एक घंटा चर्चा दर्ज की गई।

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प्रश्नकाल पूरी तरह ठप: 18वीं लोकसभा में गिरता स्तर

संसदीय लोकतंत्र में ‘प्रश्नकाल’ वह समय होता है जब जनप्रतिनिधि सीधे मंत्रियों से नीतिगत सवाल पूछकर सरकार की जवाबदेही तय करते हैं। लेकिन 18वीं लोकसभा के आंकड़े बताते हैं कि हंगामा इस सत्र में प्रश्नकाल पर सबसे भारी पड़ा है।

इतिहास का सबसे प्रभावित सत्र: मानसून सत्र 2026 में प्रश्नकाल लगभग पूरी तरह से ठप रहा।

अतीत से तुलना: इससे पहले मानसून सत्र 2024 में केवल 3% समय बर्बाद हुआ था, जबकि शीतकालीन सत्र 2024 में 56% और मानसून सत्र 2025 में 77% समय नष्ट हुआ था। बजट सत्र 2026 में लगातार 12 दिनों तक प्रश्नकाल 15 मिनट से भी कम चल सका था।

स्पीकर की चिंता: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बार-बार सदन में गतिरोध पर गहरी चिंता व्यक्त की है और दोनों पक्षों से सदन को सुचारू रूप से चलाने की अपील की है, लेकिन राजनीतिक खींचतान के आगे उनकी अपीलों का कोई असर नहीं दिख रहा।

विपक्ष की बदलती रणनीति: नारेबाजी से वॉकआउट तक

सदन के भीतर सरकारी बहुमत के दम पर बिना बहस बिल पास होने की प्रक्रिया को देखते हुए विपक्ष ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

नारेबाजी से किनारा: शुरुआती दिनों में वेल (Well) में आकर नारेबाजी करने वाले विपक्षी सांसदों ने यह महसूस किया कि हंगामे के बावजूद बिल पास हो रहे हैं।

वॉकआउट का रास्ता: राज्यसभा में पिछले कुछ दिनों से विपक्ष ने विरोध दर्ज कराने के लिए नारेबाजी के बजाय सामूहिक वॉकआउट (Walkout) की रणनीति अपनाई है, जिससे सरकार बिना किसी बड़े व्यवधान के अपने विधेयकों को पारित करवा रही है।

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प्रमुख विधायी उपलब्धि: पब्लिक एग्जामिनेशन बिल

तमाम व्यवधानों के बीच इस सत्र की सबसे बड़ी विधायी उपलब्धि ‘पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक’ का पारित होना रहा।

यह अकेला ऐसा विधेयक रहा जिस पर व्यापक चर्चा हुई—लोकसभा में इस पर 11 घंटे और राज्यसभा में 7 घंटे 14 मिनट तक बहस चली। देश में बार-बार हो रहे पेपर लीक और भर्ती धांधलियों को रोकने के उद्देश्य से इस कानून को कड़े प्रावधानों के साथ मंजूरी दी गई।

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लोकतंत्र और जनविश्वास पर असर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद केवल कानून पास करने की मशीन नहीं है, बल्कि यह वह सर्वोच्च मंच है जहां जनहित से जुड़े मुद्दों पर बहस और नीतियों का परीक्षण होता है। जब सरकार और विपक्ष सहयोग करने के बजाय आमने-सामने होते हैं, तो आम नागरिकों का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर से भरोसा कम होने लगता है।

सदन के बचे हुए अंतिम दो दिनों में भी हंगामे के आसार हैं, लेकिन संसदीय परंपराओं की मर्यादा बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सरकार विपक्ष के जायज सवालों का जवाब दे और विपक्ष भी संसद को बाधित करने के बजाय बहस के जरिए अपनी बात रखे।

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